प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के जरिए देश और दुनिया के लोगों से अपने विचार साझा किए। यह इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम का 139वां एपिसोड रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए याद दिलाया कि ठीक 12 साल पहले विजयादशमी के पावन अवसर पर 'मन की बात' की शुरुआत की गई थी। तब से लेकर आज तक यह सफर बिना रुके लगातार जारी है। इस लंबे सफर में देशवासी न केवल उनके सहयात्री रहे हैं, बल्कि उन्होंने एक मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाई है। प्रधानमंत्री के लिए यह कार्यक्रम किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है, जिसके जरिए वे देश के आम लोगों की कड़ी मेहनत, उनके अदम्य साहस, पक्के संकल्प, अटूट समर्पण और सेवा-भाव का जश्न मनाते हैं और देश में सदियों से तीर्थयात्रा की परंपरा चली आ रही है और 'मन की बात' उनके लिए एक ऐसी आध्यात्मिक और वैचारिक यात्रा है, जिससे वे देशवासियों के प्रयासों को बेहद करीब से समझ पाते हैं और उनके अतुलनीय योगदान के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं।
त्योहारी सीजन और वोकल फॉर लोकल की गूंज
कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में चल रहे त्योहारी सीजन का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दीवाली और छठ के पवित्र त्योहार अब बस कुछ ही दिन दूर हैं। इस त्योहारी माहौल में देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि यह बेहद जरूरी है कि हम उन जगहों को हमेशा साफ-सुथरा रखें जहां हम निवास करते हैं। हमारी बेहद छोटी-छोटी कोशिशें भी हमारे आसपास के परिवेश में बहुत बड़े बदलाव लाने की ताकत रखती हैं। इसके साथ ही, त्योहारी सीजन की खरीदारी का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आप सभी ने अपने आस-पास एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव जरूर देखा होगा। अब लोग बाजार से खरीदारी करते समय स्वदेशी उत्पादों को बहुत अधिक महत्व देने लगे हैं। 'वोकल फॉर लोकल' की यह मजबूत भावना अब हमारे देश के स्थानीय उत्पादों को केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित न रखकर दुनिया भर के वैश्विक बाजारों तक पहुँचा रही है।
प्रधानमंत्री ने उदाहरण देते हुए विस्तार से बताया कि किस प्रकार बिहार का प्रसिद्ध मखाना और कर्नाटक की स्वादिष्ट अरहर दाल को दुनिया भर में नए और बड़े बाज़ार मिल रहे हैं। इसके अलावा, महाराष्ट्र के आदिवासी समुदायों के उत्पादों को ऐसी अनोखी पैकेजिंग के जरिए वैश्विक पहचान मिल रही है, जो आदिवासी कला की समृद्धि और उनकी सांस्कृतिक विरासत को खूबसूरती से दर्शाती है। देश भर में खादी की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे उन तमाम कुशल कारीगरों और बुनकरों को बहुत बड़ा आर्थिक और सामाजिक सहारा मिल रहा है, जिनकी पारंपरिक कला हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को आज भी जिंदा रखे हुए है। प्रधानमंत्री ने सभी देशवासियों से आह्वान किया कि वे अपने स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पादों को प्राथमिकता दें और 'वोकल फॉर लोकल' के संकल्प को और अधिक मजबूत करें।
आदिवासी कला और पैकेजिंग का कमाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में महाराष्ट्र के आदिवासी समुदायों की विशेष उपलब्धि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के आदिवासी समुदायों ने अपने उत्पादों की पैकेजिंग पर बहुत अधिक और सराहनीय ध्यान दिया है। राज्य में 'शबरी नेचुरल्स' के माध्यम से प्राकृतिक शहद, महुआ, चीड़ और बांस से विभिन्न प्रकार के आकर्षक उत्पादों को बाजार में लाया जा रहा है और इन सभी उत्पादों की पैकेजिंग पर स्थानीय आदिवासी कला की अद्भुत छाप साफ तौर पर देखने को मिलती है। प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ देशवासियों को बताया कि यह जानकर बेहद खुशी होगी कि इस बेहतरीन पैकेजिंग को जापान का प्रतिष्ठित 'गुड डिज़ाइन अवार्ड' भी प्राप्त हुआ है और यह इस बात का प्रमाण है कि जब पारंपरिक कला और आधुनिक सोच का मेल होता है, तो वैश्विक स्तर पर सराहना मिलती है।
कपास की प्राकृतिक खेती और पंजाब का खेती विरासत मिशन
पर्यावरण संरक्षण और कृषि क्षेत्र में नवाचार का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंजाब का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पंजाब में 'खेती विरासत मिशन' नाम की एक संस्था ने ऑर्गेनिक और पारंपरिक कृषि के तौर-तरीकों को एक नया जीवन देना शुरू कर दिया है। इस संस्था और टीम के समर्पित लोग पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना चाहते हैं। इसी उद्देश्य के साथ इस अनूठी पहल को 'नव-त्रिन्जन' नाम दिया गया है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस पहल के तहत क्षेत्र में बिना किसी केमिकल का इस्तेमाल किए पूरी तरह से ऑर्गेनिक कपास उगाई जा रही है।
इस प्राकृतिक खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां प्राकृतिक रंगों वाली कपास भी उगाई जाती है, जिससे तैयार होने वाले धागे और कपड़े को रंगने के लिए अलग से किसी भी तरह के केमिकल या रासायनिक रंगों का इस्तेमाल करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सवाल किया कि आप आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि इससे हमारे पर्यावरण को कितनी बड़ी मदद मिल रही है और यह प्रकृति के संरक्षण में कितना बड़ा कदम है।
उत्तराखंड में हेवल नदी का पुनर्जीवन
जल संरक्षण के महत्व को समझाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र का एक प्रेरणादायक उदाहरण साझा किया। उन्होंने बताया कि टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने मिलकर 'हेवल' नदी में एक बार फिर से नई जान फूंकने की ऐतिहासिक कोशिश की है। कुछ समय पहले की स्थिति यह थी कि हेवल नदी का जलस्तर तेजी से घटने लगा था और उसके आस-पास के तमाम प्राकृतिक जल स्रोत भी सूखते जा रहे थे। इस गंभीर समस्या के जवाब में स्थानीय प्रशासन और वहां के जागरूक ग्रामीणों ने मिलकर नदी को बचाने के लिए एक बड़ा और सामूहिक अभियान शुरू किया।
इस महत्वपूर्ण पहल के तहत बारिश के बहुमूल्य पानी को बड़े पैमाने पर संचित करने, भूजल स्तर को फिर से ऊपर उठाने यानी ग्राउंडवाटर रिचार्ज करने और पहाड़ों तथा मैदानी इलाकों में बड़ी संख्या में नए पेड़ लगाने के पुख्ता उपाय किए गए। आज इन सभी समर्पित प्रयासों के अभूतपूर्व परिणामस्वरूप हेवल नदी एक बार फिर से पूरी तरह जीवित हो उठी है और उसके साथ-साथ दर्जनों प्राकृतिक जल स्रोत भी सफलतापूर्वक बहाल हो चुके हैं और प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता की भागीदारी और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी विकट समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।