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आरबीआई की प्लास्टिक नोटों की तैयारी: दुनिया के 60 देशों में पॉलीमर करेंसी का जलवा

आरबीआई की प्लास्टिक नोटों की तैयारी: दुनिया के 60 देशों में पॉलीमर करेंसी का जलवा
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हमारी और आपकी जेब में रखे कागज के नोट जल्द ही इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई देश में नकदी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाने की तैयारी कर रहा है और केंद्रीय बैंक अब पारंपरिक कागज की जगह प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट छापने की योजना पर बहुत गंभीरता से विचार कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पटना और मुंबई में आयोजित आरबीआई की हालिया बोर्ड बैठकों में इस बड़े बदलाव को लेकर गहन मंथन और चर्चा की गई है। हालांकि यह विचार भारत के लिए नया लग सकता है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह तकनीक काफी समय से सफलतापूर्वक काम कर रही है और दुनिया के कई देश पहले ही इसे पूरी तरह से अपना चुके हैं।

पॉलीमर करेंसी की मजबूती और फायदे

कागज के नोटों को चलन से बाहर करने या उनके विकल्प के रूप में प्लास्टिक नोटों को लाने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी लागत और टिकाऊपन है। बैंकिंग विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि प्लास्टिक के नोट आम कागज के नोटों की तुलना में करीब 2 और आधा गुना ज्यादा चलते हैं। इन नोटों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन पर पानी, नमी और गंदगी का कोई खास असर नहीं होता है। ये नोट जल्दी फटते नहीं हैं, जिससे केंद्रीय बैंक को इन्हें बार-बार छापने की जरूरत नहीं पड़ती और छपाई का भारी-भरकम खर्च बचता है। इसके अलावा, प्लास्टिक नोटों की एक और बड़ी खूबी यह है कि इनकी नकल करना या जाली नोट बनाना लगभग नामुमकिन होता है। इन्हीं सुरक्षा और आर्थिक फायदों को देखते हुए दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस विकल्प की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं।

इन देशों ने पूरी तरह बदल दी अपनी करेंसी

पूरी दुनिया में लगभग 60 देश ऐसे हैं जो प्लास्टिक के नोटों का किसी न किसी रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन कुछ देशों ने तो अपने सिस्टम से कागज के नोटों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। ऑस्ट्रेलिया इस सूची में सबसे ऊपर है क्योंकि यह प्लास्टिक नोटों की शुरुआत करने वाला दुनिया का पहला देश है। साल 1988 में ही यहां पॉलीमर नोट चलन में आ गए थे और यह दुनिया का इकलौता देश है जो इन नोटों का उत्पादन भी करता है। न्यूजीलैंड ने साल 1999 में अपने सभी कागजी नोटों को चलन से बाहर कर दिया था, जहां सबसे छोटा नोट 5 डॉलर और सबसे बड़ा 100 डॉलर का होता है। ब्रूनेई ने जाली नोटों के खतरे को देखते हुए पूरी तरह से प्लास्टिक नोटों को अपना लिया है। वियतनाम में 2003 में पॉलीमर नोटों की एंट्री हुई थी और आज वहां का 5 लाख का नोट, जो करीब 20 अमेरिकी डॉलर के बराबर है, पूरी तरह प्लास्टिक का है। यूरोप में रोमानिया ने 2005 में ही अपने सभी नोटों को पॉलीमर में बदल दिया था। पापुआ न्यू गिनी में 1975 तक ऑस्ट्रेलियन डॉलर चलता था, लेकिन फिर ‘कीना’ नाम की मुद्रा आई जो अब पूरी तरह प्लास्टिक की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 मई को पहली बार इसी देश के दौरे पर जा रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर नई तकनीक का विस्तार

प्लास्टिक नोटों का सफर 1988 में ऑस्ट्रेलिया के 10 डॉलर के नोट से शुरू हुआ था और आज यह सिंगापुर, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों तक फैल चुका है। कनाडा ने भी साल 2011 में इसे अपने सिस्टम में शामिल किया था। हालांकि, दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी माना जाने वाला अमेरिकी डॉलर पूरी तरह प्लास्टिक का नहीं होता है। अमेरिकी मुद्रा को कॉटन और लिनन के एक खास मिश्रण से तैयार किया जाता है। भारत भी अब इसी दिशा में कदम बढ़ाने की तैयारी में है ताकि देश की मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सके।

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