अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (USCIS) ने हाल ही में एक नया और महत्वपूर्ण पॉलिसी मेमो जारी किया है, जो विदेशी नागरिकों, विशेष रूप से भारतीयों के लिए स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया को बदल सकता है। इस नए दिशा-निर्देश में 'स्टेटस में बदलाव' (Adjustment of Status) चाहने वाले व्यक्तियों के लिए प्रक्रियाओं को फिर से स्पष्ट किया गया है और मेमो के अनुसार, अब आव्रजन अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे हर मामले में सभी जरूरी तथ्यों और जानकारियों पर अलग-अलग और गहराई से विचार करें। यह अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करेगा कि किसी विदेशी नागरिक को अमेरिका में रहते हुए यह खास राहत दी जानी चाहिए या नहीं।
कांसुलर प्रोसेसिंग पर बढ़ता जोर
USCIS द्वारा जारी इस नए मेमो में इस बात पर फिर से जोर दिया गया है कि जो विदेशी नागरिक अपने इमिग्रेशन स्टेटस में बदलाव चाहते हैं, उन्हें मौजूदा कानूनों और अदालती फैसलों के आधार पर, विदेश विभाग के माध्यम से अमेरिका के बाहर कांसुलर प्रोसेसिंग की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। भारतीय आवेदकों के संदर्भ में इसका सीधा मतलब यह है कि कई मामलों में उन्हें अमेरिका छोड़कर भारत जाना होगा और वहां से ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन की प्रक्रिया को पूरा करना होगा। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट का प्रावधान रखा गया है, लेकिन सामान्य नियम अब बाहर जाकर प्रक्रिया पूरी करने की ओर झुक रहा है।
USCIS ने क्यों जारी किया नया मेमो
USCIS के प्रवक्ता ज़ैक काहलर ने इस नीतिगत बदलाव के पीछे के कारणों को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि हम कानून के मूल मकसद की ओर लौट रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विदेशी नागरिक हमारे देश के इमिग्रेशन सिस्टम का सही तरीके से पालन करें। काहलर के अनुसार, अब से कोई भी विदेशी नागरिक जो कुछ समय के लिए अमेरिका में है और ग्रीन कार्ड चाहता है, उसे आवेदन करने के लिए अपने देश वापस जाना होगा और उन्होंने आगे कहा कि यह पॉलिसी हमारे इमिग्रेशन सिस्टम को वैसे ही काम करने देती है जैसा कानून का मकसद था, न कि कानूनों की कमियों का फायदा उठाने को बढ़ावा देती है। जब विदेशी नागरिक अपने देश से आवेदन करते हैं, तो उन लोगों को तलाशने और बाहर निकालने की जरूरत कम हो जाती है जो अनुमति नहीं मिलने पर अवैध रूप से अमेरिका में रहने लगते हैं।
भारतीय H1B और L1 पेशेवरों पर प्रभाव
इमिग्रेशन वकील निकोल गुरनारा ने इस बदलाव पर अपनी राय देते हुए कहा कि यह मेमो तकनीकी रूप से कानून में कोई बदलाव नहीं करता है, लेकिन यह अधिकारियों के काम करने के तरीके और उनके रवैये को बदल देता है। अमेरिका में रहकर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करना हमेशा से अधिकारियों के विवेक पर निर्भर रहा है, लेकिन अब इस विवेक का इस्तेमाल अधिक सख्ती से किया जाएगा। मेमो के एक महत्वपूर्ण फुटनोट में कहा गया है कि ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के दौरान सिर्फ वैध H-1B या L-1 स्टेटस बनाए रखना ही किसी फैसले को अपने पक्ष में करवाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अब आवेदकों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए केवल कागजी कार्रवाई से अधिक कुछ करना होगा और अपने केस को मजबूत बनाने के लिए सकारात्मक पहलुओं को दिखाना होगा।
छात्रों के लिए चुनौतियां और कानूनी पेचीदगियां
F-1 वीजा वाले छात्रों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो सकती है। निकोल गुरनारा के अनुसार, F-1 वीजा 'दोहरे इरादे' (dual intent) वाला वीजा नहीं है। छात्र वीजा आवेदन के समय अक्सर यह बताते हैं कि वे पढ़ाई के बाद स्वदेश लौट जाएंगे। अब यह मेमो अधिकारियों को इस बात पर अधिक ध्यान देने का अधिकार देता है कि जब वही छात्र ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करते हैं, तो वे अपने पहले के बयानों पर कितने खरे उतरते हैं। इसके अलावा, पटेल बनाम गारलैंड मामले में 2022 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इस तरह की अस्वीकृतियां अक्सर फेडरल कोर्ट की समीक्षा के दायरे से भी बाहर होती हैं, जिससे अधिकारियों का निर्णय अंतिम हो जाता है।
सकारात्मक पहलुओं का महत्व
उन भारतीय परिवारों के लिए जो EB-2 या EB-3 वीजा की लंबी प्रतीक्षा सूची में 10 या 15 साल से अमेरिका में रह रहे हैं, इस मेमो में एक उम्मीद की किरण भी है। मेमो में 'सकारात्मक चीजों' पर जोर दिया गया है, जिसका अर्थ है कि आवेदक ने अमेरिका में रहते हुए जो सकारात्मक रिश्ते बनाए हैं, वे उनके पक्ष में काम कर सकते हैं। आवेदकों को अपनी मेहनत, उपलब्धियों, पारिवारिक रिश्तों, टैक्स के इतिहास और समाज में अपनी भागीदारी के बारे में विस्तृत जानकारी देनी चाहिए और करियर में तरक्की और अमेरिका में बिताए गए समय का सही विवरण आवेदन को मंजूरी दिलाने में सहायक हो सकता है। अब अमेरिका में रहकर स्टेटस बदलने या भारत जाकर इंटरव्यू देने के बीच का चुनाव पहले से कहीं अधिक जटिल और जोखिम भरा हो गया है।