Trump Tariffs: ट्रम्प के टैरिफ पर SC का ऐतिहासिक फैसला आज: अरबों डॉलर का दांव पर, ट्रम्प बोले- US बर्बाद हो जाएगा

Trump Tariffs - ट्रम्प के टैरिफ पर SC का ऐतिहासिक फैसला आज: अरबों डॉलर का दांव पर, ट्रम्प बोले- US बर्बाद हो जाएगा
| Updated on: 14-Jan-2026 07:24 PM IST
आज अमेरिकी आर्थिक नीति और राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकारों की सीमाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, क्योंकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ की वैधता पर अपना फैसला सुनाने की तैयारी कर रहा है। भारतीय समयानुसार रात 8:30 बजे तक आने वाले इस बहुप्रतीक्षित फैसले के दूरगामी निहितार्थ हैं, न केवल वैश्विक व्यापार के भविष्य के लिए बल्कि अमेरिकी सरकार के भीतर शक्ति संतुलन के लिए भी। पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प ने परिणाम को लेकर महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की है, चेतावनी दी है कि एक प्रतिकूल फैसला देश को अव्यवस्था में डाल सकता है, जिससे टैरिफ राजस्व में अरबों डॉलर वापस करने पड़ सकते हैं। यह मामला सिर्फ एक व्यापार विवाद से कहीं बढ़कर है; यह इस मौलिक प्रश्न की पड़ताल करता है कि एक राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कितनी शक्ति का प्रयोग कर सकता है, खासकर जब यह राष्ट्र के आर्थिक ताने-बाने और उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करता है। दुनिया उत्सुकता से देख रही है क्योंकि देश की सर्वोच्च अदालत एक ऐसे मुद्दे पर विचार कर रही है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए कार्यकारी कार्रवाई के दायरे को फिर से परिभाषित कर सकता है।

ट्रम्प के टैरिफ की उत्पत्ति: राष्ट्रीय सुरक्षा एक आर्थिक ढाल के रूप में

अप्रैल 2025 में, पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प ने दुनिया भर के कई देशों से आयातित वस्तुओं पर व्यापक टैरिफ की एक श्रृंखला शुरू की। इन महत्वपूर्ण आयात शुल्कों का घोषित औचित्य राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा में निहित था। ट्रम्प प्रशासन ने तर्क दिया कि ये टैरिफ अमेरिकी उद्योगों की रक्षा करने और राष्ट्र की विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर। निर्भरता को कम करने के लिए एक आवश्यक उपाय थे, जिससे इसकी आर्थिक स्वतंत्रता और रणनीतिक हितों की रक्षा हो सके। टैरिफ का आरोपण, जिसका अनिवार्य रूप से अर्थ है आयातित वस्तुओं पर अधिक कर लगाना, अमेरिकी बाजार में विदेशी उत्पादों को अधिक महंगा बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था। इस कृत्रिम मूल्य वृद्धि का उद्देश्य घरेलू कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देना था, जिससे उपभोक्ताओं को अमेरिकी निर्मित सामान खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिल सके और पूर्व राष्ट्रपति ने लगातार बनाए रखा कि ये टैरिफ केवल आर्थिक उपकरण नहीं थे बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के महत्वपूर्ण घटक थे, जिसका उद्देश्य कथित बाहरी कमजोरियों के खिलाफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और राष्ट्र की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना था।

कानूनी आधारशिला: अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA)

पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प ने बार-बार दावा किया है कि ये टैरिफ एक शानदार सफलता रहे हैं, उनका दावा है कि उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए $600 बिलियन से अधिक का राजस्व उत्पन्न किया है। उनके दृष्टिकोण के अनुसार, इस पर्याप्त वित्तीय प्रवाह ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, घरेलू उद्योगों को बहुत आवश्यक बढ़ावा दिया है और सीधे राष्ट्र की समृद्धि में योगदान दिया है। वह इस राजस्व को अपनी संरक्षणवादी नीतियों की प्रभावशीलता के प्रमाण के रूप में देखते हैं, जिनके बारे में उनका मानना है कि उन्होंने अमेरिकी नौकरियों और व्यवसायों को अनुचित विदेशी प्रतिस्पर्धा से सफलतापूर्वक बचाया है और नतीजतन, ट्रम्प ने सुप्रीम कोर्ट के ऐसे फैसले के संभावित परिणामों के बारे में गहरी चिंता व्यक्त की है जो इन टैरिफ को अमान्य कर सकता है।

