Union Budget 2026: UPI का 'महा-संकट': बजट 2026 बचाएगा डिजिटल इंडिया की जान, निर्मला का प्लान?

Union Budget 2026 - UPI का 'महा-संकट': बजट 2026 बचाएगा डिजिटल इंडिया की जान, निर्मला का प्लान?
| Updated on: 18-Jan-2026 10:09 AM IST
भारत का यूपीआई डिजिटल पेमेंट सिस्टम, जिसने देश में लेनदेन के तरीके में क्रांति ला दी है, अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. बजट 2026 से पहले, देश की सत्ता और वित्त मंत्री. के सामने सबसे बड़ा सवाल इसकी दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर है. एक ओर जहां यूपीआई ने रिकॉर्ड लेनदेन दर्ज किए हैं, वहीं दूसरी ओर इसकी शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) पॉलिसी भुगतान कंपनियों और बैंकों पर भारी वित्तीय बोझ डाल रही है, जिससे उनकी निरंतर वृद्धि और परिचालन क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं और यह स्थिति डिजिटल इंडिया के भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करती है, जिसके लिए तत्काल और निर्णायक नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है.

शून्य एमडीआर नीति का वित्तीय बोझ

यूपीआई ने वास्तव में भारत में भुगतान परिदृश्य को बदल दिया है. 10 रुपये की चाय से लेकर 50,000 रुपये के स्मार्टफोन तक, या बिजली बिल और किराए का भुगतान करने तक, प्लास्टिक कार्ड और कागजी मुद्रा धीरे-धीरे चलन से बाहर हो रहे हैं. गूगल पे, फोनपे और अन्य यूपीआई-आधारित प्लेटफॉर्म रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न अंग बन गए हैं, खासकर नोटबंदी और महामारी के बाद से, जिसने देश को संपर्क रहित लेनदेन की ओर तेजी से अग्रसर किया है. हालांकि, इस सफलता की कहानी के पीछे एक बढ़ती हुई बेचैनी छिपी है, जिसे. उद्योग जगत के नेताओं का कहना है कि नीति निर्माता अब अनदेखा नहीं कर सकते.

यह बेचैनी यूपीआई लेनदेन को संसाधित करने की छिपी हुई लागत से उपजी है, जिसका भुगतान वर्तमान में बैंकों और फिनटेक फर्मों द्वारा किया जा रहा है, जबकि उन्हें कोई राजस्व प्राप्त नहीं हो रहा है. केंद्र सरकार द्वारा यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन, विशेष रूप से कम मूल्य वाले व्यक्ति-से-व्यापारी भुगतानों पर शून्य एमडीआर पर जोर देने से वित्तीय समावेशन में निश्चित रूप से इजाफा हुआ है.

इसने डिजिटल भुगतानों को व्यापक आबादी तक पहुंचाने में मदद की है, लेकिन इस नीति का वित्तीय बोझ अब असहनीय होता जा रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, ऐसे प्रत्येक लेनदेन को प्रोसेस करने में लगभग 2 रुपये का खर्च आता है. यह लागत पूरी तरह से बैंकों और फिनटेक फर्मों द्वारा वहन की जाती है, जिससे उन्हें बिना किसी आय के एक आवश्यक सार्वजनिक सेवा प्रदान करनी पड़ती है और पीआईबी द्वारा जारी एक सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि ग्राहकों/व्यापारियों को सेवाएं प्रदान करने के लिए डिजिटल भुगतान उद्योग द्वारा किया गया व्यय व्यापारी छूट दर (एमडीआर) के माध्यम से वसूल किया जाता है, जो कि व्यापारियों द्वारा पेमेंट प्रोसेसिंग कंपनी को दिया जाने वाला शुल्क है. शून्य एमडीआर का मतलब है कि यह वसूली संभव नहीं. है, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है.

व्यापारी विस्तार में ठहराव के संकेत

तेजी से विकास के बावजूद, यूपीआई के व्यापारी विस्तार में थकान के चिंताजनक संकेत दिख रहे हैं. एक विश्लेषक के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में सक्रिय व्यापारी क्यूआर नेटवर्क की वृद्धि दर केवल लगभग 5% सीएजीआर रही है, जो कि देश में डिजिटल भुगतानों की बढ़ती मांग के अनुरूप नहीं है. इसके अलावा, पूरे देश में इसका व्यापक प्रसार नहीं है और आज भी, भारत के लगभग 45 फीसदी व्यापारी ही मासिक आधार पर यूपीआई भुगतान स्वीकार करते हैं, जो दर्शाता है कि अभी भी एक बड़ा वर्ग इस डिजिटल क्रांति से अछूता है. यह सीमित स्वीकृति दर यूपीआई की पूरी क्षमता को साकार करने में एक बड़ी बाधा है और इसके पीछे की वित्तीय अस्थिरता एक प्रमुख कारण हो सकती है.

