आरबीआई पॉलिसी अपडेट: भारत में जल्द आ सकते हैं प्लास्टिक के नोट

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने जानकारी दी है कि केंद्रीय बैंक पॉलिमर यानी प्लास्टिक के नोटों को पेश करने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य नोटों की उम्र बढ़ाना और छपाई की बढ़ती लागत को कम करना है, जो वित्त वर्ष 2025 में 6372 करोड़ 80 लाख रुपये तक पहुंच गई है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) देश में पॉलिमर यानी प्लास्टिक के नोट शुरू करने की दिशा में गंभीरता से विचार कर रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को इस महत्वपूर्ण योजना की जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्लास्टिक नोटों को अपनाने का यह प्रस्ताव अभी अपने शुरुआती चरण में है और इस पर बैंक के भीतर विस्तृत चर्चा की जा रही है। हालांकि, विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इस संबंध में जल्द ही एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की जा सकती है ताकि वास्तविक परिस्थितियों में इन नोटों की उपयोगिता को परखा जा सके।

10 और 20 रुपये के नोटों से हो सकती है शुरुआत

आरबीआई की योजना के अनुसार, शुरुआती दौर में 10 रुपये और 20 रुपये के नोटों को प्लास्टिक में बदलने के लिए चुना जा सकता है। इन नोटों के चयन का मुख्य कारण इनका व्यापक उपयोग है और भारत में 10 और 20 रुपये के नोट सबसे ज्यादा लेनदेन में इस्तेमाल होते हैं, जिसके कारण ये बहुत जल्दी गंदे हो जाते हैं या फट जाते हैं। प्लास्टिक के नोट कागज के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत होते हैं, जिससे इनके खराब होने की संभावना बहुत कम हो जाएगी। गवर्नर ने संकेत दिए हैं कि इस प्रस्ताव पर अमल होने के बाद देश की मुद्रा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

छपाई की लागत में भारी बढ़ोतरी बनी मुख्य कारण

प्लास्टिक नोटों को लाने के पीछे सबसे बड़ा कारण नोटों की छपाई और उनके रखरखाव पर होने वाला भारी खर्च है। आरबीआई की वित्त वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, नोट छापने की कुल लागत बढ़कर 6372 करोड़ 80 लाख रुपये हो गई है। इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2024 में यह खर्च 5101 करोड़ 40 लाख रुपये था। हालांकि पॉलिमर नोटों को तैयार करने की शुरुआती लागत कागज के नोटों से अधिक होती है, लेकिन इनकी लंबी उम्र के कारण लंबे समय में यह सौदा किफायती साबित होता है। इससे बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम होगी और सरकारी खजाने पर बोझ भी कम होगा।

फटे और पुराने नोटों की समस्या का समाधान

आरबीआई के लिए चलन से खराब और फटे नोटों को हटाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025 के दौरान लगभग 23 अरब 80 करोड़ पुराने और खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 पॉइंट 3 प्रतिशत अधिक है। इनमें सबसे बड़ी संख्या 500 रुपये के नोटों की थी। डिजिटल पेमेंट में तेजी आने के बावजूद देश में नकदी की मांग कम नहीं हुई है। 15 मई तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल मुद्रा का चलन 42 लाख 86 हजार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में पॉलिमर नोट ज्यादा समय तक सुरक्षित और उपयोगी बने रहेंगे, जिससे नोट बदलने का दबाव कम होगा।

10 साल पहले भी बनी थी योजना

भारत में प्लास्टिक के नोटों की चर्चा नई नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत करीब 10 साल पहले हुई थी। फरवरी 2014 में सरकार ने संसद को जानकारी दी थी कि 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का परीक्षण किया जाएगा। इसके लिए देश के पांच अलग-अलग जलवायु वाले शहरों को चुना गया था, जिनमें कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर शामिल थे और उस समय तकनीकी और संचालन संबंधी समस्याओं के कारण इस योजना को आगे नहीं बढ़ाया जा सका था। लेकिन अब देश के एटीएम और कैश मैनेजमेंट सिस्टम इतने आधुनिक हो चुके हैं कि वे पॉलिमर नोटों को आसानी से प्रोसेस कर सकते हैं, जिससे इस योजना के सफल होने की संभावना बढ़ गई है।