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ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस': पाकिस्तान समेत 20 देशों ने मिलाया हाथ, भारत ने बनाई दूरी

ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस': पाकिस्तान समेत 20 देशों ने मिलाया हाथ, भारत ने बनाई दूरी
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान एक ऐतिहासिक और विवादास्पद कदम उठाते हुए 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) का औपचारिक उद्घाटन किया। इस अंतरराष्ट्रीय निकाय का उद्देश्य वैश्विक संघर्षों को सुलझाना है, जिसकी शुरुआत गाजा के पुनर्निर्माण और वहां के शासन की निगरानी से होगी और अमेरिकी नेतृत्व पर उठते सवालों के बीच ट्रंप ने इस चार्टर पर हस्ताक्षर समारोह आयोजित किया, जिसमें पाकिस्तान और तुर्की सहित करीब 20 देशों ने अपनी सहमति जताई।

क्या है ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस'?

यह बोर्ड एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के रूप में पेश किया गया है, जो शुरू में इजरायल-हमास युद्ध के बाद गाजा में शांति बहाली और मानवीय सहायता पर केंद्रित था। हालांकि, अब इसका दायरा बढ़ाकर यूक्रेन युद्ध और अन्य क्षेत्रीय विवादों तक फैला दिया गया है और इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर का 'प्राइस टैग' रखा गया है। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वह स्वयं इस बोर्ड की अध्यक्षता करेंगे। और चार्टर के अनुसार वे जीवन भर इस पद पर रह सकते हैं।

इन प्रमुख देशों ने किया हस्ताक्षर

ट्रंप के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को कई मुस्लिम बहुल और एशियाई देशों का समर्थन मिला है। हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख नेताओं में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति। जेवियर मिलेई, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो और अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव शामिल हैं। इसके अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, कतर, जॉर्डन, तुर्की। और वियतनाम जैसे देशों ने भी इस चार्टर का समर्थन किया है। ट्रंप ने इसे 'सबसे प्रभावशाली' नेताओं का समूह बताया है।

भारत और पश्चिमी देशों ने क्यों बनाई दूरी?

भारत ने फिलहाल इस चार्टर पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसमें शामिल होने का निमंत्रण मिला था, लेकिन भारत ने इस पर चुप्पी साधी हुई है। भारत के अलावा चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने भी इस समारोह से दूरी बनाई। ब्रिटेन की विदेश मंत्री यवेट कूपर ने स्पष्ट किया कि रूस की संभावित भागीदारी और कानूनी जटिलताओं के कारण वे इसमें शामिल नहीं होंगे। यूरोपीय देशों को डर है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र (UN) की प्रासंगिकता को खत्म कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के लिए चुनौती?

आलोचकों का मानना है कि ट्रंप का यह बोर्ड संयुक्त। राष्ट्र के समानांतर एक नई व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश है। हालांकि ट्रंप ने कहा कि UN को जारी रहना चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह बोर्ड उन कामों को पूरा करेगा जो UN नहीं कर पाया। ट्रंप ने दावा किया कि करीब 35 देश इस परियोजना में शामिल होने। के लिए सहमत हो चुके हैं, जबकि 60 देशों को आमंत्रित किया गया था।

भविष्य की राह और चुनौतियां

इस बोर्ड की सफलता गाजा में युद्धविराम की स्थिरता और वैश्विक शक्तियों के सहयोग पर निर्भर करेगी। जहां एक ओर ट्रंप इसे 'काम पूरा करने वाले' नेताओं का समूह कह रहे हैं, वहीं रूस और चीन जैसे देशों ने अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। पुतिन ने कहा है कि वे अपने रणनीतिक साझेदारों से चर्चा के बाद ही कोई फैसला लेंगे और दावोस में हुआ यह घटनाक्रम आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति की नई दिशा तय कर सकता है।

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