ईरान पर फाइनल अटैक या लंबी घेराबंदी: कैंप डेविड में ट्रंप की बड़ी प्लानिंग?

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ईरान पर फाइनल अटैक या लंबी घेराबंदी: कैंप डेविड में ट्रंप की बड़ी प्लानिंग?
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अरब देशों में युद्धविराम की घड़ी अब खत्म होने की कगार पर है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि इसके बाद मिसाइलें शांत रहेंगी या फिर युद्ध का एक नया और भयानक दौर शुरू होगा। अमेरिका की हालिया सैन्य और कूटनीतिक हलचल ने इस सस्पेंस को और अधिक गहरा कर दिया है। एक तरफ वाशिंगटन ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए हर संभव विकल्प तैयार कर रहा है, तो दूसरी तरफ तेहरान भी पीछे हटने के कोई संकेत नहीं दे रहा है। होर्मुज से लेकर अरब सागर तक तनाव की एक ऐसी लकीर खिंच चुकी है, जहां एक भी गलत फैसला पूरे खाड़ी क्षेत्र को फिर से गहरे संकट में धकेल सकता है।

अगले 24 घंटे और ट्रंप के चार बड़े संकेत

अरब देशों के लिए अगले 24 घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि ईरान को लेकर अमेरिका कोई बहुत बड़ा और निर्णायक फैसला ले सकता है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप युद्धविराम की मियाद खत्म होने का ही इंतजार कर रहे थे और अब वह कुछ बड़ा करने की तैयारी में हैं। इस स्थिति को समझने के लिए चार प्रमुख संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है। पहला संकेत यह है कि ट्रंप अचानक कैंप डेविड पहुंच गए हैं। दूसरा संकेत यह है कि अरब सागर में USS जॉर्ज बुश को एक बड़े ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। तीसरा संकेत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का CENTCOM मुख्यालय पहुंचना है। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि अमेरिकी सैन्य लॉजिस्टिक्स को ईरानी जवाबी हमलों से बचाने का एक विस्तृत प्लान तैयार कर लिया गया है।

इन घटनाओं को अगर अलग-अलग देखा जाए तो ये सामान्य सैन्य गतिविधि लग सकती हैं, लेकिन युद्धविराम की डेडलाइन के ठीक पहले इनका एक साथ होना तस्वीर को काफी गंभीर बना देता है। यह इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका हर स्थिति के लिए खुद को तैयार कर रहा है।

कैंप डेविड में क्या पक रहा है?

वाशिंगटन के शोर-शराबे से दूर मैरीलैंड की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित कैंप डेविड सिर्फ राष्ट्रपति के आराम करने की जगह नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप का अचानक वहां पहुंचना इस बात का प्रतीक है कि कोई बहुत बड़ी प्लानिंग चल रही है। अमेरिकी इतिहास गवाह है कि कैंप डेविड का इस्तेमाल हमेशा ऐसे समय में किया गया है जब कैमरों की रोशनी से दूर रहकर बड़े कूटनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर चर्चा करनी होती है।

अब सवाल यह है कि क्या कैंप डेविड में शांति बचाने का कोई अंतिम फॉर्मूला तैयार हो रहा है या फिर युद्धविराम खत्म होने के बाद की अमेरिकी सैन्य रणनीति तय की जा रही है। युद्ध जैसी स्थिति में राष्ट्रपति के पास मुख्य रूप से दो ही विकल्प होते हैं: शांति या हमला। ट्रंप इनमें से किसी एक बटन को दबाने की तैयारी में हैं। हालांकि, इसके बीच में आर्थिक प्रतिबंध, नाकाबंदी, सैन्य दबाव और सहयोगी देशों का भरोसा बनाए रखने जैसी बड़ी चुनौतियां भी शामिल हैं और ट्रंप के सामने सबसे मुश्किल काम यह है कि कैसे ईरान को अपनी शर्तों पर झुकाया जाए, ताकि अमेरिका को कम से कम सैन्य नुकसान उठाना पड़े।

ईरान का काउंटर अटैक और अमेरिका की बेस शिफ्टिंग रणनीति

अमेरिका को इस बात का पूरा आभास है कि अगर उसने हमला किया, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा और जवाबी हमला जरूर करेगा। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिका ने अपने सैन्य ठिकानों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने की योजना बनाई है। इस योजना के तहत सबसे पहले बहरीन स्थित 5th फ्लीट हेडक्वार्टर को हटाया जा सकता है। ईरान से रोटा नेवल स्टेशन की दूरी 5000 किमी है, जबकि ईरान की मिसाइलों की अधिकतम मारक क्षमता 3000 किमी तक ही है। इस तरह अमेरिका अपने बेड़े को ईरानी मिसाइलों की पहुंच से बाहर कर लेगा।

इसी रणनीति के तहत कुवैत के कैंप आरिफजान को ब्रिटेन के लेकेनहीथ रॉयल बेस में शिफ्ट किया जा सकता है, जो तेहरान से 4500 किमी की दूरी पर स्थित है। वहां तक भी ईरानी मिसाइलें नहीं पहुंच सकतीं, जिससे अमेरिकी लॉजिस्टिक पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा, कतर के अल-उदैद एयरबेस को जर्मनी के रम्सटाइन एयरबेस पर शिफ्ट करने की योजना है, जो तेहरान से 4400 किमी दूर है। इससे CENTCOM कमांड सेंटर को अभेद्य सुरक्षा मिल जाएगी।

अरब देशों पर मंडराता खतरा

सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस को हिंद महासागर में स्थित ब्रिटेन के डिएगो गार्सिया पर शिफ्ट किया जा सकता है, जिससे उसे एक मजबूत सुरक्षा कवच मिलेगा। इसी तरह, UAE के अल-दफरा एयर बेस को इटली के एविआनो एयरबेस में शिफ्ट किया जा सकता है। यह स्थान ईरान की 3000 किमी की मिसाइल रेंज से बाहर 3500 किमी की दूरी पर है। इस कदम से अमेरिका के स्टेल्थ जेट और जासूसी विमानों को ईरानी हमलों से बचाया जा सकेगा।

अगर ईरान अमेरिकी दबाव को स्वीकार नहीं करता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर भीषण संघर्ष का केंद्र बन सकता है। अरब देशों में हालात बेहद खौफनाक हो सकते हैं, यही वजह है कि अमेरिका ने इतनी तेजी से अपने सैन्य ठिकाने बदलने का प्लान बनाया है और वर्तमान में डिएगो गार्सिया पर भी सैन्य तैनाती बढ़ाई जा रही है ताकि समुद्र में अमेरिकी शक्ति कमजोर न पड़े। लेकिन इस पूरी रणनीति में एक बड़ा खतरा भी छिपा है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका यह सब किसी समझौते के लिए कर रहा है या फिर वह ईरान की लंबी आर्थिक घेराबंदी की तैयारी में है। अमेरिका युद्धविराम के बाद पैदा होने वाले किसी भी सैन्य संकट के लिए अपने सभी विकल्प खुले रखना चाहता है, लेकिन ईरान के कड़े तेवरों से यह स्पष्ट है कि फिलहाल अमेरिका के पास होर्मुज को नियंत्रित करने का कोई आसान रास्ता नहीं है।

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