विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए इक्विटी नियमों ने देशभर में एक नई बहस और आक्रोश को जन्म दे दिया है। केंद्र सरकार के लिए यह नियम अब 'गले की फांस' बनता नजर आ रहा है। सामान्य वर्ग के छात्रों और विभिन्न संगठनों ने इन नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए सड़कों पर मोर्चा खोल दिया है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक, विरोध की आग तेजी से फैल रही है। छात्रों का आरोप है कि ये नियम समानता के नाम पर असमानता को बढ़ावा दे रहे हैं।
सड़कों पर उतरा सवर्ण समाज
विरोध की सबसे तीखी तस्वीरें उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आईं, जहां लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारी संख्या में एकत्र होकर धरना दिया। छात्रों ने 'काला कानून वापस लो' के नारे लगाए और यूजीसी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रयागराज में भी स्थिति तनावपूर्ण रही, जहां बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने ही अपनी सरकार के खिलाफ तिरंगा यात्रा निकालकर विरोध दर्ज कराया। सवर्ण आर्मी ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर प्रशासन को चेतावनी दी। है कि जब तक यह नियम वापस नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा।
दिल्ली में यूजीसी दफ्तर का घेराव
राजधानी दिल्ली में भी सवर्ण समाज के छात्र एक्शन मोड में दिखे। प्रदर्शनकारी सीधे यूजीसी के दफ्तर पहुंच गए और वहां धरना शुरू कर दिया। छात्रों के प्रतिनिधियों ने यूजीसी चेयरमैन विनीत जोशी से मुलाकात की और उन्हें इस विवादित कानून को वापस लेने के लिए 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है। छात्रों का कहना है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे आंदोलन को और उग्र करेंगे।
सरकार की सफाई और विपक्ष का रुख
बढ़ते दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मोर्चा संभाला। उन्होंने छात्रों को आश्वासन दिया कि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भेदभाव के नाम पर नियमों का गलत इस्तेमाल नहीं। होगा और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि सभी को समान न्याय मिले। हालांकि, विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार के भीतर ही इस मुद्दे पर अंतर्विरोध है। वहीं, शिवसेना (उद्धव गुट) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि असमानता दूर करने के नाम पर नई असमानता पैदा की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंची कानूनी लड़ाई
यह विवाद अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। नए नियमों के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में कुल 20 याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि सामान्य वर्ग को इक्विटी कमेटी से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का सीधा उल्लंघन है। केंद्र सरकार ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से कानूनी राय मांगी है।
विवाद की मुख्य वजह क्या है?
यूजीसी के इन नए नियमों में पांच मुख्य बिंदुओं पर सबसे ज्यादा आपत्ति जताई जा रही है। पहला, यूनिवर्सिटी में बनने वाली 'इक्विटी कमेटी' में SC, ST और OBC का प्रतिनिधित्व तो अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग के लिए कोई जगह नहीं है। दूसरा, सामान्य वर्ग के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है और तीसरा, झूठी शिकायत करने वालों के लिए किसी सजा का जिक्र नहीं है, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ गई है। चौथा, छात्रों को डर है कि सामान्य अकादमिक बहस को भी भेदभाव का नाम दिया जा सकता है। पांचवां, इससे विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच जातिगत आधार पर बंटवारा होने का खतरा है।