भौगोलिक प्रसार में असमानता

यूपीआई के भौगोलिक प्रसार में असमानता और भी अधिक चौंकाने वाली है. भारत के लगभग एक तिहाई पिनकोड में 100 से कम सक्रिय यूपीआई व्यापारी हैं, और लगभग 70 फीसदी में 500 से कम हैं, जबकि प्रत्येक पिनकोड में औसतन 2,500 से अधिक व्यापारी हैं. संभावना और वास्तविकता के बीच का यह अंतर सिस्टम पर बढ़ते दबाव को स्पष्ट रूप से दिखाता है और यह दर्शाता है कि यूपीआई की पहुंच अभी भी शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक सीमित है, जबकि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में इसकी पैठ बहुत कम है. इस असमानता को दूर करने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास और व्यापारी अधिग्रहण में बड़े पैमाने. पर निवेश की आवश्यकता है, जो मौजूदा शून्य एमडीआर मॉडल के तहत संभव नहीं दिख रहा है.

उद्योग जगत की बढ़ती चिंताएं

पेमेंट कंपनियों, बैंकों और फिनटेक फर्मों ने लगातार चेतावनी दी है कि यूपीआई के विकास को समर्थन देने वाला मॉडल तेजी से अस्थिर होता जा रहा है. भारतीय भुगतान परिषद (पीसीआई), जो नॉन-बैंक पेमेंट सिस्टम प्रतिभागियों का प्रतिनिधित्व करती है, ने चिंता व्यक्त की है कि शुरुआती उपयोग को बढ़ावा देने में सरकारी प्रोत्साहन. महत्वपूर्ण थे, लेकिन वर्तमान ढांचा भुगतान बुनियादी ढांचे का निर्माण, रखरखाव और सुरक्षा करने वाली कंपनियों के लिए कोई व्यवहार्य दीर्घकालिक राजस्व मॉडल प्रदान नहीं करता है. यह स्थिति इन कंपनियों के लिए अपने परिचालन को बनाए रखने और भविष्य में निवेश करने में गंभीर चुनौतियां पैदा करती है, जिससे नवाचार और विस्तार की गति धीमी पड़ सकती है.

आरबीआई गवर्नर के संकेत

भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इन चिंताओं को दोहराया है. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने इस बात पर जोर दिया है कि यूपीआई ने भले ही अपार जनहित प्रदान किया हो, लेकिन इसकी दीर्घकालिक व्यवहार्यता इस बात पर निर्भर करती है कि कोई इसके अंतर्निहित खर्चों का भुगतान करे. मल्होत्रा ​​ने कहा था कि यूपीआई लेनदेन से जुड़े कुछ खर्चे होते हैं, और उन्हें किसी न किसी को चुकाना पड़ता है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मॉडल की स्थिरता के लिए यह महत्वपूर्ण है कि सामूहिक रूप से या व्यक्तिगत रूप से कोई भुगतान करे और इसी वर्ष की शुरुआत में, एक वित्तीय क्षेत्र के शिखर सम्मेलन में बोलते हुए, केंद्रीय बैंक प्रमुख ने कहा कि यूपीआई एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा है जिसे सरकार ने जानबूझकर सब्सिडी देकर उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त रखने का विकल्प चुना है, एक ऐसी नीति जिसने उपयोग के मामले में भरपूर लाभ दिया है और आगे भी जारी रहेगी. हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह मॉडल हमेशा के लिए मुफ्त नहीं रह सकता.

प्रोत्साहन पैकेज की अपर्याप्तता

भारत के सबसे बड़े यूपीआई प्लेटफॉर्म PhonePe ने स्वीकार किया कि मौजूदा स्वरूप में शून्य एमडीआर अनिवार्य नियम आर्थिक रूप से सही नहीं है. कंपनी के अनुसार, व्यापक स्तर पर बने रहने के लिए इकोसिस्टम को तत्काल एक अनुमानित कॉस्ट रिकवरी मैकेनिज्म की आवश्यकता है, चाहे वह मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) के माध्यम से हो या पर्याप्त सरकारी सब्सिडी के माध्यम से. फिनटेक दिग्गज ने बताया कि वित्त वर्ष 2023-24 में वितरित 3,900 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन पैकेज ऑपरेशनल कॉस्ट को कवर करने के लिए भी अपर्याप्त था, और वित्त वर्ष 2024-25 में यह समर्थन घटकर मात्र 1,500 करोड़ रुपये रह गया. PhonePe के एक प्रवक्ता ने ईटी से बात करते हुए कहा कि यह आवंटन तकनीकी बुनियादी ढांचे के निर्माण, उपभोक्ताओं और व्यापारियों को जोड़ने, शिक्षा. पहलों को आगे बढ़ाने और यूपीआई के लिए मजबूत जोखिम और धोखाधड़ी रोकने के सिस्टम को लागू करने के लिए आवश्यक राशि से बहुत कम है.

