यमन में संघर्ष-विराम टूटने के बाद उत्पन्न हुए गंभीर सुरक्षा संकट और दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश सऊदी अरब पर लगातार हो रहे हमलों के बीच अफ्रीकी देश मिस्र की तरफ से एक बहुत बड़ा और कूटनीतिक बयान सामने आया है। सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है, और वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है। ऐसे संवेदनशील समय में, मिस्र के राष्ट्रपति ने रविवार को एक बड़ा बयान देते हुए यह स्पष्ट किया कि सऊदी अरब की सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिस्र उसे हर संभव मदद देने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोही, सऊदी अरब की सरज़मीन और उसके महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर अपने हमलों को लगातार तेज कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, जहाँ क्षेत्रीय सहयोगी अब खुलकर एक-दूसरे के समर्थन में आगे आ रहे हैं।
मिस्र के राष्ट्रपति का आपातकालीन कदम और सेना को अधिकार
मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए संसद का एक आपातकालीन सत्र बुलाया है। इस विशेष सत्र का मुख्य मकसद मिस्र की सेना को यह कानूनी और संवैधानिक अधिकार देना है कि यदि सऊदी अरब औपचारिक रूप से मदद मांगता है, तो उसे तुरंत और प्रभावी रूप से सुरक्षा के लिए सहायता दी जा सके। मिस्र की सेना इस पूरे क्षेत्र की सबसे बड़ी, अनुभवी और ताकतवर सेनाओं में से एक मानी जाती है, और उसका इस संघर्ष में शामिल होना क्षेत्रीय समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है। हाल ही के दिनों में, हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और देश की सरकारी तेल कंपनी, जिसे ‘सऊदी अरामको’ के नाम से जाना जाता है, पर गंभीर हमले किए हैं। इन हमलों ने न केवल सऊदी अरब की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
संघर्ष-विराम टूटने के बाद बढ़ी तनातनी
यमन में चल रहे संघर्ष-विराम के टूटने के बाद, सऊदी सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच खूनी लड़ाई एक बार फिर से शुरू हो गई है, जिसके परिणाम स्वरूप हिंसा का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। मिस्र के राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा जारी किए गए एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि मिस्र, सऊदी अरब की सुरक्षा और स्थिरता की रक्षा करने, उसके संसाधनों और क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित रखने, और इस्लाम के पवित्र स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर जरूरी और संभव मदद प्रदान करेगा। यह बयान दोनों देशों के बीच सदियों पुराने और प्रगाढ़ ऐतिहासिक संबंधों को और अधिक मजबूती प्रदान करता है। राष्ट्रपति कार्यालय के इस बयान से यह साफ हो गया है कि मिस्र किसी भी परिस्थिति में अपने खाड़ी सहयोगियों की सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा और जरूरत पड़ने पर सैन्य बल का उपयोग करने से भी पीछे नहीं हटेगा।
राष्ट्रीय रक्षा परिषद की बैठक और उच्च स्तरीय निर्णय
रॉयटर्स के प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी के अनुसार, यह महत्वपूर्ण बयान मिस्र की ‘राष्ट्रीय रक्षा परिषद’ की एक उच्च स्तरीय बैठक के तुरंत बाद सामने आया है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता स्वयं राष्ट्रपति अल-सीसी ने की, जिसमें देश के संसद के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और सेना के प्रमुख भी शामिल हुए। इस उच्च स्तरीय बैठक में देश की सुरक्षा प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान प्रस्तावित सैन्य सहायता के प्रस्ताव पर मतदान के लिए संसद का एक आपातकालीन सत्र दोपहर 1 बजे जो कि 1000 जीएमटी के रूप में निर्धारित था, के लिए तय किया गया था। इस त्वरित प्रक्रिया से यह साबित होता है कि मिस्र का नेतृत्व इस मामले में किसी भी प्रकार की देरी नहीं करना चाहता है और सऊदी अरब की मदद के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
सऊदी क्राउन प्रिंस और मिस्र के राष्ट्रपति की द्विपक्षीय मुलाकात
इस सैन्य और कूटनीतिक हलचल से कुछ दिन पहले, शनिवार को दिए गए एक भाषण में, राष्ट्रपति अल-सीसी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मिस्र, सऊदी अरब के किंग सलमान और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के स्पष्ट निर्देशों और अपेक्षाओं के अनुसार ही अपने कदम उठाएगा और यमन में लड़ाई फिर से शुरू होने के बाद, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 15 सितंबर को मिस्र की यात्रा की थी और राष्ट्रपति अल-सीसी से मुलाकात की थी। इस उच्च स्तरीय मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने आपसी सुरक्षा, खुफिया साझाकरण और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श किया था। विश्लेषकों का मानना है कि उसी बैठक में इस संभावित सैन्य सहयोग की रूपरेखा तैयार कर ली गई थी, जिसे अब औपचारिक रूप दिया जा रहा है।
मिस्र और सऊदी अरब के रणनीतिक और आर्थिक साझेदार रिश्ते
मिस्र और सऊदी अरब केवल सैन्य रूप से ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के बहुत करीबी रणनीतिक और आर्थिक साझेदार भी हैं। दोनों देशों के बीच का यह रिश्ता कई दशकों पुराना है और समय-समय पर इसने विभिन्न अग्नि परीक्षाओं को पार किया है और वर्ष 2013 में मिस्र की सेना द्वारा तत्कालीन इस्लामी राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सत्ता से हटाए जाने के बाद, सऊदी अरब और खाड़ी क्षेत्र के अन्य तेल-समृद्ध देशों ने मिस्र की अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए अरबों डॉलर की भारी-भरकम सहायता प्रदान की थी। यह सहायता केंद्रीय बैंक में जमा राशि और विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष निवेश के रूप में दी गई थी, जिसने उस समय मिस्र की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को एक नई संबल प्रदान किया था। इसके बदले में, मिस्र ने हमेशा खाड़ी देशों की सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक माना है।
पिछला सैन्य सहयोग और गठबंधन का इतिहास
इतिहास पर नजर डालें तो मिस्र उस सऊदी-नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जिसने वर्ष 2015 में यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करने और हूती विद्रोहियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने के लिए सैन्य हस्तक्षेप किया था। हालांकि, उस शुरुआती दौर में मिस्र की लड़ाकू और प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका काफी हद तक सीमित ही रही थी और उसने मुख्य रूप से नौसैनिक और रसद सहायता पर अधिक ध्यान केंद्रित किया था। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में, जब हूती विद्रोहियों के हमले सऊदी अरब की धरती पर सीधे तौर पर हो रहे हैं, तब मिस्र की ओर से हरसंभव मदद का यह ताजा ऐलान यह दर्शाता है कि मिस्र अब अपनी सैन्य भागीदारी को और अधिक व्यापक और प्रत्यक्ष बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव
सऊदी अरब पर हो रहे लगातार हमलों और मिस्र द्वारा उठाये जा रहे इन सख्त कदमों का सीधा असर मध्य पूर्व की क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ना तय है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक होने के नाते सऊदी अरब के तेल भंडारों और रिफाइनरियों की सुरक्षा पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हूती विद्रोहियों द्वारा रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और सऊदी अरामको जैसी रणनीतिक संस्थाओं को निशाना बनाए जाने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला खतरे में पड़ गई है। ऐसे में मिस्र की सेना का सऊदी अरब के समर्थन में आगे आना और संसद द्वारा सैन्य हस्तक्षेप के लिए रास्ते खोलना, हूती विद्रोहियों और उनके समर्थकों को एक कड़ा संदेश देता है कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह से एकजुट हैं।
