भारतीय कॉर्पोरेट जगत के सबसे शक्तिशाली और 300 अरब डॉलर से अधिक के साम्राज्य टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के शीर्ष नेतृत्व में बड़े फेरबदल की आहट ने दलाल स्ट्रीट और वैश्विक निवेशकों को चौंका दिया है। ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा संस की शक्तिशाली नामांकन और पारिश्रमिक समिति (NRC) अपने चेयरमैन एन चंद्रशेखरन से पद छोड़ने के उनके संभावित विचार पर पुनर्विचार करने का औपचारिक अनुरोध करने जा रही है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब समूह कई बड़े रणनीतिक बदलावों के दौर से गुजर रहा है और नेतृत्व की निरंतरता को समूह की स्थिरता के लिए अनिवार्य माना जा रहा है।
नेतृत्व परिवर्तन की पृष्ठभूमि
साल 2017 में साइरस मिस्त्री के विवादित निकास के बाद टाटा समूह की कमान संभालने वाले एन चंद्रशेखरन का दूसरा कार्यकाल साल 2027 की शुरुआत में समाप्त हो रहा है। हालांकि, चंद्रशेखरन द्वारा एक और कार्यकाल न लेने और नए नेतृत्व को जिम्मेदारी सौंपने के संकेतों ने टाटा बोर्ड को हरकत में ला दिया है और एनआरसी, जो निदेशकों और प्रमुख अधिकारियों के चयन और उनके वेतन-भत्ते तय करने के लिए जिम्मेदार होती है, का मानना है कि चंद्रशेखरन का पद पर बने रहना समूह के भविष्य के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है। इस समिति में हरीश मनवानी, अनीता मारंगोली जॉर्ज और वेणु श्रीनिवासन जैसे अनुभवी सदस्य शामिल हैं।
आरबीआई का फैसला और लिस्टिंग का दबाव
यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि दो साल से ज्यादा समय तक रेगुलेटरी स्तर पर कोई प्रतिक्रिया न मिलने के बाद, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने टाटा संस की NBFC लाइसेंस सरेंडर करने की अपील ठुकरा दी है। आरबीआई के इस फैसले के बाद कंपनी को तुरंत शेयर बाजार में लिस्ट होने का निर्देश दिया गया है। टाटा संस की सीआईसी (कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी) स्टेटस को सरेंडर करने की अर्जी खारिज होने के बाद अब होल्डिंग कंपनी के शेयर बाजार में अनिवार्य लिस्टिंग का कानूनी काउंटडाउन शुरू हो चुका है। ऐसे में जब कंपनी एक पब्लिक कंपनी बनने के दौर में है, तो बोर्ड का मानना है कि चंद्रा का चेयरमैन बने रहना और भी जरूरी हो गया है ताकि ग्रुप में स्थिरता और निरंतरता बनी रहे।
चंद्रशेखरन के नेतृत्व में ऐतिहासिक उपलब्धियां
एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने कई ऐतिहासिक रणनीतिक बदलाव किए हैं। उनके कार्यकाल में ही समूह ने एयर इंडिया की ऐतिहासिक घर वापसी कराई। इसके अलावा, उन्होंने भारत का पहला घरेलू सेमीकंडक्टर प्लांट गुजरात में स्थापित करने की नींव रखी और बैटरी गीगाफैक्ट्री जैसे भविष्य के मेगा-प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की। टाटा डिजिटल और टाटा न्यू जैसे प्रोजेक्ट्स भी उनके विजन का हिस्सा रहे हैं। बोर्ड का मानना है कि जब ग्रुप रेगुलेटरी और कैपिटल मार्केट में बदलाव के दौर से गुजर रहा है, तो ऐसे में लीडरशिप में बदलाव करना दोहरी चुनौती साबित हो सकता है। उनकी संस्थागत जानकारी और अनुभव एक मजबूत आधार बनेंगे, खासकर तब जब टाटा संस एक लिस्टेड कंपनी के तौर पर ज्यादा कड़ी निगरानी में काम करने की तैयारी कर रहा है।
टाटा ट्रस्ट्स और एनआरसी के बीच संभावित टकराव
एनआरसी का यह कदम टाटा संस के सबसे बड़े शेयरहोल्डर टाटा ट्रस्ट्स के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है। टाटा ट्रस्ट्स ने पहले ही चंद्रा के फैसले को स्वीकार करते हुए एक बयान जारी किया था, जिसमें उनके अगले कार्यकाल न लेने की बात कही गई थी और अब एनआरसी उनसे इस फैसले पर दोबारा सोचने के लिए कहेगी। यह मामला 17 सितंबर को होने वाली बोर्ड मीटिंग में उठने की संभावना है। अगर चंद्रा अपने फैसले पर दोबारा विचार करते हैं, तो उन्हें टाटा ट्रस्ट्स के समर्थन की जरूरत होगी और उन्हें सालाना आम बैठक (AGM) में डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्त किया जाना होगा।
कानूनी अड़चनें और शेयरधारकों के हित
इस पूरी प्रक्रिया में कुछ कानूनी अड़चनें भी शामिल हैं और 37 प्रतिशत हिस्सेदारी है, और उनके हितों को साधना भी बोर्ड के लिए एक प्राथमिकता है। इसके अलावा, मुख्य शेयरहोल्डर सर रतन टाटा ट्रस्ट को महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने अहम फैसले लेने से रोक दिया है। यह रोक ट्रस्ट द्वारा नियमों के उल्लंघन की जांच पूरी होने तक लगाई गई है और इस कानूनी रोक के कारण भी दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया में देरी हो सकती है। हालांकि, एनआरसी का तर्क है कि 300 अरब डॉलर के इस साम्राज्य को इस महत्वपूर्ण मोड़ पर एक अनुभवी नेतृत्व की आवश्यकता है जो इसे लिस्टिंग और भविष्य की चुनौतियों के पार ले जा सके।