उन्होंने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी है कि यदि उनके द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को रद्द कर दिया जाता है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए स्थिति "पूरी तरह से बिगड़ सकती है," जिसका अर्थ एक विनाशकारी आर्थिक पतन है। उनका प्राथमिक डर यह है कि ऐसा फैसला अमेरिकी सरकार को इन टैरिफ के माध्यम से एकत्र किए गए अरबों डॉलर को वापस करने के लिए मजबूर करेगा, एक ऐसा कार्य जिसके बारे में उनका मानना है कि यह राष्ट्र की वित्तीय स्थिरता और आर्थिक ताकत को गंभीर रूप से कमजोर करेगा, प्रभावी रूप से देश के वित्तीय स्वास्थ्य को "बर्बाद" कर देगा। इस जटिल कानूनी लड़ाई के केंद्र में एक महत्वपूर्ण कानून है: अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA), जिसे 1977 में अधिनियमित किया गया था। यह संघीय कानून मूल रूप से गंभीर राष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति को विशिष्ट, असाधारण शक्तियां प्रदान करने के लिए बनाया गया था।

इसका प्राथमिक उद्देश्य कार्यकारी शाखा को गंभीर खतरों, जैसे युद्ध की घोषणा, विदेशी विरोधियों द्वारा उत्पन्न बड़े आर्थिक खतरे, या अन्य असाधारण अंतरराष्ट्रीय संकटों का तुरंत और निर्णायक रूप से जवाब देने के लिए आवश्यक उपकरण प्रदान करना था। IEEPA के प्रावधानों के तहत, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए विदेशी लेनदेन को अवरुद्ध या नियंत्रित करने और तत्काल आर्थिक निर्णय लागू करने सहित विभिन्न कार्रवाई करने के लिए अधिकृत किया गया है और पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने व्यापक टैरिफ लगाने के लिए IEEPA को कानूनी आधार के रूप में लागू किया, यह तर्क देते हुए कि प्रचलित व्यापार असंतुलन और घरेलू उद्योगों की रक्षा की आवश्यकता एक "आपातकालीन" स्थिति थी जिसके लिए इन विशेष शक्तियों का उपयोग आवश्यक था।

सुप्रीम कोर्ट का केंद्रीय कार्य अब यह है कि राष्ट्रपति की IEEPA की व्याख्या और अनुप्रयोग वास्तव में कानून के मूल इरादे के अनुरूप है या नहीं और क्या यह वैध रूप से ऐसे व्यापक और प्रभावशाली टैरिफ लगाने का अधिकार प्रदान करता है।

मुख्य संवैधानिक प्रश्न: राष्ट्रपति का विशेषाधिकार बनाम कांग्रेस का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट का विचार-विमर्श केवल विशिष्ट टैरिफ की वैधता से परे है; यह शक्तियों के पृथक्करण से संबंधित एक गहन संवैधानिक प्रश्न में गहराई से उतरता है। न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा उजागर किए गए अनुसार, कोर्ट यह निर्धारित करने के लिए तैयार है कि क्या राष्ट्रपति, IEEPA के तहत एकतरफा कार्य करते हुए, ऐसे व्यापक और। लंबे समय तक चलने वाले टैरिफ लगाने की अंतर्निहित शक्ति रखते हैं, या यदि ऐसे महत्वपूर्ण आर्थिक उपायों के लिए अमेरिकी कांग्रेस की स्पष्ट स्वीकृति की आवश्यकता है। यह भेद महत्वपूर्ण है क्योंकि टैरिफ, अपनी प्रकृति से, आयातित वस्तुओं पर कराधान के एक रूप के रूप में कार्य करते हैं। अमेरिकी संवैधानिक ढांचे में, कर लगाने की शक्ति पारंपरिक रूप से विधायी शाखा, विशेष रूप से कांग्रेस के पास रहती है। यदि कोर्ट यह फैसला सुनाता है कि IEEPA कांग्रेस की सहमति के बिना राष्ट्रपति को ऐसे व्यापक टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता है, तो यह भविष्य में कार्यकारी शाखा की आपातकालीन आर्थिक शक्तियों को काफी हद तक सीमित कर देगा। इसके विपरीत, ट्रम्प के पक्ष में एक फैसला भविष्य के राष्ट्रपतियों को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए, प्रत्यक्ष विधायी निरीक्षण के बिना, दूरगामी वैश्विक व्यापार नीतियों को लागू करने के लिए एक मिसाल कायम करेगा। यह निर्णय इस प्रकार न केवल अमेरिका की व्यापार नीति को नया आकार देगा बल्कि दुनिया भर के देशों के साथ उसके आर्थिक संबंधों को भी गहराई से प्रभावित करेगा, कार्यकारी कार्रवाई और विधायी अधिकार के बीच संतुलन को मौलिक रूप से बदल देगा।

