Donald Trump News: ट्रंप का UN को बड़ा झटका: अमेरिका 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर

Donald Trump News - ट्रंप का UN को बड़ा झटका: अमेरिका 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर
| Updated on: 08-Jan-2026 09:04 AM IST
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र को एक बड़ा झटका दिया है, जिसमें अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर निकलने का आदेश दिया गया है और यह फैसला वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद कदम है, जो अमेरिकी विदेश नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। इस निर्णय से 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाएं और 35 अन्य गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन प्रभावित होंगे।

ऐतिहासिक फैसला और उसका प्रभाव

राष्ट्रपति ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करके इस व्यापक निकासी का आदेश दिया है। इस कदम को वैश्विक मंच पर अमेरिका की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है और ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट मत है कि ये संस्थाएं अब अमेरिकी राष्ट्रीय हितों, आर्थिक समृद्धि, संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ काम कर रही हैं। यह फैसला उन सभी संगठनों को प्रभावित करेगा जिनमें अमेरिका या तो सदस्य है या उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करता है। यह निर्णय अमेरिका के वैश्विक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है,। जहाँ बहुपक्षीय सहयोग के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

करदाताओं के धन का दुरुपयोग

व्हाइट हाउस द्वारा की गई समीक्षा में यह पाया गया कि जिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का अमेरिका सदस्य है या जिनमें आर्थिक मदद देता है, वे अमेरिकी करदाताओं के पैसों का सही उपयोग नहीं करते। प्रशासन का आरोप है कि ये संगठन अक्सर अपने वैश्विक एजेंडा को अमेरिका की। प्राथमिकताओं से ऊपर रखते हैं, जिससे अमेरिकी नागरिकों के हितों की अनदेखी होती है।

यह स्थिति ट्रंप प्रशासन के 'अमेरिका फर्स्ट' के सिद्धांत के सीधे विपरीत है, जो अमेरिकी नागरिकों की भलाई और देश की सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है। इस प्रकार, इन संस्थाओं से बाहर निकलना अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि इन संस्थाओं में अमेरिकी करदाताओं का पैसा व्यर्थ जा रहा है और समीक्षा में यह बात सामने आई कि इन संगठनों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है, जिसके कारण अमेरिकी वित्तीय योगदान का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं हो पा रहा है। इस धन का उपयोग उन कार्यक्रमों और नीतियों को बढ़ावा देने में किया जा रहा है जो सीधे तौर पर अमेरिका के आर्थिक और संप्रभु हितों के खिलाफ हैं। प्रशासन का तर्क है कि ऐसे संगठनों को वित्तीय सहायता जारी रखना अमेरिकी जनता के साथ अन्याय है।

'अमेरिकन सॉवरेन्टी' की बहाली

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को 'अमेरिकन सॉवरेन्टी' (अमेरिकी संप्रभुता) को बहाल करने के लिए एक आवश्यक कदम बताया है। उनका आरोप है कि कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं रेडिकल क्लाइमेट पॉलिसी, ग्लोबल गवर्नेंस और आइडियोलॉजिकल प्रोग्राम्स को बढ़ावा देती हैं। ये कार्यक्रम अमेरिका की अर्थव्यवस्था और उसकी संप्रभुता के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि इन संस्थाओं पर अमेरिकी करदाताओं के पैसे खर्च करने के बावजूद अमेरिका को कोई बड़ा और ठोस फायदा नहीं मिल रहा था, जिससे इन संगठनों में बने रहने का कोई औचित्य नहीं था।

आर्थिक लाभ और प्राथमिकताओं का पुनर्गठन

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इन बड़े निर्णयों से अमेरिकी करदाताओं के पैसे बचेंगे। इन बचे हुए पैसों को अब अमेरिका के आंतरिक विकास और सुरक्षा प्राथमिकताओं पर खर्च किया जाएगा। इसमें देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना, सीमा सुरक्षा को। बढ़ाना और सैन्य तैयारियों को और अधिक सुदृढ़ करना शामिल है। यह कदम 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति के तहत देश के भीतर निवेश को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय। सुरक्षा को प्राथमिकता देने के लिए उठाया गया है, जिससे अमेरिकी नागरिकों को सीधा लाभ मिल सके।

वैश्विक सहयोग पर संभावित प्रभाव

हालांकि, इस फैसले के आलोचकों का मानना है कि अमेरिका के इस कदम से वैश्विक स्तर पर देशों के बीच सहयोग कम होगा। उनका तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों से अमेरिका के हटने से वैश्विक समस्याओं जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में बाधा आ सकती है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक प्रणाली में नई दरारें पैदा हो सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अस्थिरता बढ़ सकती है। आलोचकों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम उसकी वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को कमजोर कर सकता है।

ट्रंप प्रशासन का 'अमेरिका फर्स्ट' दृष्टिकोण

ट्रंप प्रशासन का यह मानना है कि इन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अमेरिका को बाहर निकालकर करदाताओं। का पैसा बचाया जा सकेगा और उस धनराशि को 'अमेरिका फर्स्ट' के हिसाब से खर्च किया जाएगा। यह निर्णय इस बात पर आधारित है कि ये अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अमेरिका के हित को ध्यान में रखकर काम नहीं कर रही थीं, बल्कि अपने स्वयं के एजेंडा को प्राथमिकता दे रही थीं। यह कदम अमेरिकी विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जहां द्विपक्षीय संबंधों और राष्ट्रीय हितों को बहुपक्षीय सहयोग से ऊपर रखा जा रहा है, जिससे अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सके।

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