भारतीय वित्तीय जगत के लिए 5 जून 2026 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। एक ओर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए कई बड़े नीतिगत बदलावों की घोषणा की, तो दूसरी ओर शाम को देश की जीडीपी वृद्धि के उत्साहजनक आंकड़े सामने आए। इन दोनों संकेतों ने निवेशकों के बीच एक नई चर्चा छेड़ दी है कि क्या आने वाले समय में शेयर बाजार में बड़ी तेजी देखने को मिलेगी और हालांकि शुक्रवार को बाजार में उतार-चढ़ाव रहा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये फैसले लंबी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकते हैं।
RBI का रेपो रेट पर फैसला और विदेशी निवेश के लिए 7 बड़े ऐलान
भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखने का निर्णय लिया है। केंद्रीय बैंक ने अपना रुख न्यूट्रल रखा है, जिसका अर्थ है कि वह भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार किसी भी दिशा में कदम उठा सकता है। इस बार की नीति का मुख्य केंद्र बिंदु विदेशी निवेश को बढ़ावा देना और देश में डॉलर के प्रवाह को मजबूत करना रहा। इसके लिए आरबीआई गवर्नर ने सात प्रमुख घोषणाएं की हैं।
पहली बड़ी घोषणा के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 से सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा किए गए निवेश पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स को समाप्त कर दिया जाएगा। इसके अलावा, 15, 30 और 40 साल की नई सरकारी प्रतिभूतियों को फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) में शामिल किया गया है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए निवेश के विकल्प बढ़ेंगे। केंद्रीय बैंक ने जनरल रूट के तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) पर लगी कंसंट्रेशन लिमिट को भी हटा दिया है। साथ ही, प्रवासी भारतीयों (NRIs) और ओसीआई (OCIs) को अब सेबी पंजीकरण के बिना सूचीबद्ध शेयरों में अधिक निवेश करने की अनुमति दी गई है।
कॉरपोरेट और निर्यातकों के लिए राहत के उपाय
आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के लिए बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ECB) के तहत रियायती फॉरेक्स स्वैप विंडो की समय-सीमा को 30 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया है। इसी तरह, बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट जुटाने पर मिलने वाला हेजिंग कॉस्ट सपोर्ट भी 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगा। निर्यातकों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए, निर्यात से होने वाली कमाई को भारत वापस लाने की समय-सीमा को 15 महीने से घटाकर 9 महीने कर दिया गया है। इन सभी कदमों का उद्देश्य विदेशी पूंजी को आकर्षित करना और भारतीय वित्तीय बाजारों को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।
GDP के आंकड़ों ने दी मजबूती
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एक और अच्छी खबर सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से आई। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर के मुकाबले काफी बेहतर है। 7.7 प्रतिशत की यह विकास दर भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती को दर्शाती है और यह संकेत देती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश की आर्थिक गतिविधियां तेज बनी हुई हैं।
शेयर बाजार और रुपये की स्थिति
इन महत्वपूर्ण घोषणाओं के बीच, 5 जून को शेयर बाजार में मिला-जुला रुख देखने को मिला। कारोबार के अंत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स 116.67 अंक यानी 0.16 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,243.34 पर बंद हुआ। 85 अंक यानी 0.21 प्रतिशत फिसलकर 23,366.70 के स्तर पर रहा। बाजार में कुल 1,966 शेयरों में बढ़त देखी गई, जबकि 2,049 शेयरों में गिरावट रही और 197 शेयर अपरिवर्तित रहे।
दूसरी ओर, मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने जबरदस्त मजबूती दिखाई। आरबीआई के फैसलों के बाद रुपया डॉलर के मुकाबले 56 पैसे की छलांग लगाकर 95 रुपये 18 पैसे प्रति डॉलर पर बंद हुआ। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के उपायों से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है, जिससे रुपये को सहारा मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रुपया और मजबूत हो सकता है, जिससे विदेशी पूंजी का प्रवाह और बढ़ेगा।
भविष्य की राह और चुनौतियां
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई की नीति उम्मीदों के अनुरूप रही है और रुपये को मजबूती देने वाले उपायों से सकारात्मक माहौल बना है और हालांकि, महंगाई का दबाव और वैश्विक अनिश्चितताएं अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं भविष्य में चुनौती पेश कर सकती हैं और लेकिन 7.7 प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ और आरबीआई के विकास समर्थक रुख ने बाजार में नई उम्मीदें जगा दी हैं। यदि महंगाई नियंत्रण में रहती है, तो आने वाले महीनों में शेयर बाजार और निवेश गतिविधियों में एक नई तेजी देखने को मिल सकती है, जो भारतीय बाजार के लिए गेम चेंजर साबित होगी।