दीर्घकालिक राजस्व मॉडल का अभाव

पीसीआई ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि भुगतान प्रोसेसिंग, कस्टमर एक्विजिशन और ऑपरेशनल मैनेजमेंट में दीर्घकालिक निवेश को बनाए रखना एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है और मौजूदा प्रोत्साहन संरचना एक टिकाऊ राजस्व मॉडल नहीं है, जिससे पर्याप्त समर्थन के बिना कई फिनटेक कंपनियों का अस्तित्व गंभीर खतरे में है. यह स्थिति नवाचार को बाधित कर सकती है और डिजिटल भुगतान क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को कम कर सकती है और एक स्थायी राजस्व धारा के बिना, कंपनियों के लिए नए उत्पादों और सेवाओं में निवेश करना मुश्किल हो जाता है, जो अंततः उपभोक्ताओं और व्यापारियों को मिलने वाले लाभों को प्रभावित करता है.

निवेश की चुनौती और वित्तीय अंतर

PhonePe ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि चालू वित्त वर्ष के लिए, सरकार ने डिजिटल भुगतान प्रोत्साहन के लिए केवल 427 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. इसके विपरीत, अनुमान है कि अगले दो वर्षों में यह इकोसिस्टम सामूहिक रूप से लगभग 8,000-10,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगा. विकास पथ के आधार पर और वित्त वर्ष 2023-24 की सब्सिडी को बेंचमार्क मानते हुए, सरकारी सब्सिडी के माध्यम से शून्य एमडीआर बनाए रखने की वास्तविक लागत अगले दो वर्षों में 8,000-10,000 करोड़ रुपये के बीच होगी, और यूपीआई के विस्तार के साथ यह आंकड़ा और भी बढ़ेगा. यह एक गंभीर अस्थिरता को उजागर करता है. फिनटेक फर्म ने मीडिया रिपोर्ट में आगे कहा कि सरकार के लिए वार्षिक बजट आवंटन के माध्यम से इस लागत को वहन करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, जिससे एक स्थायी समाधान की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है.

सरकारी प्रोत्साहन में कमी

यूपीआई के उपयोग में भारी वृद्धि के बावजूद यह वित्तीय अंतर तेजी से बढ़ा है. एनपीसीआई के आंकड़ों से पता चला कि केवल अक्टूबर में यूपीआई ने 20. 7 अरब भुगतानों में 27. 28 लाख करोड़ रुपये के लेनदेन प्रोसेस्ड किए, जिसमें लगभग 88,000 करोड़ रुपये के मूल्य के लगभग 668 मिलियन लेनदेन का औसत दैनिक भार था. द्वितीय और तृतीयक शहरों में बढ़ती पैठ और त्योहारी सीजनों में मजबूत मांग के कारण, यूपीआई अब देश में कुल डिजिटल भुगतानों का लगभग 85 फीसदी हिस्सा है. इसके बावजूद, बजटीय सहायता में विपरीत दिशा में बदलाव आया है. डिजिटल भुगतान के लिए सरकारी प्रोत्साहन राशि में हाल के वर्षों में भारी उतार-चढ़ाव आया है – वित्त वर्ष 2022 में 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 3,500 करोड़ रुपये हो गई, फिर वित्त वर्ष 2025 में घटकर 2,000 करोड़ रुपये रह गई और इस वर्ष के बजट अनुमानों में यह घटकर 427 करोड़ रुपये पर आ गई और यह कमी उद्योग के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है.

