रुहुल्लाह मेहदी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और सांसदी से दिया इस्तीफा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट विस्तार से

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रुहुल्लाह मेहदी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और सांसदी से दिया इस्तीफा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट विस्तार से
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भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहाँ नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के प्रमुख नेता और लोकसभा सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने अपनी ही पार्टी और सांसदी से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। उनके इस फैसले से राजनीतिक हलकों में भूचाल आ गया है और हर तरफ इसी की चर्चा हो रही है। बडगाम के जहरा पार्क में उनके पिता की पुण्यतिथि के अवसर पर एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था, जहाँ उन्होंने हजारों समर्थकों की मौजूदगी में यह सनसनीखेज घोषणा की। रुहुल्लाह मेहदी ने खुलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के शीर्ष नेतृत्व और मुख्य रूप से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद से ही वह अपने 2024 के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रही है। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A के संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे का जिक्र करते हुए बेहद गंभीर आरोप लगाया और कहा कि उमर ने भाजपा के सामने घुटने टेक दिए हैं। इस कड़े बयान के बाद से राज्य की राजनीति में तनाव और बहस का माहौल और अधिक गहरा गया है।

अपनी इस घोषणा के दौरान रुहुल्लाह मेहदी ने अपने इस कठिन कदम के पीछे की मंशा को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह एक मुश्किल काम है, लेकिन वे इसे अपनी इच्छा से करना चाहते हैं। उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि वे इस बड़ी जिम्मेदारी को खुद उठाना चाहते हैं क्योंकि उनकी निजी नजर में यही एकमात्र समाधान बचा हुआ है। उनके आवास से लेकर मुख्य रैली स्थल तक के पूरे रास्ते में बड़े-बड़े बैनर और होर्डिंग्स लगाए गए थे, जो स्पष्ट रूप से उस राजनीतिक संदेश को दर्शा रहे थे जिसे वे जनता तक पहुँचाना चाहते थे। इन बैनरों पर लिखे गए शब्दों ने लोगों का विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया। एक बैनर पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर सीधा निशाना साधते हुए बड़े अक्षरों में लिखा गया था कि वादे कुर्सियों से कहीं बड़े होते हैं। इसके साथ ही दूसरे बैनर पर उनके राजनीतिक मूल्यों को उजागर करते हुए लिखा गया था कि चरित्र की राजनीति, सिद्धांतों की राजनीति ही असली राजनीति है। ये तमाम संदेश उनके विद्रोही तेवर और पार्टी लाइन से हटने की स्पष्ट गवाही दे रहे थे, जो उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा के इस पड़ाव पर अपनाए हैं।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर अपने हमले को और अधिक तेज करते हुए रुहुल्लाह मेहदी ने तंज कसा और कहा कि जिन लोगों ने अपनी टोपियाँ उतारकर मतदाताओं के चरणों में रखकर सत्ता की कुर्सी हासिल की है, उन्हें यहाँ इस जनसभा में आना चाहिए और देखना चाहिए कि सच्चे सम्मान और प्यार का वास्तविक अर्थ क्या होता है। उन्होंने आगे कहा कि आज जिस कुर्सी पर वे बैठे हैं, उसमें भले ही प्रशासनिक सत्ता या ताकत हो, लेकिन उस पद और कुर्सी के लिए जनता के दिलों में कोई सम्मान या आदर नहीं बचा है। उन्होंने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि वे अपना सिर केवल सर्वशक्तिमान अल्लाह के सामने ही झुकाते हैं और अपनी टोपी व पगड़ी भी केवल उन्हीं के चरणों में रखते हैं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि उन्हें कभी भी किसी अन्य व्यक्ति या ताकत के सामने इन्हें न झुकाना पड़े। उन्होंने मौजूदा सत्ताधीशों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आप अभी जिस कुर्सी पर बैठे हैं, वह आपके और हमारे दोनों के लिए ही दुख का एक बड़ा कारण बन चुकी है। उन्होंने बहुत ही दार्शनिक अंदाज में कहा कि आमतौर पर इस दुनिया में लोग अपनी कुर्सी छिन जाने पर बहुत दुखी होते हैं, लेकिन यहाँ एक अनोखा नजारा है जहाँ हम खुद ही स्वेच्छा से कुर्सी को ठुकरा रहे हैं, और ऐसा करने में हमें किसी प्रकार का कोई दुख नहीं बल्कि खुशी महसूस हो रही है।

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी कौन हैं और उनका राजनीतिक सफर कैसा रहा है। राजनीतिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने साल 2002 में अपनी राजनीतिक पारी की मजबूत शुरुआत करते हुए बडगाम विधानसभा सीट से पहली बार शानदार चुनावी जीत दर्ज की थी। वे लगातार तीन बार विधायक चुने गए, जिससे क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ का अंदाजा लगाया जा सकता है और इसके बाद उन्होंने प्रशासनिक और विधायी अनुभव हासिल करते हुए साल 2009 से लेकर साल 2014 के लंबे अंतराल तक उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी बहुत जिम्मेदारी से काम किया था। उनके राजनीतिक करियर में एक नया और बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने साल 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए पहली बार संसद पहुंचे। लेकिन सांसद बनने के कुछ ही समय बाद पार्टी नेतृत्व के साथ वैचारिक मतभेदों और वादों से पीछे हटने के आरोपों के चलते उन्होंने यह ऐतिहासिक कदम उठाया है, जिसने नेशनल कॉन्फ्रेंस के भविष्य पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

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