अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध की आशंकाओं के खत्म होने से कच्चे तेल के बाजार को बड़ी राहत मिली है और ईरान से तेल की सप्लाई दोबारा सुचारू रूप से शुरू होने की उम्मीद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी गिरावट आई है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल सस्ता होने से भारत का चालू खाता घाटा कम होगा, रुपये को मजबूती मिलेगी, घरेलू महंगाई पर लगाम लगेगी और सरकारी तेल कंपनियों के मार्जिन में सुधार होगा। ग्लोबल एनर्जी मार्केट और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के इतिहास में एक ऐसा बड़ा उलटफेर हुआ है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। लंबे समय से एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे अमेरिका और ईरान के बीच आखिरकार एक ऐतिहासिक शांति समझौता हो गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट का विश्लेषण
इस महा-समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 10 जून के बाद से खाड़ी देशों का कच्चा तेल अब तक 15 दशमलव 70 प्रतिशत से ज्यादा सस्ता हो चुका है। जबकि अमेरिकी क्रूड के दाम में 16 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट देखने को मिल चुकी है। खबर लिखे जाने तक कच्चे तेल की कीमतों में 6 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिल रही थी। इसका मतलब है कि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड के दाम 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुके हैं। खाड़ी देशों का कच्चा तेल करीब 105 दिन के निचले स्तर पर आ चुका है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
क्यों आई कीमतों में यह बड़ी कमी?
पिछले कई सालों से ईरान पर लगे कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वह वैश्विक बाजार में खुलकर अपना कच्चा तेल नहीं बेच पा रहा था। इसके अलावा मिडिल ईस्ट में युद्ध की आशंकाओं के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें हमेशा ऊंचे स्तर पर बनी रहती थीं। अब जब शांति समझौता हो गया है और ईरान पर से प्रतिबंध हटने का रास्ता साफ हो गया है, तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से नीचे की ओर आ रही हैं। ईरान के पास तेल का विशाल भंडार है, और इसके बाजार में आते ही कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई अचानक बढ़ गई है और जानकारों का कहना है कि खाड़ी देशों में युद्ध का खतरा टलने से क्रूड ऑयल के दामों से जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम गायब हो गया है, जिससे कीमतें तेजी से नीचे आई हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर साबित होगी डील
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर की भी गिरावट भारत को अरबों रुपये का फायदा पहुंचाती है। इस डील के भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई सकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे। सबसे पहले, महंगाई पर लगाम लगेगी। भारत में ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट का सीधा संबंध डीजल और पेट्रोल की कीमतों से है। तेल सस्ता होने से माल ढुलाई सस्ती होगी, जिससे फल, सब्जियां और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें कम होंगी। दूसरा बड़ा फायदा रुपये की मजबूती के रूप में दिखेगा और कच्चे तेल के आयात के लिए भारत को सबसे ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। तेल सस्ता होने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया मजबूत होगा।
राजकोषीय लाभ और तेल कंपनियों का सुधार
सरकार का चालू खाता घाटा कंट्रोल में आएगा, जिससे सरकार को देश के भीतर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च करने की आजादी मिलेगी। इसके साथ ही सरकारी तेल विपणन कंपनियों के मुनाफे में भी सुधार होने की उम्मीद है क्योंकि उनके लिए कच्चे माल की लागत कम हो जाएगी। यह स्थिति दलाल स्ट्रीट यानी शेयर बाजार के लिए भी उत्साहजनक है, जहां तेल से संबंधित क्षेत्रों में निवेश बढ़ने की संभावना है।
कीमतों के ताजा आंकड़े
कच्चे तेल की कीमतों में काफी बड़ी गिरावट देखने को मिल चुकी है। 10 जून को खाड़ी देशों का कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड 93 डॉलर 10 सेंट प्रति बैरल पर था, जो कम होकर 78 डॉलर 46 सेंट प्रति बैरल पर देखने को मिला। इसका मतलब है कि खाड़ी देशों का कच्चा तेल 14 डॉलर 64 सेंट प्रति बैरल यानी 15 दशमलव 72 प्रतिशत सस्ता हो चुका है। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी कच्चा तेल डब्ल्यूटीआई के दाम में भी बड़ी गिरावट आई है। 10 जून को डब्ल्यूटीआई के दाम 90 डॉलर 3 सेंट प्रति बैरल थे, जो मौजूदा समय में 75 डॉलर 53 सेंट प्रति बैरल पर दिखाई दे रहे हैं। इसका मतलब है कि अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत में 14 डॉलर 5 सेंट प्रति बैरल यानी 16 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट देखने को मिल चुकी है।
क्या लंबे समय तक बनी रहेगी यह राहत?
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि शॉर्ट टर्म में भारत के लिए स्थिति बेहद अनुकूल है। हालांकि, लॉन्ग टर्म स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि ओपेक प्लस देश इस डील पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। यदि ओपेक देशों ने अपनी तरफ से तेल उत्पादन में कटौती कर दी, तो कीमतों को फिर से सहारा मिल सकता है। लेकिन फिलहाल, ईरान की बाजार में वापसी इतनी बड़ी है कि कीमतें जल्द ऊपर जाने वाली नहीं हैं और यदि कच्चे तेल की ये कम कीमतें अगले दो-तीन तिमाहियों तक बनी रहती हैं, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट को एक नई रफ्तार मिलना तय है और शेयर बाजार में भी चौतरफा हरियाली देखने को मिल सकती है।