विरोध बढ़ता है: राज्य, व्यवसाय और निचली अदालत के फैसले

पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ को चुनौती नहीं दी गई। छोटे व्यवसायों का एक दुर्जेय गठबंधन, जिनके संचालन आयातित वस्तुओं की बढ़ी हुई लागत से सीधे प्रभावित हुए थे,। ने ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर करने के लिए बड़ी संख्या में अमेरिकी राज्यों के साथ हाथ मिलाया। ये बारह राज्य – एरिजोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, इलिनॉय, मेन, मिनेसोटा, नेवादा, न्यू मैक्सिको, न्यूयॉर्क, ओरेगन और वर्मोंट – ने सामूहिक रूप से तर्क दिया कि राष्ट्रपति ने आयातित वस्तुओं पर नए टैरिफ लगाकर अपनी संवैधानिक शक्ति की सीमाओं का उल्लंघन किया था। उनका तर्क था कि कार्यकारी शाखा ने अपने कानूनी जनादेश से परे काम किया था, पारंपरिक रूप से कांग्रेस के लिए आरक्षित शक्तियों का उल्लंघन किया था। प्रारंभिक कानूनी लड़ाइयों में निचली अदालतों ने वादियों का पक्ष लिया और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार न्यायालय और संघीय सर्किट न्यायालय दोनों ने टैरिफ को गैरकानूनी घोषित किया, यह दावा करते हुए कि अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक शक्ति प्रदान नहीं करता है। इन फैसलों ने कार्यकारी की आपातकालीन शक्तियों की व्याख्या के बारे में न्यायिक शाखा के संदेह को रेखांकित किया, जिससे सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम समीक्षा के लिए मंच तैयार हुआ।

सुप्रीम कोर्ट की जांच: मौखिक बहस और न्यायिक संदेह

सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में आयोजित मौखिक बहसों के दौरान इस मामले की पेचीदगियों में गहराई से प्रवेश किया। इन कार्यवाही के दौरान, न्यायाधीशों ने ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ के कानूनी आधार पर कड़ाई से सवाल उठाया। कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में राष्ट्रपति के ऐसे वैश्विक टैरिफ लगाने के अधिकार के बारे। में पहले भी चिंता व्यक्त की थी, जो एक चल रहे न्यायिक संदेह का संकेत था। मौखिक बहसों के दौरान, न्यायाधीशों ने विशेष रूप से यह जांच की कि क्या राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की स्पष्ट स्वीकृति के बिना ऐसे व्यापक टैरिफ लगाने की शक्ति वास्तव में थी। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बिंदु पर प्रकाश डाला: जबकि IEEPA व्यापक आपातकालीन आर्थिक शक्तियां प्रदान करता है, कानून स्वयं "टैरिफ" शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं करता है, न ही यह इस विशिष्ट संदर्भ में राष्ट्रपति के अधिकार की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। कोर्ट में 6-3 के रूढ़िवादी बहुमत के बावजूद, कई न्यायाधीशों ने प्रशासन के तर्कों पर संदेह व्यक्त किया। उन्होंने सवाल किया कि क्या टैरिफ, जो मूल रूप से कराधान का एक रूप हैं, केवल कार्यकारी शाखा द्वारा लगाए जा सकते हैं, यह देखते हुए कि कर लगाने की शक्ति संवैधानिक रूप से कांग्रेस में निहित है और इस तरह के सवालों ने विधायी शक्ति के संभावित क्षरण और राष्ट्रीय आपातकाल की आड़ में कार्यकारी अधिकार के विस्तार के बारे में कोर्ट की गहरी चिंता को रेखांकित किया।

