चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सेहत को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला दावा सामने आया है। तिब्बत की निर्वासित सरकार के पूर्व राजनीतिक प्रमुख लोबसांग सांगे ने खुलासा किया है कि शी जिनपिंग को कम से कम दो बार, और संभवतः तीन बार दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ चुका है। इस जानकारी ने न केवल चीन के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खलबली मचा दी है। सांगे के अनुसार, उन्हें यह गुप्त जानकारी चीन के ही एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने दी थी और यह बातचीत एक घंटे से भी अधिक समय तक चली थी, जिसमें चीन की आंतरिक राजनीति और राष्ट्रपति की शारीरिक स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई। हालांकि, चीनी सरकार की ओर से हमेशा की तरह इस मामले पर पूरी तरह गोपनीयता बरती जा रही है।
ANI पॉडकास्ट में हुआ बड़ा खुलासा
यह सनसनीखेज दावा 3 सितंबर को स्मिता प्रकाश के साथ ANI पॉडकास्ट के दौरान किया गया। लोबसांग सांगे ने साक्षात्कार में बताया कि चीनी राष्ट्रपति इस समय भारी दबाव में हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास मौजूद जानकारी के अनुसार, शी जिनपिंग की सेहत लगातार गिर रही है और उन्हें दो बार हार्ट अटैक आने की बात पुख्ता तौर पर सामने आई है। सांगे ने यह भी तर्क दिया कि राष्ट्रपति की खराब सेहत का सीधा असर उनके फैसलों और देश की सेना पर उनकी पकड़ पर पड़ रहा है। हालांकि, सांगे ने यह स्पष्ट किया कि उनके पास कोई आधिकारिक मेडिकल रिपोर्ट नहीं है, लेकिन उनके सूत्र की विश्वसनीयता पर उन्हें पूरा भरोसा है। इस खुलासे के बाद चीन में नेतृत्व परिवर्तन और उत्तराधिकार की योजनाओं को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
बिश्केक यात्रा और शारीरिक कमजोरी के संकेत
शी जिनपिंग की सेहत बिगड़ने के दावों को उस समय और बल मिला जब चाइना डेमोक्रेसी पार्टी (CDP) के चेयरमैन वानजुन शी ने एक महत्वपूर्ण ट्वीट किया। इस ट्वीट के अनुसार, 30 अगस्त को जब शी जिनपिंग एक विशेष विमान से बिश्केक पहुंचे, तो उनकी शारीरिक स्थिति काफी चिंताजनक लग रही थी। वानजुन शी ने दावा किया कि विमान से उतरते समय शी जिनपिंग का चेहरा काफी सूजा हुआ और पीला नजर आ रहा था। उनके चलने के तरीके में स्पष्ट रूप से लड़खड़ाहट देखी गई और उनमें वह शारीरिक फुर्ती नहीं थी जो एक राष्ट्रप्रमुख में होनी चाहिए। स्थिति इतनी गंभीर थी कि उन्हें विमान की सीढ़ियों से उतरने के लिए अपनी पत्नी पेंग लियुआन के सहारे की जरूरत पड़ी। इन दृश्यों ने उन अफवाहों को हवा दी है कि उन्हें हाल ही में स्ट्रोक आया था और उन्हें आपातकालीन चिकित्सा की आवश्यकता पड़ी थी।
मानसिक उलझन और सैन्य अधिकारियों की बर्खास्तगी
लोबसांग सांगे ने अपनी बातचीत में एक और महत्वपूर्ण शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे उन्होंने मेंटल फॉग (मानसिक उलझन) कहा। सांगे का दावा है कि शी जिनपिंग स्पष्ट रूप से सोचने और त्वरित निर्णय लेने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। उन्होंने इस स्थिति को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) में हाल ही में हुए बड़े बदलावों से जोड़ा। पिछले कुछ महीनों में चीन ने अपने कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को बिना किसी स्पष्ट कारण के पद से हटा दिया है। सांगे का मानना है कि यह राष्ट्रपति की मानसिक स्थिति और उनके भीतर पैदा हुए असुरक्षा के भाव का परिणाम हो सकता है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना कठिन है क्योंकि चीन का सूचना तंत्र बेहद कड़ा है और वहां से कोई भी जानकारी बाहर आना लगभग असंभव होता है।
सम्राट की दुविधा और उत्तराधिकार का संकट
सांगे के साक्षात्कार का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चीन के भविष्य के नेतृत्व को लेकर था। उन्होंने इसे सम्राट की दुविधा (Emperor's dilemma) के रूप में परिभाषित किया और सांगे के अनुसार, शी जिनपिंग एक ऐसी ऐतिहासिक समस्या का सामना कर रहे हैं जहां एक शक्तिशाली शासक अगर अपना उत्तराधिकारी चुनता है, तो वह अनजाने में अपने लिए एक प्रतिद्वंद्वी खड़ा कर लेता है। यह प्रतिद्वंद्वी भविष्य में शासक के अधिकार को चुनौती दे सकता है। दूसरी ओर, यदि कोई उत्तराधिकारी नहीं चुना जाता है, तो नेता के हटने या बीमार होने की स्थिति में सत्ता के लिए खूनी संघर्ष और अनिश्चितता पैदा हो सकती है। यही कारण है कि शी जिनपिंग सार्वजनिक रूप से किसी उत्तराधिकारी का नाम घोषित करने से बच रहे हैं, जिससे चीन के राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
कौन हैं लोबसांग सांगे?
लोबसांग सांगे एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कानूनी विद्वान और राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने वर्ष 2011 से 2021 तक भारत के धर्मशाला में स्थित सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन के निर्वाचित सिक्योंग (राजनीतिक प्रमुख) के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। वह निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों की आवाज को वैश्विक मंचों पर उठाते रहे हैं और वर्तमान में, सांगे हार्वर्ड लॉ स्कूल के ईस्ट एशियन लीगल स्टडीज प्रोग्राम में सीनियर विजिटिंग फेलो हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक अनुभव उन्हें चीन के मामलों का एक गहरा जानकार बनाता है। हालांकि, वह लंबे समय से चीन की तिब्बत नीतियों के आलोचक रहे हैं, इसलिए उनके बयानों को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जाता है, लेकिन उनके द्वारा दी गई जानकारी को अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक गंभीरता से ले रहे हैं।