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: वट सावित्री व्रत 2026: बांस के पंखे खरीदने की परंपरा और पौराणिक महत्व

- वट सावित्री व्रत 2026: बांस के पंखे खरीदने की परंपरा और पौराणिक महत्व
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हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है और साल 2026 में ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को यह पावन पर्व मनाया जाएगा। इस वर्ष 16 तारीख को ज्येष्ठ अमावस्या पड़ रही है, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन शनि जयंती का भी संयोग बन रहा है। वट सावित्री का व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला या फलाहार व्रत रखकर वट यानी बरगद के पेड़ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। यह व्रत सावित्री और सत्यवान की उस अमर कथा से प्रेरित है, जिसमें सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज को पराजित कर अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे।

वट सावित्री व्रत और बरगद के पेड़ का महत्व

वट सावित्री व्रत के दौरान बरगद के पेड़ की पूजा का विशेष विधान है और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सावित्री ने बरगद के पेड़ के नीचे ही बैठकर कठोर तपस्या की थी। उनकी इसी तपस्या और अटूट श्रद्धा के कारण मृत्यु के देवता यमराज को विवश होकर सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े थे। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जो भी सुहागिन महिला इस दिन वट वृक्ष की पूजा करती है और व्रत रखती है, उसके पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहती है। बरगद के पेड़ को अक्षय वट भी कहा जाता है, जो दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।

बांस के पंखे खरीदने की विशेष परंपरा

वट सावित्री व्रत के अवसर पर विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। इन क्षेत्रों में महिलाएं पूजा के लिए बांस से बने दो पंखे अनिवार्य रूप से खरीदती हैं। इस परंपरा के पीछे एक अत्यंत महत्वपूर्ण पौराणिक और धार्मिक कारण छिपा हुआ है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या के समय उत्तर भारत में प्रचंड गर्मी पड़ती है, और इसी मौसम का उल्लेख सावित्री और सत्यवान की कथा में भी मिलता है।

बांस के पंखे के पीछे की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। उस समय ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी पड़ रही थी और सावित्री ने देखा कि उनके पति सत्यवान का शरीर पूरी तरह से निडाल और चेतनाहीन हो गया है। अपने पति को उस प्रचंड गर्मी से राहत दिलाने के लिए सावित्री ने बांस के पंखे का उपयोग किया और उन्हें हवा की। बांस के पंखे से मिली उस ठंडक ने सत्यवान को राहत पहुंचाई। सावित्री के इसी सेवा भाव और समर्पण को याद करते हुए आज भी महिलाएं बांस का पंखा खरीदती हैं।

पूजा और दान की विधि

पूजा के समय महिलाएं इन बांस के पंखों से बरगद के पेड़ और यमराज को हवा करती हैं, जो सावित्री द्वारा अपने पति की सेवा किए जाने का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से वैवाहिक जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है। पूजा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, इन पंखों को खाली नहीं रखा जाता बल्कि इन्हें ब्राह्मणों को दान कर दिया जाता है। दान की यह प्रक्रिया व्रत की पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है और इसे करने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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