स्थगित फैसला: विचार-विमर्श और अटकलें

इस महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला शुरू में 9 जनवरी, 2026 को आने की उम्मीद थी। हालांकि, घोषणा को बाद में स्थगित कर दिया गया, जिससे कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों के बीच व्यापक अटकलें लगने लगीं और कुछ विश्लेषकों ने सुझाव दिया है कि यह देरी, एक अप्रत्याशित मोड़ में, ट्रम्प प्रशासन के पक्ष में काम कर सकती है। इस सिद्धांत के पीछे का तर्क यह है कि स्थगन कोर्ट को अधिक गहन विचार-विमर्श और आंतरिक चर्चा के लिए अतिरिक्त समय दे सकता है, जिससे राष्ट्रपति की शक्तियों की अधिक सूक्ष्म या यहां तक कि अधिक अनुकूल व्याख्या हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जटिल मामलों में ऐसी देरी असामान्य नहीं है, खासकर जब हाथ में मुद्दे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न और राष्ट्रीय नीति के लिए दूरगामी निहितार्थ शामिल हों। विचार की विस्तारित अवधि निर्णय की गंभीरता और प्रस्तुत सभी कानूनी तर्कों की व्यापक समीक्षा के लिए कोर्ट की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। कारण कुछ भी हो, देरी ने अंतिम फैसले के आसपास की प्रत्याशा को ही बढ़ा दिया है, क्योंकि राष्ट्र और दुनिया एक ऐसे फैसले का इंतजार कर रहे हैं जो अमेरिकी शासन और वैश्विक व्यापार के परिदृश्य को नया आकार दे सकता है।

परिदृश्य 1: सुप्रीम कोर्ट ट्रम्प के टैरिफ के खिलाफ फैसला सुनाता है

यदि सुप्रीम कोर्ट पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के इन टैरिफ लगाने के अधिकार के खिलाफ फैसला सुनाता है, तो इसके निहितार्थ तत्काल और गहरे होंगे। सबसे पहले, इस विवादित अधिकार के तहत पहले लगाए गए सभी टैरिफ। को हटा दिया जाएगा, जिससे अमेरिकी व्यापार नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आएगा। दूसरे, और शायद सबसे नाटकीय रूप से, संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार को कंपनियों से वर्षों से एकत्र किए गए अरबों डॉलर के टैरिफ राजस्व को वापस करने के लिए मजबूर किया जा सकता है और यह पुनर्भुगतान एक विशाल वित्तीय कार्य होगा, जो संभावित रूप से ट्रेजरी के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय चुनौती पैदा करेगा। वैश्विक परिप्रेक्ष्य से, इन टैरिफ को हटाने से अंतरराष्ट्रीय निर्यातकों, विशेष रूप से भारत, चीन और विभिन्न यूरोपीय देशों जैसे प्रमुख व्यापारिक राष्ट्रों में, जिन्हें अमेरिकी बाजार में बढ़ी हुई लागत और कम प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है, को काफी राहत मिलेगी। इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए कई आयातित वस्तुओं की कीमतों में कमी आ सकती है, जिससे संभावित रूप से खपत को बढ़ावा मिलेगा और मुद्रास्फीति के दबाव कम होंगे। इसके अलावा, वैश्विक शेयर बाजारों में सकारात्मक गति का अनुभव हो सकता है, जो अधिक स्थिर और अनुमानित अंतरराष्ट्रीय व्यापार वातावरण में नए सिरे से विश्वास से प्रेरित होगा। कुल मिलाकर, ऐसा फैसला अधिक पारंपरिक व्यापार प्रथाओं की वापसी और आर्थिक नीति पर कांग्रेस के अधिकार की पुनः पुष्टि का संकेत देगा।

परिदृश्य 2: सुप्रीम कोर्ट ट्रम्प के टैरिफ के पक्ष में फैसला सुनाता है

इसके विपरीत, यदि सुप्रीम कोर्ट पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के इन टैरिफ लगाने के अधिकार को बरकरार रखता है, तो मौजूदा व्यापार परिदृश्य काफी हद तक अपरिवर्तित रहेगा, जिसमें टैरिफ लागू रहेंगे। यह परिणाम संयुक्त राज्य अमेरिका को व्यापार बाधाओं के रणनीतिक अनुप्रयोग के माध्यम से अन्य देशों पर काफी दबाव डालने में सक्षम बनाएगा, संभावित रूप से टैरिफ को अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं और विवादों में एक प्राथमिक उपकरण के रूप में उपयोग करेगा। हालांकि, यह बढ़ा हुआ लाभ संभवतः एक कीमत पर आएगा। अन्य देश, चल रहे टैरिफ का सामना कर रहे हैं और अमेरिका से एकतरफा दृष्टिकोण महसूस कर रहे हैं, अमेरिकी वस्तुओं पर अपने स्वयं के प्रतिशोधी कर लगाकर जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। ऐसी जैसे को तैसा की स्थिति वैश्विक व्यापार तनाव को बढ़ा सकती है, जिससे अधिक खंडित और संरक्षणवादी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था हो सकती है। उपभोक्ताओं के लिए, टैरिफ जारी रहने का मतलब यह हो सकता है कि कई आयातित वस्तुएं महंगी रहेंगी, या और भी महंगी हो सकती हैं, जिससे जीवन यापन की लागत बढ़ जाएगी। इस परिदृश्य में वैश्विक शेयर बाजारों में बढ़ी हुई अस्थिरता का अनुभव हो सकता है, क्योंकि निवेशक बढ़े हुए व्यापार अनिश्चितता और प्रमुख व्यापारिक गुटों के बीच आगे आर्थिक घर्षण की संभावना पर प्रतिक्रिया करते हैं। यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा के बैनर तले व्यापक व्यापार निर्णय लेने की राष्ट्रपति की क्षमता को। मजबूत करेगा, संभावित रूप से आने वाले वर्षों के लिए वैश्विक आर्थिक वास्तुकला को बदल देगा।

