MiG-21 Retire: भारत के आसमान का सबसे सजग प्रहरी, मिग-21, आज अपने गौरवशाली इतिहास के साथ विदा हो रहा है। चंडीगढ़ में आयोजित विदाई समारोह में वायु सेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह मिग-21 के बादल फॉर्मेशन को फ्लाई करेंगे। यह क्षण न केवल भारतीय वायुसेना के लिए, बल्कि देश के लिए भी भावुक और ऐतिहासिक है। आइए, फ्लैशबैक में चलकर मिग-21 के उस गौरवशाली सफर को याद करें, जिसने भारत के आसमान को अभेद्य बनाया।
मिग-21 का भारत में आगमन
भारतीय वायुसेना में मिग-21 की कहानी अगस्त 1962 में शुरू हुई। उस समय पाकिस्तानी वायुसेना के पास अमेरिका द्वारा आपूर्ति किया गया F-104 स्टारफाइटर था, जो उस दौर का सबसे आधुनिक सुपरसोनिक लड़ाकू विमान था। भारत को इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए एक शक्तिशाली सुपरसोनिक जेट की जरूरत थी। फ्रेंच और अमेरिकी विमानों के विकल्प मौजूद थे, लेकिन भारत ने सोवियत संघ के मिग-21 को चुना।
1963 में मिग-21 को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया। यह भारत का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट था। सात भारतीय पायलटों ने ताशकंद में प्रशिक्षण लिया और अप्रैल 1963 में चंडीगढ़ में नंबर 28 स्क्वाड्रन के तहत पहली मिग-21 स्क्वाड्रन की स्थापना हुई, जिसे "द फर्स्ट सुपरसोनिक्स" का नाम दिया गया। छह मिग-21 जेट्स के साथ यह स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना की रीढ़ बन गई।
युद्धों में मिग-21 की शानदार भूमिका
मिग-21 ने अपनी तेज रफ्तार, हल्के वजन और मारक क्षमता के दम पर हर युद्ध में भारत का परचम लहराया।
1965 का भारत-पाक युद्ध: इस युद्ध में मिग-21 का योगदान सीमित रहा, लेकिन इसने अपनी मौजूदगी दर्ज की।
1971 का युद्ध: मिग-21 ने इस युद्ध में अपनी असली ताकत दिखाई। इसने पाकिस्तान के चार F-104 स्टारफाइटर, दो F-6, एक F-86 और एक C-130 हरक्युलिस विमान को मार गिराया। ढाका में गवर्नर हाउस पर मिग-21 का पिन-पॉइंट अटैक आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
1999 का करगिल युद्ध: मिग-21 ने एक बार फिर अपनी जांबाजी दिखाई। जब पाकिस्तानी अटलांटिक जेट ने भारतीय हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया, तो मिग-21 ने उसे आसमान में ही ढेर कर दिया।
2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक: मिग-21 ने पाकिस्तान के F-16 को मार गिराकर अपनी वीरता का एक और परिचय दिया।
आसमान का टाइगर और उड़ता ताबूत
एक समय था जब भारतीय वायुसेना में 800 से ज्यादा मिग-21 उड़ान भर रहे थे। इसकी शक्ति, गति और मारक क्षमता ने इसे "आसमान का टाइगर" बनाया। दुश्मन इसके नाम से कांपते थे। हालांकि, समय के साथ इसके कुछ तकनीकी दोषों और हादसों के कारण इसे "उड़ता ताबूत" (Flying Coffin) भी कहा जाने लगा। इन खामियों के चलते भारतीय वायुसेना ने इसे रिटायर करने का फैसला किया।
मिग-21 की विदाई
आज चंडीगढ़ में मिग-21 की आखिरी उड़ान होगी। यह न केवल एक विमान की विदाई है, बल्कि भारतीय वायुसेना के एक युग का अंत है। मिग-21 ने छह दशकों तक भारत के आसमान की रक्षा की और हर चुनौती में देश का गौरव बढ़ाया। इसकी जगह अब आधुनिक विमान जैसे तेजस और राफेल ले रहे हैं, लेकिन मिग-21 की गौरव गाथा हमेशा भारतीय वायुसेना के इतिहास में अमर रहेगी।