राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने हाल ही में मंदिर में हुए दान घोटाले और जमीन खरीद से जुड़े विवादों पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने इन आरोपों के हर पहलू पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि किस तरह से दान की चोरी का मामला पहली बार सामने आया। मिश्रा ने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का बचाव किया, लेकिन साथ ही मंदिर परिसर की निगरानी व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों को भी स्वीकार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्थाओं में बड़े सुधार की आवश्यकता है और इसे प्रबंधन के लिए एक अंतिम चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।
दान चोरी का खुलासा और त्वरित कार्रवाई
नृपेंद्र मिश्रा ने उस घटना का विवरण दिया जिसने दान की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए थे। उन्होंने बताया कि उन्हें यह सूचना मिली थी कि कुछ धनराशि एक कमरे के पास बने शौचालय के पास पड़ी मिली है। यह खबर मिलते ही हड़कंप मच गया क्योंकि यह सीधे तौर पर दान प्रबंधन में सेंधमारी का संकेत था। जैसे ही यह जानकारी ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को मिली, वे बिना किसी देरी के मात्र 30 मिनट के भीतर वहां पहुंच गए। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चंपत राय ने अपने सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया और यह तय किया कि इस मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए। इसी के आधार पर उन्होंने राज्य सरकार से एक एसआईटी (विशेष जांच दल) गठित करने का अनुरोध किया ताकि इस चोरी के पीछे के दोषियों का पता लगाया जा सके।
निगरानी व्यवस्था और सुरक्षा प्रोटोकॉल
मंदिर परिसर की सुरक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए नृपेंद्र मिश्रा ने बताया कि पूरे परिसर में लगभग 800 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इन कैमरों की निगरानी के लिए एक कंट्रोल रूम बनाया गया है, जिसकी जिम्मेदारी पुलिस के पास है। हालांकि, मिश्रा ने इस निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि काउंटिंग रूम में सीसीटीवी होने के बावजूद ऐसी घटना हुई है, तो इसका मतलब है कि निगरानी व्यवस्था या तो लचर है या उसका सही उपयोग नहीं किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि दान की गिनती करने वाले लोगों के लिए कड़े नियम तय हैं। नियमों के अनुसार, गिनती में शामिल होने वाले व्यक्तियों के कपड़ों में जेब नहीं होनी चाहिए, ताकि किसी भी तरह की नकद चोरी को रोका जा सके।
चंपत राय का बचाव और प्रबंधन की जिम्मेदारी
चंपत राय पर लग रहे आरोपों के संबंध में नृपेंद्र मिश्रा ने उनका पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि चंपत राय लंबे समय से मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं और उन्होंने हर कठिन परिस्थिति का सामना किया है और मिश्रा के अनुसार, प्रबंधन का मुखिया होने के नाते लोग उन पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे इसमें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मुख्य समस्या मंदिर परिसर में निगरानी की कमी है। मिश्रा ने स्पष्ट किया कि मुखिया होने के कारण चंपत राय जवाबदेह जरूर हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से उन पर आरोप लगाना सही नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पूरी व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने की जरूरत है।
जमीन खरीद विवाद और नजूल भूमि की चुनौतियां
जमीन खरीद में भ्रष्टाचार के आरोपों पर नृपेंद्र मिश्रा ने स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में और अधिक पारदर्शिता बरती जानी चाहिए थी। उन्होंने अयोध्या की भौगोलिक और कानूनी स्थिति का जिक्र करते हुए बताया कि वहां की ज्यादातर जमीन नजूल की है और नजूल भूमि होने के कारण अक्सर यह समस्या आती है कि बातचीत किसी और से की जाती है, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में नाम किसी और का होता है। मिश्रा ने कहा कि जमीन खरीद के दौरान जो सावधानी बरती जानी चाहिए थी, वह नहीं बरती गई। उन्होंने इसे पहली और दूसरी चेतावनी करार देते हुए कहा कि अब यह अंतिम चेतावनी है। उन्होंने भविष्य में जमीन खरीद की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने और सावधानी बरतने पर जोर दिया ताकि ट्रस्ट की छवि पर कोई आंच न आए।