टैरिफ बहस में भारत का महत्वपूर्ण दांव

भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक प्रमुख व्यापारिक भागीदार होने के नाते, टैरिफ से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विशेष रूप से महत्वपूर्ण दांव रखता है। वर्तमान में, अमेरिका ने विभिन्न भारतीय वस्तुओं पर कुल 50% का पर्याप्त टैरिफ लगाया है। इस टैरिफ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, विशेष रूप से अतिरिक्त 25%, रूस से कच्चे तेल की भारत की खरीद से सीधे जुड़े दंड के रूप में लगाया गया था। टैरिफ के इस दोहरे आरोपण ने भारतीय निर्यातकों के लिए काफी चुनौतियां पैदा की हैं, जिससे उनके उत्पाद अमेरिकी बाजार में कम प्रतिस्पर्धी हो गए हैं और परिणामस्वरूप भारत के समग्र निर्यात प्रदर्शन पर असर पड़ा है। नई दिल्ली इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए राजनयिक प्रयासों में सक्रिय रूप से लगी हुई है, जिसमें कुल टैरिफ बोझ में पर्याप्त कमी की वकालत की गई है। भारत की प्राथमिक मांग है कि कुल टैरिफ दर को घटाकर 15% किया जाए, और महत्वपूर्ण रूप से, रूस के साथ अपने ऊर्जा व्यापार के कारण लगाए गए अतिरिक्त 25% दंड को पूरी तरह से समाप्त किया जाए और दोनों देशों के बीच चल रही ये वार्ता उनके द्विपक्षीय आर्थिक संबंध का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसमें दोनों पक्ष नए साल में एक ठोस समाधान की उम्मीद कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला निस्संदेह इन महत्वपूर्ण व्यापार चर्चाओं की गतिशीलता और संभावित परिणामों को प्रभावित करेगा, जिससे भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच आर्थिक सहयोग का भविष्य आकार लेगा।

स्थायी विरासत: राष्ट्रपति की शक्ति को फिर से परिभाषित करना

अंततः, सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला व्यापार नीति पर एक फैसले से कहीं अधिक है; यह एक ऐतिहासिक मामला है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति की शक्ति की सीमाओं को मौलिक रूप से फिर से परिभाषित करेगा। न्यायाधीशों के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की आड़ में, एकतरफा रूप से व्यापक आर्थिक उपाय लागू कर सकते हैं जो पारंपरिक रूप से विधायी शाखा के दायरे में आते हैं। परिणाम यह निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा कि भविष्य के प्रशासन आपातकालीन शक्तियों की व्याख्या और उपयोग कैसे कर सकते हैं, विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में और यह स्पष्ट करेगा कि एक राष्ट्रपति कराधान और व्यापार के मामलों में कांग्रेस को किस हद तक दरकिनार कर सकता है, संभावित रूप से अमेरिकी संविधान में निहित जांच और संतुलन के नाजुक संतुलन को बदल सकता है। यह निर्णय भविष्य के राष्ट्रपतियों के माध्यम से प्रतिध्वनित होगा, यह प्रभावित करेगा कि सरकार संकटों का जवाब कैसे। देती है, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का प्रबंधन कैसे करती है, और राष्ट्र के आर्थिक भाग्य को कैसे आकार देती है। दुनिया एक ऐसे फैसले का इंतजार कर रही है जो न केवल वर्तमान व्यापार प्रवाह। को प्रभावित करेगा बल्कि अमेरिकी शासन के संवैधानिक ढांचे पर भी एक लंबी छाया डालेगा।

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