बांग्लादेश में बृहस्पतिवार सुबह से 13वें संसदीय चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। साल 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद यह देश का पहला आम चुनाव है। इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पिछले 15 वर्षों तक सत्ता में रही अवामी लीग पार्टी को इस बार चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। भारत के लिए यह चुनाव कूटनीतिक और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि बांग्लादेश भारत के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है।
अवामी लीग की अनुपस्थिति और नया राजनीतिक परिदृश्य
शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हुआ है। अवामी लीग पर प्रतिबंध लगने के बाद अब मुख्य मुकाबला पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-पार्टी गठबंधन के बीच देखा जा रहा है। बीएनपी का नेतृत्व वर्तमान में तारिक रहमान कर रहे हैं, जो लंबे निर्वासन के बाद सक्रिय राजनीति में लौटे हैं और 9% वोट शेयर मिलने का अनुमान लगाया गया है, जो एक बेहद कड़े मुकाबले की ओर संकेत करता है।
भारत की सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर संभावित प्रभाव
भारत के लिए बांग्लादेश की स्थिरता सीधे तौर पर उसकी आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी हुई है। पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्य बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि बांग्लादेश में कट्टरपंथी विचारधारा वाली सरकार सत्ता में आती है, तो सीमा पार घुसपैठ और उग्रवाद की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर भी भारत में चिंताएं बनी हुई हैं। हाल के महीनों में हुई हिंसा की घटनाओं ने नई दिल्ली को सतर्क कर दिया है, जिससे इस चुनाव के नतीजे भारत की विदेश नीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकते हैं।
बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी: दिल्ली के लिए कूटनीतिक विकल्प
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत सरकार ने हाल के समय में बीएनपी के साथ संबंधों को फिर से स्थापित करने के संकेत दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खालिदा जिया के निधन पर व्यक्त की गई संवेदना को इसी दिशा में एक कदम के रूप में देखा गया था। बीएनपी के साथ भारत अपने संबंधों को 'री-सेट' करने की संभावना तलाश रहा है। दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी को पारंपरिक रूप से भारत-विरोधी और पाकिस्तान समर्थक माना जाता है। विश्लेषकों का तर्क है कि जमात की जीत से क्षेत्रीय समीकरणों में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ सकता है, जो भारत के रणनीतिक हितों के प्रतिकूल हो सकता है।
भारतीय राज्यों की राजनीति पर चुनाव का असर
बांग्लादेश के चुनाव परिणामों का प्रभाव केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर भारत के पूर्वी राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम के आगामी विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। इन राज्यों में बांग्लादेशी प्रवास और नागरिकता जैसे मुद्दे राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर इन राज्यों के चुनावी विमर्श पर पड़ता है। विश्लेषकों के अनुसार, ढाका में एक स्थिर और धर्मनिरपेक्ष सरकार की स्थापना ही भारत के दीर्घकालिक हितों और क्षेत्रीय शांति के लिए अनुकूल होगी।
निष्कर्ष और भविष्य का विश्लेषण
77 करोड़ मतदाता आज अपने भविष्य का फैसला कर रहे हैं। 299 सीटों पर हो रहे इस मतदान के साथ-साथ देश में 84-पॉइंट सुधार जनमत संग्रह भी आयोजित किया जा रहा है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह नई सरकार के साथ किस प्रकार तालमेल बिठाता है ताकि व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग के पुराने ढांचे को बहाल किया जा सके। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में भारतीय कूटनीति को बांग्लादेश के नए नेतृत्व के साथ बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा ताकि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बना रहे।