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रूस-भारत तेल व्यापार: लावरोव ने ट्रंप के दावों को किया खारिज

रूस-भारत तेल व्यापार: लावरोव ने ट्रंप के दावों को किया खारिज
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रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत द्वारा रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। लावरोव ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा, यह दावा केवल अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से किया जा रहा है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि रूस और भारत के बीच हुए तेल और अन्य रणनीतिक समझौते पूरी तरह से सुरक्षित हैं और उन पर किसी भी बाहरी दबाव का कोई खतरा नहीं है। यह बयान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर वाशिंगटन के दावों को चुनौती देता है।

पृष्ठभूमि के रूप में, पिछले सप्ताह राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ एक नए फ्रेमवर्क व्यापार समझौते की घोषणा की थी। इस दौरान उन्होंने दावा किया था कि भारत ने यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण को रोकने के अमेरिकी प्रयासों के तहत रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने पर सहमति जताई है। अमेरिका का तर्क रहा है कि रूस तेल निर्यात से प्राप्त राजस्व का उपयोग सैन्य अभियानों में कर रहा है। हालांकि, लावरोव के हालिया बयान ने इन दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है और द्विपक्षीय व्यापार की निरंतरता की पुष्टि की है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता

भारत सरकार ने भी इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न वैश्विक स्रोतों से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आपूर्ति श्रृंखला को स्थिर रखना और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भारत की राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है। 4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। विश्लेषकों के अनुसार, भारत का यह रुख उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है, जहां वह किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है।

अमेरिकी टैरिफ और व्यापारिक दबाव की राजनीति

रूस और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों को प्रभावित करने के लिए अमेरिका ने पूर्व में भी कड़े कदम उठाए हैं। अगस्त 2025 में, अमेरिका ने रूसी तेल खरीद के कारण भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने फिर से चेतावनी दी है कि यदि भारत ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रूसी तेल का आयात जारी रखा, तो यह दंडात्मक टैरिफ फिर से लागू किया जा सकता है। लावरोव ने इस नीति की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका टैरिफ और प्रतिबंधों के माध्यम से दुनिया भर में अपना आर्थिक दबदबा बनाए रखना चाहता है। उनके अनुसार, यह दबाव विशेष रूप से ब्रिक्स देशों के बीच बढ़ते सहयोग को लक्षित कर रहा है।

ब्रिक्स और द्विपक्षीय सहयोग पर लावरोव का रुख

सर्गेई लावरोव ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह भारत और रूस के बीच निवेश, सैन्य सहयोग और व्यापारिक संबंधों को बाधित करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन की नीतियां अब अधिक आक्रामक रूप से सामने आ रही हैं। लावरोव के अनुसार, रूस और भारत के बीच संबंध केवल तेल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक बहुआयामी रणनीतिक साझेदारी है। विश्लेषकों का मानना है कि रूस के साथ भारत का व्यापारिक संतुलन बनाए रखना न केवल ऊर्जा के लिए बल्कि रक्षा और तकनीकी सहयोग के लिए भी आवश्यक है। लावरोव ने विश्वास व्यक्त किया कि दोनों देश आपसी हितों के आधार पर अपने सहयोग को और मजबूत करेंगे।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और भविष्य के संकेत

राजनयिक विश्लेषकों के अनुसार, लावरोव का यह बयान रूस की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह पश्चिमी देशों को यह दिखाना चाहता है कि उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदार उसके साथ खड़े हैं। भारत के लिए यह एक संतुलनकारी कार्य है, जहां उसे एक तरफ अमेरिका के साथ अपने बढ़ते व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को बचाना है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ अपने पुराने और विश्वसनीय ऊर्जा संबंधों को बनाए रखना है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ सकता है, लेकिन भारत की ऊर्जा मांग और रूस की प्रतिस्पर्धी कीमतों को देखते हुए, तेल व्यापार में तत्काल बड़े बदलाव की संभावना कम दिखाई देती है।

निष्कर्षतः, रूस और भारत के बीच तेल व्यापार का मुद्दा अब केवल आर्थिक न रहकर एक जटिल भू-राजनीतिक मुद्दा बन गया है। जहां अमेरिका इसे प्रतिबंधों के माध्यम से नियंत्रित करना चाहता है, वहीं रूस और भारत इसे अपनी संप्रभुता और आर्थिक आवश्यकता के रूप में देख रहे हैं। लावरोव के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल रूस-भारत तेल समझौतों में कोई बदलाव नहीं होने वाला है, जो ट्रंप के दावों के विपरीत एक अलग कूटनीतिक वास्तविकता पेश करता है।

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