भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को निजी बैंकिंग क्षेत्र के दिग्गजों के लिए एक काला दिन साबित हुआ। निवेशकों ने देश के बड़े निजी बैंकों में जबरदस्त बिकवाली की, जिससे बाजार में हड़कंप मच गया। एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक इस बिकवाली के मुख्य केंद्र रहे और इन तीनों बैंकों की कुल मार्केट वैल्यू में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की भारी कमी दर्ज की गई। हालांकि इन बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ यानी कर्ज देने की रफ्तार अच्छी बनी हुई है, लेकिन निवेशक अब केवल विकास के आंकड़ों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका ध्यान अब मुनाफे की गुणवत्ता और मार्जिन पर केंद्रित हो गया है, जिसके कारण इन दिग्गज शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली।
बाजार पूंजीकरण में आई भारी गिरावट के आंकड़े
सोमवार के कारोबारी सत्र में एक्सिस बैंक के शेयरों में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई, जहां इसके शेयर 6 प्रतिशत तक टूट गए। इस गिरावट के कारण एक्सिस बैंक के मार्केट कैपिटलाइजेशन में करीब 25000 करोड़ रुपये की कमी आई। देश के सबसे बड़े निजी बैंक, एचडीएफसी बैंक के शेयरों में भी 5 दशमलव 56 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिससे बैंक को करीब 65000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसी तरह, कोटक महिंद्रा बैंक के शेयरों में 3 दशमलव 51 प्रतिशत की गिरावट आई, जिससे इसके बाजार मूल्य में करीब 14000 करोड़ रुपये की कमी हुई। कुल मिलाकर, इन तीनों बैंकों ने मिलकर बाजार से 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति गंवा दी।
आईसीआईसीआई बैंक ने दिखाया मजबूती का रुख
बाजार में मचे इस कोहराम के बीच आईसीआईसीआई बैंक एक अपवाद के रूप में उभरा। जहां अन्य बड़े निजी बैंक गिरावट का सामना कर रहे थे, वहीं आईसीआईसीआई बैंक के शेयरों में लगभग 1 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह इस बात का संकेत है कि निवेशक बैंकिंग शेयरों को बिना सोचे-समझे नहीं बेच रहे हैं। वे उन बैंकों पर भरोसा जता रहे हैं जिनकी ग्रोथ की क्वालिटी बेहतर है और जिनका मुनाफा स्थिर बना हुआ है। निवेशकों का फैसला अब केवल इस बात पर निर्भर नहीं है कि बैंक कितना कर्ज बांट रहे हैं, बल्कि इस पर है कि उस कर्ज से बैंक कितना वास्तविक मुनाफा कमा पा रहे हैं।
गिरावट के पीछे के मुख्य कारण और चुनौतियां
बैंकिंग शेयरों में इस भारी बिकवाली के पीछे कई गंभीर कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता नेट इंटरेस्ट मार्जिन (एनआईएम) को लेकर है। नेट इंटरेस्ट मार्जिन वह अंतर होता है जो बैंक अपने द्वारा दिए गए कर्ज पर कमाते हैं और जो वे जमाकर्ताओं को ब्याज के रूप में देते हैं। वर्तमान में बैंकों के मार्जिन पर भारी दबाव देखा जा रहा है। इसका एक मुख्य कारण करंट और सेविंग्स अकाउंट (कासा) डिपॉजिट में आने वाली कमी है। कासा डिपॉजिट बैंकों के लिए फंड जुटाने का सबसे सस्ता जरिया होता है और जब इसमें कमी आती है, तो बैंकों को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगे टर्म डिपॉजिट और अन्य उधारों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है और मुनाफा कम हो जाता है।
कॉर्पोरेट और रिटेल लेंडिंग का बदलता समीकरण
बाजार के जानकारों का विश्लेषण है कि वर्तमान में कॉर्पोरेट लेंडिंग यानी बड़ी कंपनियों को दिए जाने वाले कर्ज में तो तेजी आ रही है, लेकिन रिटेल क्रेडिट यानी आम लोगों को दिए जाने वाले कर्ज की रफ्तार उतनी तेज नहीं है। कॉर्पोरेट लोन से बैंकों को आमतौर पर कम रिटर्न मिलता है। इक्विरस सिक्योरिटीज की एक समीक्षा के अनुसार, आईसीआईसीआई बैंक को छोड़कर अन्य बड़े निजी बैंकों के मार्जिन में मिड-टीन बेसिस-पॉइंट की क्रमिक गिरावट देखी गई है। इसका मुख्य कारण कॉर्पोरेट लोन में बढ़ोतरी और ब्याज दरों के अंतर (स्प्रेड) में आने वाली कमी है। कंपनियों द्वारा वर्किंग कैपिटल की बढ़ती मांग और बॉन्ड मार्केट के बजाय बैंकों से उधार लेने की प्रवृत्ति ने कॉर्पोरेट क्रेडिट को तो बढ़ाया है, लेकिन इससे बैंकों के मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है।
भविष्य की राह और निवेशकों की चिंताएं
ब्रोकरेज फर्मों और बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिटेल ग्रोथ कब तक स्थिर बनी रहेगी और मार्जिन में सुधार कब शुरू होगा। इसके अलावा, कुछ बैंकों में लीडरशिप यानी नेतृत्व को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी निवेशकों के मन में डर पैदा किया है। बैंकों को अब अपनी कम लागत वाली डिपॉजिट फ्रेंचाइजी को मजबूत करने और अपने मुनाफे के अंतर को सुधारने पर ध्यान देना होगा। जब तक मार्जिन में सुधार के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक इन दिग्गज बैंकिंग शेयरों पर दबाव बना रह सकता है।