पाकिस्तान की विदेश नीति में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका के नेतृत्व वाले गाजा पीस बोर्ड में शामिल होने का फैसला किया है। यह फैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने फिलिस्तीन और गाजा को लेकर एक स्पष्ट लकीर खींची थी, जिसे अब शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की जोड़ी ने मिटा दिया है। विपक्ष का आरोप है कि यह फैसला किसी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप के डर का नतीजा है।
जिन्ना के सिद्धांतों की अनदेखी और सियासी बवाल
पाकिस्तान के गठन के समय से ही देश का रुख फिलिस्तीन के समर्थन में रहा है और जिन्ना ने स्पष्ट कहा था कि गाजा पर केवल मुसलमानों का अधिकार होना चाहिए। हालांकि, वर्तमान सरकार के इस यू-टर्न ने देश के भीतर एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने इसे 'राष्ट्रीय गरिमा का सौदा' करार दिया है। सोशल मीडिया पर इमरान खान का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर अमेरिका के दबाव में गाजा के मुद्दे पर चुप्पी साध लेंगे और उनके निर्देशों का पालन करेंगे।
ट्रंप की खुशामद और वीजा का खेल
इस फैसले के पीछे का सबसे बड़ा कारण इमिग्रेशन वीजा बताया जा रहा है। हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान सहित 11 देशों के इमिग्रेशन वीजा पर अस्थाई प्रतिबंध लगाने के संकेत दिए थे। पाकिस्तान के लगभग 10 हजार लोगों को पिछले साल अमेरिका ने वीजा दिया था और अपनी जनता के गुस्से और आर्थिक प्रवासियों के भविष्य को देखते हुए, पाकिस्तान सरकार डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिश कर रही है। गाजा पीस बोर्ड में शामिल होना इसी 'खुशामद' की राजनीति का। हिस्सा माना जा रहा है ताकि वीजा प्रतिबंधों से राहत मिल सके।
लोकतंत्र का डर और अमेरिकी हस्तक्षेप
पाकिस्तान में 2024 के आम चुनावों में हुई धांधली के आरोपों ने सरकार की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर किया है। अमेरिका ने हाल के दिनों में ईरान जैसे देशों में 'लोकतंत्र' के नाम पर जो रुख अपनाया है, उससे पाकिस्तानी हुक्मरान डरे हुए हैं। विपक्ष के नेता इमरान खान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों और अमेरिका से मदद की गुहार लगा रहे हैं। ऐसे में शहबाज सरकार किसी भी कीमत पर अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहती। उन्हें डर है कि अगर अमेरिका ने चुनाव परिणामों पर। कड़ा रुख अपनाया, तो उनकी सत्ता खतरे में पड़ सकती है।
सऊदी अरब और तुर्की का दबाव
पाकिस्तान की जर्जर आर्थिक स्थिति उसे अपने सहयोगियों पर निर्भर रहने को मजबूर करती है। सऊदी अरब और तुर्की ने पहले ही गाजा पीस बोर्ड में शामिल होने का मन बना लिया था। सऊदी अरब पाकिस्तान के स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में बड़ा निवेश करने जा रहा है। चूंकि पाकिस्तान इन दोनों देशों के साथ एक त्रिपक्षीय सैन्य समझौते पर भी काम कर रहा है, इसलिए उसके पास इनके फैसले के खिलाफ जाने का विकल्प बहुत कम था। सहयोगियों का साथ देना पाकिस्तान की मजबूरी बन गया है।
चीन से दूरी और सेना प्रमुख की भूमिका
गाजा पीस बोर्ड का नेतृत्व डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं और चीन ने इसमें शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। अगर पाकिस्तान भी इससे बाहर रहता, तो उस पर 'चीन का पिछलग्गू' होने का ठप्पा लग जाता। पाकिस्तान फिलहाल अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के ट्रंप। के साथ व्यक्तिगत संबंध भी इस फैसले की एक बड़ी वजह हैं। ट्रंप ने मुनीर को अपना 'पसंदीदा' बताया है, और मुनीर के जरिए ही अमेरिका पाकिस्तान में निवेश के रास्ते खोल रहा है।