केरल की सत्ता की दौड़ में पिछले कई दिनों से चल रहे सस्पेंस और राजनीतिक उठापटक का अंत आखिरकार कांग्रेस आलाकमान के एक बड़े फैसले के साथ हुआ। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और इंडिया गठबंधन की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के एक निर्णायक फोन कॉल ने केरल के अगले मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगा दी। इस फैसले के साथ ही वीडी सतीशन को केरल की सत्ता की कमान सौंप दी गई है, जबकि अंतिम समय तक केसी वेणुगोपाल का नाम इस दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा था। इस पूरे घटनाक्रम ने केरल कांग्रेस के भीतर के समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
कैसे पलटा पूरा समीकरण
केरल में कांग्रेस विधायक दल (CLP) के नेता के चयन को लेकर स्थिति काफी समय से फंसी हुई थी। पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं और सूत्रों के मुताबिक, बड़ी संख्या में विधायक केसी वेणुगोपाल के समर्थन में थे। राज्य प्रभारी दीपा दासमुंशी ने भी अपने संकेतों में इस बात की पुष्टि की थी कि वेणुगोपाल के पक्ष में बहुमत का समर्थन दिखाई दे रहा है। इस गतिरोध को सुलझाने के लिए राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से मोर्चा संभाला था। उन्होंने केरल के विभिन्न नेताओं से अलग-अलग स्तर पर लंबी बातचीत की और वरिष्ठ नेताओं को दिल्ली तलब किया। राहुल गांधी ने इस विषय पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ भी विस्तृत चर्चा की, लेकिन इसके बावजूद कोई अंतिम फैसला नहीं हो पा रहा था और सस्पेंस बरकरार रहा।
सोनिया गांधी की एंट्री और निर्णायक कॉल
जब मुख्यमंत्री पद का मामला पूरी तरह से उलझ गया और दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक कयासों का दौर तेज हो गया, तब इंडिया गठबंधन की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया। सोनिया गांधी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केरल के सबसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता और अपने अत्यंत विश्वस्त सहयोगी ए के ऐंटनी से फोन पर संपर्क किया। सोनिया गांधी और ए के ऐंटनी के बीच हुई यह बातचीत ही अंततः केरल की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हुई। ऐंटनी ने सोनिया गांधी को राज्य की जमीनी हकीकत और भविष्य के राजनीतिक जोखिमों के बारे में विस्तार से जानकारी दी, जिसके बाद पूरा परिदृश्य बदल गया।
वेणुगोपाल के खिलाफ दिए गए तर्क
ए के ऐंटनी ने सोनिया गांधी के साथ हुई चर्चा के दौरान केसी वेणुगोपाल के नाम पर पुनर्विचार करने की सलाह दी। उन्होंने इसके पीछे व्यावहारिक और राजनीतिक दोनों तरह के जोखिमों का हवाला दिया। ऐंटनी ने स्पष्ट किया कि केसी वेणुगोपाल वर्तमान में सांसद हैं और यदि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो उन्हें अपनी लोकसभा सीट छोड़नी पड़ेगी। इसके परिणामस्वरूप राज्य में दो उपचुनाव कराने की स्थिति पैदा हो जाएगी। हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के बाद तुरंत उपचुनाव कराना पार्टी के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। ऐंटनी का मानना था कि इससे पार्टी को अनावश्यक राजनीतिक खतरा उठाना पड़ सकता है, जिससे बचा जाना चाहिए।
सतीशन के पक्ष में अहम बिंदु
ए के ऐंटनी ने वीडी सतीशन के पक्ष में मजबूती से अपनी बात रखी। उन्होंने सोनिया गांधी को बताया कि जनता का जनादेश वीडी सतीशन के नाम पर अधिक स्पष्ट और सकारात्मक है। इसके अलावा, केरल में कांग्रेस के सहयोगी दल भी सतीशन के नाम को सहजता से स्वीकार कर रहे हैं। ऐंटनी ने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्य के नेतृत्व को दिल्ली से थोपने का संदेश जनता के बीच नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इससे पार्टी की छवि प्रभावित हो सकती है। इन तर्कों ने सोनिया गांधी के निर्णय को एक नई दिशा दी और उन्होंने सतीशन के नाम पर अपनी सहमति दे दी।
राहुल-प्रियंका की भूमिका और ऐंटनी फैक्टर
सोनिया गांधी द्वारा फैसला लिए जाने के बाद, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने केसी वेणुगोपाल से सीधी बातचीत की। उन्होंने वेणुगोपाल को केंद्र में ही अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के लिए राजी किया। इसके बाद औपचारिक प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पर्यवेक्षकों को केरल भेजा गया, जहां वीडी सतीशन को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुन लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में 'ऐंटनी फैक्टर' सबसे महत्वपूर्ण रहा। ए के ऐंटनी, जो अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हैं, लंबे समय से सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकारों में शामिल रहे हैं और केरल की राजनीति में उनका गहरा प्रभाव और संतुलित दृष्टिकोण एक बार फिर कांग्रेस के बड़े फैसलों में निर्णायक साबित हुआ।