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राजस्थान पंचायत और निकाय चुनाव टले, ओबीसी आयोग का कार्यकाल बढ़ा

राजस्थान पंचायत और निकाय चुनाव टले, ओबीसी आयोग का कार्यकाल बढ़ा
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राजस्थान में पंचायतीराज और शहरी निकाय चुनावों की प्रतीक्षा कर रहे उम्मीदवारों और मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण अपडेट सामने आया है। राज्य सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जांच के लिए गठित आयोग का कार्यकाल 30 सितंबर तक बढ़ा दिया है। इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश में सितंबर माह तक स्थानीय चुनाव होने की कोई संभावना नहीं है और आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, अब चुनाव प्रक्रिया अक्टूबर या उसके बाद ही शुरू हो पाएगी।

ओबीसी आरक्षण और डेटा विसंगतियां

निकाय और पंचायतीराज चुनावों में देरी का मुख्य कारण ओबीसी आरक्षण का निर्धारण है। आयोग की रिपोर्ट के बिना सीटों का आरक्षण तय करना संभव नहीं है और आयोग को विभिन्न जिलों से प्राप्त जनसंख्या आंकड़ों में गंभीर खामियां मिली हैं। कई पंचायतों के डेटा अधूरे या त्रुटिपूर्ण पाए गए हैं। जनाधार के डेटा और जमीनी हकीकत में अंतर होने के कारण आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने में अतिरिक्त समय की आवश्यकता है।

400 गांवों में शून्य ओबीसी आबादी का रिकॉर्ड

आयोग की जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार लगभग 400 गांवों में ओबीसी की आबादी शून्य दर्ज थी। इस विसंगति ने डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी के सही अनुपात को लेकर भी स्पष्टता की कमी है और इसी कारण आयोग निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सका और सरकार को कार्यकाल विस्तार का निर्णय लेना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट का 'ट्रिपल टेस्ट' नियम

राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 'ट्रिपल टेस्ट' नियम का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस नियम के तहत स्थानीय निकायों में आरक्षण लागू करने से पहले एक समर्पित आयोग द्वारा गहन जांच, डेटा का संग्रह और आरक्षण की सीमा तय करना अनिवार्य है। सरकार का मानना है कि बिना सटीक सर्वे और डेटा के आरक्षण लागू करने से भविष्य में कानूनी अड़चनें पैदा हो सकती हैं। इसी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए सर्वे दोबारा कराया जा रहा है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विपक्ष के आरोप

चुनावों में हो रही देरी को लेकर राजस्थान की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। विपक्षी दलों का दावा है कि सरकार हार के डर से जानबूझकर चुनावों को टाल रही है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि ओबीसी रिपोर्ट को केवल एक बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, सरकार के प्रतिनिधियों का कहना है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और सटीक डेटा के बिना चुनाव कराना संभव नहीं है, ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।

चुनाव प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव

आयोग का कार्यकाल 30 सितंबर तक बढ़ने से अब पूरी चुनावी मशीनरी की तैयारी भी आगे खिसक गई है। रिपोर्ट आने के बाद सीटों का परिसीमन और आरक्षण लॉटरी निकालने की प्रक्रिया में भी समय लगेगा। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, यदि सितंबर के अंत तक रिपोर्ट प्राप्त होती है, तो अक्टूबर में चुनावी अधिसूचना जारी होने की संभावना बन सकती है। फिलहाल, सभी स्थानीय निकायों में प्रशासकों का कार्यकाल जारी रहने की उम्मीद है।

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