अमेरिकी प्रशासन ने वैश्विक फार्मास्युटिकल बाजार में एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक कदम उठाते हुए विदेशी जेनेरिक दवाओं के आयात पर एक नए टैरिफ स्ट्रक्चर की घोषणा की है। इस नीति का सीधा मकसद अमेरिका में दवाओं के घरेलू उत्पादन यानी डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और भारत तथा चीन जैसे देशों से आने वाली सस्ती जेनेरिक दवाओं पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह से खत्म करना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि अमेरिका में आने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर 1 अगस्त से दो साल तक 0 फीसदी टैरिफ लगेगा। इसके बाद, टैरिफ की दर एक साल के लिए 100 फीसदी और उसके बाद 200 फीसदी कर दी जाएगी। इस फैसले की बारीकियां और इसकी समय सीमा भारतीय अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से फार्मा सेक्टर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत इन दवाओं का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।
ट्रंप का नया जेनेरिक ड्रग टैरिफ प्लान और उसके चरण
ट्रंप के इस नए प्लान को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया गया है ताकि दवा आपूर्ति श्रृंखला के संक्रमण को प्रबंधित किया जा सके। पहला चरण शुरुआती 2 साल का होगा जिसमें 0 फीसदी टैरिफ लागू रहेगा। 1 अगस्त से शुरू होकर अगले 2 वर्षों तक अमेरिका में आयात की जाने वाली किसी भी जेनेरिक दवा पर कोई नया टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। यह दो साल की मोहलत इसलिए दी गई है ताकि अमेरिकी बाजार में दवाओं की तत्काल किल्लत न हो और दवा कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन शिफ्ट करने का पर्याप्त समय मिल सके। दूसरा चरण 2 साल के संक्रमण काल के खत्म होने के बाद शुरू होगा, जिसमें विदेशी जेनेरिक दवाओं पर सीधे 100 फीसदी का आयात शुल्क एक साल के लिए लागू कर दिया जाएगा। तीसरा और अंतिम चरण इसके बाद आएगा जिसमें इस सीमा को बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया जाएगा, जिससे विदेशी दवाओं का अमेरिकी बाजार में आयात करना बेहद खर्चीला और लगभग अव्यवहारिक हो जाएगा।
ट्रंप का मास्टरप्लान और घरेलू उत्पादन का लक्ष्य
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर एक पोस्ट के जरिए इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह कदम अमेरिका में जेनेरिक दवा बनाने का काम वापस लाने के लिए उठाया गया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो कंपनियां तय समय-सीमा के अंदर अमेरिका में प्लांट और उपकरण नहीं बनाएंगी, उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। ट्रंप अपनी 'मोस्ट-फेवर्ड-नेशन' दवा मूल्य निर्धारण नीति के जरिए भी दवा कंपनियों पर दबाव बना रहे हैं कि वे दवाओं की कीमतें कम करके उतनी ही करें जितनी अन्य उच्च आय वाले देशों में लोग चुकाते हैं। अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में बिकने वाली 90 फीसदी से ज्यादा दवाएं जेनेरिक होती हैं, जो इस बाजार की विशालता को दर्शाता है।
नीति में छूट और पिछले कार्यकारी आदेश
ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया है कि पेटेंट वाली, ब्रांडेड या नई तरह की दवाओं यानी इनोवेटिव ड्रग्स के लिए वर्तमान नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यह नया टैरिफ ढांचा मुख्य रूप से जेनेरिक दवाओं पर केंद्रित है। इससे पहले, ट्रंप ने अप्रैल में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत अमेरिका में आयात की जाने वाली ब्रांडेड दवाओं पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। हालांकि, यह तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि निर्माता सरकार के दवा मूल्य निर्धारण समझौतों को स्वीकार न कर लें या अपने उत्पादों को अमेरिका के भीतर बनाने का वादा न करें। पिछले साल दुनिया की सबसे बड़ी दवा कंपनियों ने अमेरिकी सरकार के साथ समझौते किए थे, जिसके तहत अरबों डॉलर की दवाओं को टैरिफ से छूट दी गई थी।
सप्लाई चेन और राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू
ट्रंप प्रशासन का यह फैसला 'मेड इन अमेरिका' एजेंडे को मजबूती देने के लिए है। अमेरिका चाहता है कि उनके नागरिक जो दवाएं खाते हैं, उनका निर्माण अमेरिकी धरती पर ही अमेरिकी वर्कफोर्स द्वारा किया जाए। कोविड-19 महामारी और वैश्विक तनाव के दौरान अमेरिका ने यह महसूस किया कि जीवनरक्षक दवाओं के लिए विदेशी देशों पर अत्यधिक निर्भरता उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम बन सकती है। वर्तमान में अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली कुल जेनेरिक दवाओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत और चीन से आयात किया जाता है और इस निर्भरता को कम करना ट्रंप की प्राथमिकता है ताकि भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के दौरान दवाओं की आपूर्ति बाधित न हो।
भारतीय फार्मा सेक्टर पर संभावित प्रभाव
भारत को दुनिया की 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' कहा जाता है और अमेरिकी बाजार भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है। सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला, ल्यूपिन और अरबिंदो फार्मा जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण बाजार है। अमेरिका में खपत होने वाली लगभग 40 फीसदी जेनेरिक दवाएं भारत से ही जाती हैं। अल्पकालिक रूप से देखें तो दो साल तक 0 फीसदी टैरिफ रहने के कारण भारतीय कंपनियों को तुरंत कोई वित्तीय झटका नहीं लगेगा। इस अवधि में भारत से निर्यात जारी रहेगा और कंपनियों के पास नई रणनीति बनाने का समय होगा और हालांकि, दीर्घकालिक चुनौती काफी बड़ी है। 2 साल बाद जब 100 फीसदी और 200 फीसदी का टैरिफ लागू होगा, तो भारतीय दवाएं अमेरिकी बाजार में काफी महंगी हो जाएंगी, जिससे कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव आएगा। भारतीय कंपनियों को वहां बने रहने के लिए अमेरिका में अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने पड़ सकते हैं या स्थानीय कंपनियों के साथ जॉइंट वेंचर करने होंगे, जिससे उनकी लागत बढ़ जाएगी।