विकास की गति पर खतरा

PhonePe ने चेतावनी दी है कि पर्याप्त धनराशि में वृद्धि के बिना, उद्योग की विकास गति ही खतरे में है. प्लेटफॉर्म ने बताया कि यूपीआई भारत के आधे से भी कम स्मार्टफोन यूजर्स तक पहुंचा है, और टियर-4 शहरों और उससे. आगे विस्तार करने के लिए व्यापारी स्वीकृति बुनियादी ढांचे और उपभोक्ता शिक्षा दोनों में बड़े पैमाने पर निरंतर निवेश की आवश्यकता होगी. कंपनी ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि पर्याप्त धनराशि के बिना, टियर-4 शहरों और उससे आगे के क्षेत्रों में उपभोक्ता अधिग्रहण और व्यापारियों को जोड़ने, दोनों पर काफी असर पड़ेगा और ऐसे में, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स पर दबाव बढ़ता जा रहा है. बुनियादी ढांचे के विकास, ग्राहक अधिग्रहण, साइबर सुरक्षा, नियामक अनुपालन और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं प्रदान करने की बढ़ती लागतें लगभग शून्य राजस्व मॉडल के साथ टकरा रही हैं. यह स्थिति डिजिटल समावेशन के सरकार के लक्ष्यों को कमजोर कर सकती है.

स्थायी राजस्व मॉडल की आवश्यकता

कंपनी ने कहा कि एमडीआर का मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ता भुगतान करेंगे, बल्कि यह एक ऐसा तंत्र है जो सेवा प्रदाताओं को अपनी लागत वसूलने में मदद करता है. एक स्थायी राजस्व मॉडल के बिना, मार्केटिंग, शिक्षा, जोखिम और धोखाधड़ी की रोकथाम में निवेश करने और अगले एक अरब उपयोगकर्ताओं के लिए समाधान विकसित करने की इकोसिस्टम की क्षमता प्रभावित हो रही है और इन खर्चों की भरपाई के लिए कोई ठोस आय स्रोत न होने के कारण, कई कंपनियां अपनी विस्तार योजनाओं पर पुनर्विचार करना शुरू कर सकती हैं और नवाचार की गति धीमी कर सकती हैं. यह स्थिति अंततः यूपीआई के विकास और पहुंच को बाधित. करेगी, जिससे डिजिटल इंडिया के सपने को झटका लग सकता है.

बजट 2026: एक निर्णायक कारक

PhonePe और अन्य उद्योग जगत के अग्रणी मानते हैं कि मौजूदा साइकिल को तोड़ने का एकमात्र तरीका एक नियंत्रित एमडीआर (मल्टी-डिजिटल रिडक्शन मॉडल) फ्रेमवर्क लागू करना है, जिससे इकोसिस्टम आत्मनिर्भर बन सके और सरकार सार्वजनिक धन को बुनियादी ढांचे के विकास और डिजिटल साक्षरता जैसी रणनीतिक प्राथमिकताओं की ओर निर्देशित कर सके. कंपनी ने कहा कि एक टिकाऊ, बाजार-आधारित मॉनेटाइजेशन मॉडल इकोसिस्टम को आत्मनिर्भर बनाएगा और इन्फीबीम एवेन्यूज के ज्वाइंट एमडी और पीसीआई के अध्यक्ष विश्वास पटेल ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि यूपीआई पर शून्य एमडीआर और इतने बड़े पैमाने के लेनदेन प्रोसेस के लिए पहले आवंटित मात्र 1,500 करोड़ रुपये के कारण, यह प्रणाली सतत विकास के लिए आवश्यक धन से वंचित है. उद्योग जगत के लीडर्स केंद्रीय बजट 2026 पर विचार-विमर्श के दौरान केंद्र सरकार. पर सब्सिडी में पर्याप्त वृद्धि के लिए दबाव डालने की तैयारी कर रहे थे.

उद्योग की मांग और भविष्य की राह

इससे पहले आई ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, पेमेंट भुगतान ऑपरेटर्स ने बड़े व्यापारियों (जिनका वार्षिक कारोबार 10 करोड़ रुपये से अधिक है) को किए जाने वाले भुगतानों पर 25-30 बेसिस पॉइंट का नियंत्रित एमडीआर लागू करने की अनुमति मांगी है. उनका तर्क है कि अधिक मात्रा में कारोबार करने वाले व्यवसाय इस मामूली शुल्क को वहन कर सकते हैं, जिससे वित्तीय व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहेगी. इसके अलावा, पीसीआई ने चेतावनी दी है कि सुधार के अभाव में, फिनटेक कंपनियों को जल्द ही अपने परिचालन में कटौती करने, ग्रामीण विस्तार को रोकने और नवाचार को सीमित करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे वित्तीय समावेशन को गहरा करने और यूपीआई की पहुंच अगले 3 करोड़ भारतीयों तक बढ़ाने के सरकार के अपने उद्देश्यों को नुकसान पहुंचेगा. बजट 2026 में निर्मला सीतारमण का प्लान डिजिटल इंडिया के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा, यह तय करेगा कि यूपीआई की सफलता की कहानी जारी रहेगी या नहीं.

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