भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाने को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। वर्तमान में, ईंधन की कीमतें केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले मूल्य वर्धित कर (VAT) के कारण उच्च स्तर पर बनी हुई हैं। यदि इन ईंधनों को जीएसटी के तहत लाया जाता है, तो कर संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन होगा, जिससे उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिल सकती है। आधिकारिक आंकड़ों और बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, जीएसटी लागू होने से करों का दोहरा प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जो वर्तमान में कीमतों को बढ़ाने का मुख्य कारक है।
वर्तमान कर संरचना और मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया
00 प्रति लीटर के बीच रहती है। इस बेस कीमत में केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाने वाला उत्पाद शुल्क जोड़ा जाता है, जो एक निश्चित राशि होती है। इसके बाद, राज्य सरकारें अपना मूल्य वर्धित कर (VAT) लगाती हैं, जो अलग-अलग राज्यों में भिन्न होता है। इसके अतिरिक्त, इसमें डीलर का कमीशन और माल ढुलाई का खर्च भी शामिल होता है। वर्तमान व्यवस्था में, वैट की गणना बेस प्राइस और उत्पाद शुल्क के योग पर की जाती है, जिससे कर पर कर (Cascading Effect) की स्थिति उत्पन्न होती है और यही कारण है कि रिफाइनरी से निकलने के बाद उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते ईंधन की कीमत लगभग दोगुनी हो जाती है।
12% जीएसटी स्लैब के तहत कीमतों का संभावित गणित
यदि जीएसटी परिषद पेट्रोल और डीजल को 12% के टैक्स स्लैब में रखने का निर्णय लेती है, तो कीमतों में भारी गिरावट देखी जा सकती है। 60 का कर लगेगा। 00 प्रति लीटर के बीच आ सकती है। 00 प्रति लीटर के स्तर पर आ सकता है। 00 तक की सीधी राहत होगी।
28% जीएसटी स्लैब और उसका उपभोक्ता पर प्रभाव
जीएसटी के उच्चतम स्लैब यानी 28% के तहत भी ईंधन की कीमतें वर्तमान दरों से कम रहने का अनुमान है। 40 का कर देय होगा। 00 प्रति लीटर के दायरे में रह सकती है। 00 प्रति लीटर के आसपास स्थिर हो सकती है। 00 के बीच चल रही कीमतों से काफी कम होगी।
जीएसटी लागू होने से कीमतों में कमी के तकनीकी कारण
जीएसटी व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' और करों के संचयी प्रभाव का खात्मा है और वर्तमान में, पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क और वैट के बीच कोई तालमेल नहीं है, जिससे कर का बोझ बढ़ता है। जीएसटी एक गंतव्य-आधारित कर है जो केवल मूल्यवर्धन पर लगता है। जब पेट्रोल-डीजल जीएसटी के दायरे में आएंगे, तो तेल कंपनियों को उनके द्वारा भुगतान किए गए इनपुट टैक्स पर क्रेडिट मिलेगा, जिससे उनकी परिचालन लागत कम होगी। इसके अलावा, पूरे देश में एक समान कर दर होने से राज्यों के बीच कीमतों में होने वाला भारी अंतर भी समाप्त हो जाएगा, जिससे लॉजिस्टिक्स और परिवहन क्षेत्र को भी लाभ होगा।
राज्यों के राजस्व की चुनौतियां और संवैधानिक प्रावधान
पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में शामिल करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा राज्यों के राजस्व का नुकसान है। वर्तमान में, वैट राज्यों की आय का एक प्रमुख स्रोत है और वे इस पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहते। संविधान के अनुसार, जीएसटी परिषद के पास इन उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की शक्ति है, लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच आम सहमति अनिवार्य है। राज्यों का तर्क है कि ईंधन पर वैट उन्हें वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करता है, विशेष रूप से आपातकालीन स्थितियों में। यदि जीएसटी लागू होता है, तो केंद्र को राज्यों को होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए एक तंत्र विकसित करना होगा, जैसा कि जीएसटी के शुरुआती वर्षों में अन्य वस्तुओं के लिए किया गया था।