टाटा ट्रस्ट्स बनाम संस: चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर कानूनी जंग की तैयारी, 100 साल पुराना रिश्ता दांव पर

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टाटा ट्रस्ट्स बनाम संस: चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर कानूनी जंग की तैयारी, 100 साल पुराना रिश्ता दांव पर
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भारत के सबसे प्रतिष्ठित और पुराने व्यापारिक समूहों में से एक, टाटा ग्रुप के भीतर एक बड़ा आंतरिक विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद अब बोर्डरूम की सीमाओं को लांघकर कोर्टरूम तक पहुंचने की कगार पर है। इस पूरे विवाद की जड़ टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति है। टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में बहुसंख्यक हिस्सेदारी रखता है, ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। नोएल टाटा के नेतृत्व में ट्रस्ट्स अब इस फैसले को कानूनी रूप से चुनौती देने की तैयारी कर रहा है, जो इन दोनों संस्थाओं के बीच 100 साल पुराने रिश्ते में एक बड़ी दरार का संकेत दे रहा है। स्थिति ऐसी बन गई है कि चंद्रशेखरन के कार्यकाल पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की जा सकती है।

विरोध का मुख्य कारण और नोएल टाटा का पत्र

विवाद तब और गहरा गया जब पिछले हफ्ते शुक्रवार को नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा। टाटा संस के कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय को भेजे गए इस पत्र में, जिसे सभी निदेशकों को भी मार्क किया गया था, नोएल टाटा ने स्पष्ट रूप से कहा कि चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव शुरुआत से ही अमान्य यानी null and void ab initio है। उन्होंने मांग की है कि कंपनी उस बैठक की कार्यवाही के संबंध में सार्वजनिक रूप से सुधार जारी करे और फिलहाल टाटा ट्रस्ट्स टाटा संस के आधिकारिक जवाब का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद ही नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) या बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। यह कदम बहुसंख्यक शेयरधारकों के अधिकारों और कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की व्याख्या के आधार पर उठाया जाएगा।

कानूनी खर्च और ट्रस्टियों के बीच मतभेद

इस स्तर की कानूनी लड़ाई में भारी भरकम खर्च होना तय है और टाटा ट्रस्ट्स को उम्मीद है कि वह इस विवाद से जुड़े कानूनी खर्चों की भरपाई खुद करेगा। ट्रस्ट्स ने पहले भी कानूनी खर्चों के लिए प्रस्ताव पारित किए हैं और ऐसे मुकदमों के लिए पर्याप्त बीमा कवर भी मौजूद है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, दो प्रमुख ट्रस्टियों, विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन ने ऐसे प्रस्तावों पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उनका तर्क है कि ट्रस्ट्स से जुड़े किसी भी कानूनी मामले पर एकमुश्त फैसला लेने के बजाय हर केस के आधार पर अलग से विचार किया जाना चाहिए। यह आंतरिक मतभेद तब सामने आया है जब ट्रस्ट्स सीधे बोर्ड के फैसले को चुनौती देने की तैयारी में है।

आरबीआई की भूमिका और लिस्टिंग का दबाव

इस कानूनी पेचीदगी में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी प्रवेश किया है। आरबीआई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक कैविएट याचिका दायर की है। नियामक का कहना है कि अगर टाटा ट्रस्ट्स टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग के निर्देश के खिलाफ कोई राहत मांगता है, तो पहले आरबीआई का पक्ष भी सुना जाना चाहिए। आरबीआई का मानना है कि टाटा संस को नियमों के तहत एक पब्लिक कंपनी बनना अनिवार्य है। यही वह नियामक दबाव है जिसके कारण बोर्ड ने वे फैसले लिए हैं जिनका नोएल टाटा विरोध कर रहे हैं।

बोर्ड मीटिंग का विवाद और विशेषज्ञों की राय

पिछले हफ्ते हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक में काफी तीखी बहस हुई थी। बहुमत वाले सदस्यों ने टाटा संस की लिस्टिंग और चंद्रशेखरन की चेयरमैन पद पर वापसी के पक्ष में मतदान किया, लेकिन नोएल टाटा ने इन दोनों ही प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया। इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। एएनबी लीगल के फाउंडिंग पार्टनर आशीष भक्ता का कहना है कि एनसीएलटी राहत मांगने के लिए सही मंच है, लेकिन अगर मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका भी दायर की जा सकती है। वहीं क्वाड्रा लीगल के हिमांशु विधानी का मानना है कि टाटा संस को किसी फोरम में जाने की जरूरत नहीं है, उनके लिए असली चुनौती बॉम्बे हाईकोर्ट में आरबीआई की स्थिति को लेकर है।

दिग्गज वकीलों की दलीलें

इस हाई-प्रोफाइल मामले में देश के बड़े वकील भी आमने-सामने हैं। टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष रख रहे सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि शेयरधारक-मालिकों के मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता और उन्होंने याद दिलाया कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस का 100 साल से ज्यादा पुराना रिश्ता है और इन्हें अलग करना नामुमकिन है। सिंघवी के अनुसार, दशकों से चले आ रहे वीटो पावर और सर्वसम्मति के नियमों को नजरअंदाज करना अनुचित है। दूसरी ओर, टाटा संस के चेयरमैन का समर्थन कर रहे सीनियर वकील हरीश साल्वे ने टाटा संस की कानूनी स्थिति को पूरी तरह सही बताया है और साल्वे का तर्क है कि कंपनी को आरबीआई के नियमों का पालन करना ही होगा और पब्लिक कंपनी बनना जरूरी है।

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