अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के खिलाफ अपनी आर्थिक घेराबंदी को और अधिक कड़ा करते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने ईरान से जुड़े कुल 12 व्यक्तियों और कंपनियों पर नए प्रतिबंधों की घोषणा की है। यह महत्वपूर्ण कार्रवाई ऐसे समय पर की गई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी 13 मई को चीन की राजधानी बीजिंग के आधिकारिक दौरे पर जाने वाले हैं। इस रणनीतिक दौरे के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होनी तय है। अमेरिकी अधिकारियों का स्पष्ट रूप से कहना है कि ये प्रतिबंधित लोग और कंपनियां ईरानी तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार, विशेष रूप से चीन तक पहुंचाने और उसे अवैध रूप से बेचने में सक्रिय रूप से मदद कर रहे थे।
ट्रेजरी विभाग का खुलासा और IRGC की भूमिका
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने सोमवार को इस संबंध में विस्तृत जानकारी साझा करते हुए बताया कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) तेल की बिक्री के लिए एक अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय नेटवर्क का संचालन करती है। विभाग के अनुसार, इस नेटवर्क के तहत विभिन्न देशों में फर्जी या 'फ्रंट' कंपनियों का इस्तेमाल किया जाता है। इन कंपनियों का मुख्य उद्देश्य ईरान की असली पहचान को छिपाकर तेल बेचना है। इस अवैध व्यापार से प्राप्त होने वाले धन का उपयोग ईरानी सरकार अपनी सैन्य गतिविधियों, सरकारी कार्यों और क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने के लिए करती है और अमेरिका का मानना है कि इस तरह के वित्तीय स्रोतों को पूरी तरह काटकर ही ईरान की गतिविधियों पर लगाम लगाई जा सकती है।
हांगकांग और यूएई की कंपनियों पर कार्रवाई के विवरण
इस ताजा कार्रवाई के दायरे में ईरान के 3 प्रमुख व्यक्ति और हांगकांग तथा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में स्थित 9 कंपनियां आई हैं।
'इकोनॉमिक फ्यूरी' अभियान और अमेरिकी रणनीति
वॉशिंगटन का यह कदम ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की उसकी व्यापक और दीर्घकालिक रणनीति का एक हिस्सा है। अमेरिका का प्राथमिक लक्ष्य ईरान को उसके हथियार कार्यक्रम, परमाणु गतिविधियों और उसके द्वारा समर्थित विभिन्न संगठनों के लिए पैसा जुटाने से रोकना है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने इस कार्रवाई को 'इकोनॉमिक फ्यूरी' (Economic Fury) अभियान का हिस्सा बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान पर आर्थिक दबाव तब तक लगातार जारी रहेगा और बढ़ाया जाएगा जब तक वह अपनी परमाणु और सैन्य गतिविधियों में बदलाव नहीं लाता। यह अभियान ईरान के वित्तीय तंत्र को वैश्विक बाजार से पूरी तरह अलग-थलग करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
वैश्विक तेल बाजार और होर्मुज स्ट्रेट का संकट
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच बढ़ते तनाव का सीधा और गहरा असर दुनिया के तेल बाजार पर भी पड़ रहा है। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में चिंता का माहौल बना हुआ है। ईरान ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) के रास्ते को लगभग बंद कर दिया है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया का करीब 20% तेल और गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सप्लाई चेन में आने वाली इस बाधा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की आपूर्ति और कीमतों को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
चीन-अमेरिका संबंधों पर प्रभाव और पिछला संदर्भ
चीन वर्तमान में ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार और एक बड़ा व्यापारिक साझेदार माना जाता है। ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप के आगामी चीन दौरे में व्यापार विवादों के साथ-साथ ईरान का मुद्दा भी अत्यंत अहम रहेगा। अमेरिका चाहता है कि चीन, ईरान पर ज्यादा दबाव डाले और उसके तेल व्यापार को हतोत्साहित करे। इससे पहले भी अमेरिका चीन की तीन सैटेलाइट कंपनियों और हांगकांग की कई अन्य कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। हालांकि, मार्च में अमेरिका ने तेल की वैश्विक कमी को देखते हुए ईरानी तेल पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी थी, लेकिन अब बदली हुई परिस्थितियों में फिर से सख्ती बढ़ा दी गई है।
राष्ट्रपति ट्रंप की बीजिंग यात्रा से ठीक पहले की गई यह कार्रवाई चीन के लिए भी एक कड़ा कूटनीतिक संदेश मानी जा रही है। अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ईरान के तेल व्यापार पर लगी पाबंदियों का किसी भी स्तर पर उल्लंघन न हो। अब पूरी दुनिया की नजरें 13 मई को होने वाली ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी हैं, जहां इन प्रतिबंधों और ईरान के मुद्दे पर गंभीर चर्चा होने की पूरी संभावना है।