स्विट्जरलैंड की शांत वादियों में आज शांति के बजाय सस्पेंस की गहरी बर्फ जमती नजर आ रही है। दुनिया को उम्मीद थी कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को समाप्त करने के लिए किसी समझौते पर अंतिम मुहर लग जाएगी, लेकिन लेबनान के सुलगते बारूद ने इस पूरी शांति वार्ता पर ग्रहण लगा दिया है। तस्नीम न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बाद ईरानी प्रतिनिधिमंडल स्विट्जरलैंड पीस टॉक से बाहर निकल गया है। ईरानी डेलिगेशन ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि जब तक लेबनान का मुद्दा नहीं सुलझता, तब तक आगे कोई बातचीत संभव नहीं होगी। हालांकि वार्ता की मेज सजी हुई है, लेकिन इसकी सफलता पर संशय के बादल गहराते जा रहे हैं।
ट्रंप की दबाव की नीति और बॉम्बर की तैनाती
यह युद्ध के मोर्चे पर दबाव बनाने की नीति है या वार्ता की मेज पर ईरान को मजबूर करने का कोई बड़ा प्लान, इसका सटीक अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है और अमेरिका की ओर से मुख्य वार्ताकार के रूप में उप राष्ट्रपति जेडी वेंस, ट्रंप के दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ ने मोर्चा संभाल रखा है। ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि ईरान को 60 दिन के भीतर डील करनी होगी, अन्यथा अमेरिका घातक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। इन धमकियों को केवल शब्दों तक सीमित नहीं माना जा सकता, क्योंकि अमेरिका ने ब्रिटेन के एयरबेस पर बी-1 और बी-52 जैसे भारी बॉम्बर तैनात कर दिए हैं। यह सैन्य सक्रियता वार्ता की मेज पर ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।
ईरान का पलटवार और होर्मुज की घेराबंदी
ईरान भी इस कूटनीतिक खेल में पीछे नहीं है। एक तरफ जहां विदेश मंत्री अब्बास अरागची और संसद के स्पीकर मोहम्मद कालीबाफ स्विट्जरलैंड में मौजूद हैं, वहीं दूसरी तरफ आईआरजीसी (IRGC) ने कड़ा रुख अपनाया है और आईआरजीसी ने ऐलान किया है कि जब तक लेबनान पर हमले बंद नहीं होंगे, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद रखा जाएगा। ईरानी सेना ने होर्मुज को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है और दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर ईरानी सरकार फिलहाल मौन साधे हुए है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरान के भीतर ही अलग-अलग विचारधाराओं के बीच टकराव की स्थिति हो सकती है या फिर यह उनकी गुड कॉप-बैड कॉप रणनीति का हिस्सा है।
मिनाब 168 का संदेश और कूटनीतिक संकेत
ईरान इस वार्ता में किसी भी तरह के दबाव में झुकने के मूड में नहीं दिख रहा है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण वह विमान है जिससे ईरानी प्रतिनिधिमंडल स्विट्जरलैंड पहुंचा है। इस विमान पर मिनाब 168 लिखा हुआ है। यह उस दर्दनाक हमले की याद दिलाता है जो मिनाब के एक स्कूल पर हुआ था, जिसमें 168 बच्चों की जान चली गई थी। इस संदेश के जरिए ईरान ने यह साफ कर दिया है कि वह अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात करने आया है और वह पुराने जख्मों को भूला नहीं है। यह कूटनीतिक संकेत दर्शाता है कि ईरान अपनी शर्तों पर ही समझौते की मेज पर टिकेगा।
मध्यस्थों की भूमिका और भविष्य का संकट
इस जटिल वार्ता में पाकिस्तान और कतर जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और उन्होंने स्विट्जरलैंड में अपना डेरा डाल दिया है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से आईएईए (IAEA) के महानिदेशक राफेर ग्रॉसी भी इस डील में शामिल हो रहे हैं, जो एक सकारात्मक पहलू माना जा रहा है। हालांकि, लेबनान पर जारी हमलों और होर्मुज को बंद करने की धमकी ने स्थिति को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है और स्विट्जरलैंड की मेज पर जो फाइलें खुलेंगी, वही पश्चिमी एशिया का भविष्य तय करेंगी। सवाल अब भी वही बना हुआ है कि क्या ट्रंप की 60 दिन की समयसीमा और ईरान की लेबनान वाली शर्त के बीच कोई बीच का रास्ता निकल पाएगा या यह शांति वार्ता पूरी तरह विफल हो जाएगी।