अमेरिका और सऊदी अरब एक ऐसे ऐतिहासिक समझौते की घोषणा करने के बेहद करीब हैं, जो मध्य पूर्व में परमाणु ऊर्जा के परिदृश्य को पूरी तरह से बदल सकता है। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, इस संभावित समझौते के तहत अमेरिका सऊदी अरब को उसके नागरिक परमाणु कार्यक्रम (सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम) के लिए मंजूरी दे सकता है। इस खबर के सामने आने के बाद से ही दुनिया भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने (नॉन-प्रोलिफरेशन) की वकालत करने वाले समूहों और इजरायल के बीच चिंता की लहर दौड़ गई है। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद हिस्सा यह है कि इसके तहत सऊदी अरब को अपनी ही जमीन पर यूरेनियम का संवर्धन (एनरिचमेंट) करने की अनुमति मिल सकती है।
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच परमाणु सहयोग का खाका
इस प्रस्तावित समझौते के तहत सऊदी अरब को अपना नागरिक परमाणु कार्यक्रम विकसित करने की पूरी आजादी मिलेगी। इसके जरिए सऊदी अरब अपनी घरेलू जरूरतों के लिए यूरेनियम संवर्धन की क्षमता हासिल कर सकेगा। इस प्रक्रिया में अमेरिकी कंपनियों की भूमिका भी बेहद अहम होगी, क्योंकि उन्हें सऊदी अरब में संवर्धित यूरेनियम विकसित करने वाले प्लांट बनाने का काम मिल सकता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते को पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही अपनी मंजूरी दे चुके हैं और यह समझौता 30 साल की लंबी अवधि तक लागू रहेगा। यह समझौता न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में बल्कि रणनीतिक रूप से भी अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों को एक नई दिशा देगा।
UAE के साथ हुए 2009 के समझौते से तुलना
यह नया समझौता अमेरिका द्वारा 2009 में सऊदी अरब के पड़ोसी देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ किए गए परमाणु समझौते से काफी अलग है। 2009 के उस समझौते के तहत UAE ने इस बात पर सहमति जताई थी कि वह अपना परमाणु ईंधन खुद तैयार नहीं करेगा और न ही यूरेनियम का संवर्धन करेगा। UAE आज भी अपनी जरूरतों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से ईंधन खरीदता है और कई कड़े प्रतिबंधों का पालन करता है। हालांकि, सऊदी अरब के मामले में अमेरिका यूरेनियम संवर्धन की छूट देने पर विचार कर रहा है, जो इसे पिछले समझौतों की तुलना में अधिक उदार और रणनीतिक रूप से संवेदनशील बनाता है।
इजरायल की चिंता और क्षेत्रीय सुरक्षा का सवाल
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच होने जा रहे इस संभावित समझौते ने इजरायल की नींद उड़ा दी है। इजरायल के परमाणु विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने इस योजना पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और उनका मानना है कि नागरिक परमाणु कार्यक्रम की आड़ में सऊदी अरब भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने की तकनीकी क्षमता हासिल कर सकता है। इजरायल और अमेरिका का ईरान के साथ परमाणु मुद्दे पर लंबे समय से टकराव चल रहा है, जहाँ दोनों देशों का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना रहा है। ऐसे में सऊदी अरब को संवर्धन की छूट देना इजरायल के लिए एक बड़ा सुरक्षा जोखिम हो सकता है, क्योंकि इससे क्षेत्र में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का डर है।
क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का रुख और ईरान का प्रभाव
सऊदी अरब के वास्तविक शासक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा है कि उनका देश फिलहाल परमाणु हथियार हासिल करने की कोई योजना नहीं बना रहा है। हालांकि, उन्होंने एक बड़ी शर्त भी रखी है। क्राउन प्रिंस के अनुसार, अगर ईरान परमाणु बम बनाने में सफल होता है, तो सऊदी अरब भी बिना किसी देरी के जल्द से जल्द परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में कदम उठाएगा। यह बयान दर्शाता है कि सऊदी अरब का परमाणु कार्यक्रम काफी हद तक ईरान की गतिविधियों और क्षेत्रीय संतुलन पर निर्भर करता है।
यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया और इसके स्तर
परमाणु तकनीक को समझने के लिए यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया को जानना जरूरी है। परमाणु रिएक्टरों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन प्राकृतिक यूरेनियम से तैयार किया जाता है, जिसमें U-235 आइसोटोप की मात्रा बढ़ाई जाती है। यदि यूरेनियम को 3 से 5 प्रतिशत तक संवर्धित किया जाता है, तो इसका उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है। 20 प्रतिशत से अधिक संवर्धित यूरेनियम का उपयोग अनुसंधान और विशेष वैज्ञानिक कार्यों के लिए होता है। लेकिन जब यूरेनियम का संवर्धन 90 प्रतिशत के आसपास पहुँच जाता है, तो वह परमाणु हथियार विकसित करने के लिए उपयुक्त हो जाता है। यही कारण है कि संवर्धन की अनुमति को लेकर दुनिया भर के विशेषज्ञ सतर्क रहते हैं।
भारत-अमेरिका 2008 परमाणु डील और सऊदी समझौते में अंतर
विशेषज्ञ इस संभावित समझौते की तुलना भारत और अमेरिका के बीच 2008 में हुए ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौते से कर रहे हैं, लेकिन दोनों के बीच बुनियादी अंतर हैं। 2008 में जब भारत के साथ समझौता हुआ था, तब भारत पहले से ही एक परमाणु हथियार संपन्न देश था। उस समय भारत को वैश्विक परमाणु व्यापार से बाहर रखा गया था, और इस समझौते ने भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय ईंधन, रिएक्टर और तकनीक के दरवाजे खोले थे और भारत को नए यूरेनियम संवर्धन की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उसने यह क्षमता पहले ही खुद विकसित कर ली थी। इसके अलावा, भारत ने अपने नागरिक परमाणु संयंत्रों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में रखने पर सहमति जताई थी। इसके विपरीत, सऊदी अरब के साथ होने वाले समझौते में घरेलू यूरेनियम संवर्धन की अनुमति देने की बात हो रही है। रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि सऊदी समझौते में IAEA के अतिरिक्त निगरानी प्रोटोकॉल को शामिल नहीं किया जा रहा है, जो इसे भारत के समझौते से तकनीकी और सुरक्षा के लिहाज से काफी अलग बनाता है।