राजस्थान सहित पूरे भारत में वर्ष 2026 में होली के पर्व को लेकर तिथियों का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषविदों और पंचांग गणना के अनुसार, इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च 2026 को किया जाएगा, जबकि रंगों वाली होली यानी धुलंडी 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। तिथियों में इस बदलाव का मुख्य कारण फाल्गुन पूर्णिमा के दौरान भद्रा का साया और अगले दिन लगने वाला साल का पहला चंद्र ग्रहण है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन हमेशा प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि के दौरान किया जाता है, लेकिन भद्रा मुख का त्याग करना अनिवार्य होता है।
फाल्गुन पूर्णिमा तिथि और भद्रा काल का समय
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च 2026 को शाम 5:56 बजे से होगी। यह तिथि अगले दिन यानी 3 मार्च 2026 को शाम 5:08 बजे समाप्त हो जाएगी। शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन के लिए प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) और पूर्णिमा तिथि का होना आवश्यक है। 3 मार्च को सूर्यास्त से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है, इसलिए 2 मार्च की रात को ही होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत माना गया है। हालांकि, 2 मार्च को भद्रा का प्रभाव रहेगा। ज्योतिष गणना के अनुसार, भद्रा की पुंछ का समय 2 मार्च की देर रात 12:50 बजे से शुरू होकर 3 मार्च की तड़के 2:02 बजे तक रहेगा। विद्वानों के अनुसार, भद्रा मुख का त्याग कर भद्रा पुंछ में दहन करना शुभ और विजय प्रदान करने वाला होता है।
साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण और सूतक काल
3 मार्च 2026 को साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। खगोलीय गणना के अनुसार, यह ग्रहण दोपहर 3:20 बजे शुरू होगा और शाम 6:47 बजे समाप्त होगा। भारत में यह ग्रहण आंशिक रूप से दिखाई देगा, विशेषकर इसके मोक्ष काल के समय। धार्मिक नियमों के अनुसार, चंद्र ग्रहण का सूतक काल ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले प्रभावी हो जाता है। 3 मार्च की सुबह से ही सूतक काल शुरू हो जाएगा, जिसके कारण इस दिन किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ या रंगों का उत्सव मनाना वर्जित रहेगा। इसी कारण से 3 मार्च को धुलंडी नहीं मनाई जाएगी।
धुलंडी की तिथि और राजस्थान में उत्सव
चंद्र ग्रहण के प्रभाव और सूतक काल की समाप्ति के बाद, रंगों की होली यानी धुलंडी 4 मार्च 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। राजस्थान के प्रमुख शहरों जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर में धुलंडी का भव्य आयोजन इसी दिन होगा। जयपुर में सिटी पैलेस और गोविंद देव जी मंदिर में होने वाले विशेष उत्सव भी 4 मार्च को ही आयोजित किए जाएंगे। ज्योतिषियों के अनुसार, ग्रहण के अगले दिन सूर्योदय के बाद स्नान-दान कर रंगों का उत्सव मनाना शुभ फलदायी होता है। राजस्थान में इस बार होली का पर्व तीन दिनों तक विस्तारित रहेगा, जिसमें पहले दिन दहन, दूसरे दिन ग्रहण का संयम और तीसरे दिन रंगों का उल्लास होगा।
होलिका पूजन की विधि और धार्मिक परंपराएं
होलिका दहन से पूर्व पूजन की परंपरा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु पूजन स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठते हैं और पूजन सामग्री में रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग और बताशे शामिल किए जाते हैं। होलिका के चारों ओर कच्चे सूत को लपेटते हुए 3, 5 या 7 बार परिक्रमा की जाती है। अंत में जल अर्पित कर नई फसल जैसे जौ या गेहूं की बालियों को अग्नि में समर्पित किया जाता है। यह अनुष्ठान परिवार की सुख-समृद्धि और नकारात्मक ऊर्जा के विनाश के लिए किया जाता है। प्रदोष काल में अग्नि प्रज्वलित करना बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
राजस्थान के विभिन्न अंचलों में होली की मान्यताएं
राजस्थान में होली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी है। शेखावाटी क्षेत्र में चंग और ढप की थाप पर होली के गीत गाए जाते हैं, जबकि मेवाड़ में आदिवासी परंपराओं के साथ इसे मनाया जाता है। 2026 में चंद्र ग्रहण के कारण सूतक काल के दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे, जिससे सार्वजनिक उत्सवों पर भी प्रभाव पड़ेगा। प्रशासन और मंदिर समितियों द्वारा 4 मार्च को ही मुख्य आयोजनों की तैयारी की जा रही है। बीकानेर में रम्मतों का आयोजन और जैसलमेर में लोक गीतों की महफिलें भी ग्रहण के नियमों का पालन करते हुए निर्धारित की गई हैं।
[DISCLAIMER_START] यह रिपोर्ट केवल धार्मिक पंचांग और ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित सूचनात्मक जानकारी प्रदान करती है। तिथियों और मुहूर्तों के संबंध में स्थानीय परंपराओं और विद्वानों के मत भिन्न हो सकते हैं।