ईरान के मशहद शहर में स्थित इमाम रज़ा की दरगाह न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह इतिहास, कला और राजनीति का एक अद्भुत संगम भी है और यहां कई ऐसी महान हस्तियां दफन हैं जिन्होंने मध्य पूर्व और इस्लामी इतिहास की दिशा बदली है। यहीं ईरान के सर्वोच्च कमांडर रहे अयातुल्लाह खोमेनेई आगामी 9 जुलाई को दफन किए जाएंगे। ईरान सरकार की ओर से उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां बड़े पैमाने पर की जा रही हैं। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बीच यह जानना दिलचस्प है कि इस पवित्र परिसर में और कौन-कौन सी महान हस्तियां चिरनिद्रा में लीन हैं और उनका इतिहास में क्या योगदान रहा है।
क्यों खास है मशहद की पवित्र दरगाह?
ईरान के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित मशहद शहर दुनिया भर के शिया मुसलमानों के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। मशहद शब्द का शाब्दिक अर्थ है शहादत का स्थान। यह नाम इमाम रज़ा की शहादत के बाद पड़ा। यह दरगाह परिसर क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक मानी जाती है। यहां हर साल लगभग 3 करोड़ से अधिक तीर्थयात्री मत्था टेकने आते हैं। यह स्थान सदियों से विभिन्न राजवंशों जैसे तैमूरी, सफ़वी और क़ाजार शासकों के संरक्षण में विकसित हुआ है और हर कालखंड की छाप यहां की वास्तुकला पर स्पष्ट दिखाई देती है।
दरगाह के मुख्य अधिष्ठाता इमाम रजा
दरगाह के केंद्र में अली इब्न मूसा अल-रज़ा उर्फ इमाम रज़ा की कब्र है। वे शिया इस्लाम के आठवें इमाम थे। इमाम रज़ा को उनके ज्ञान, उदारता और धैर्य के लिए जाना जाता था। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर अब्बासी खलीफा अल-मामून ने उन्हें खुरासान बुलाया और 818 ईस्वी में जहर देकर उनकी हत्या कर दी। उनकी शहादत के बाद यह छोटा सा गांव सनाबाद एक विशाल पवित्र शहर मशहद में बदल गया। इमाम रज़ा की कब्र पर लगा सुनहरा गुंबद इस पूरे परिसर की सबसे प्रमुख पहचान है और करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।
खलीफा हरून अल-रशीद: एक ऐतिहासिक विरोधाभास
इमाम रज़ा की कब्र के ठीक बगल में प्रसिद्ध अब्बासी खलीफा हरून अल-रशीद की कब्र भी है। हरून अल-रशीद का नाम अलिफ लैला की कहानियों से दुनिया भर में मशहूर है। वे इमाम रज़ा से लगभग 10 साल पहले 809 ईस्वी में फौजी अभियान के दौरान यहां मरे थे। उस समय इस जगह को हरूनिय्याह कहा जाता था। इतिहास का यह एक बड़ा विरोधाभास है कि जिस अब्बासी वंश ने इमामों पर जुल्म किए, उसी के सबसे शक्तिशाली खलीफा को उसी स्थान पर जगह मिली जहां बाद में इमाम रज़ा को दफनाया गया। यह स्थान इतिहास की विडंबनाओं को बखूबी दर्शाता है।
राजकुमार अब्बास मिर्जा: आधुनिकता के अग्रदूत
काजार राजवंश के क्राउन प्रिंस अब्बास मिर्जा भी इसी परिसर में दफन हैं। 19वीं सदी की शुरुआत में वे ईरान की सेना के कमांडर थे। उन्होंने रूस-फारस युद्धों में बहादुरी से लड़ाई लड़ी। अब्बास मिर्जा को ईरान में आधुनिक सेना और प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत करने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। हालांकि, वे राजा बनने से पहले ही मर गए, लेकिन उनका कद इतिहास में बहुत ऊँचा है। उनकी कब्र यहाँ के शाही इतिहास की गवाही देती है और उनके द्वारा किए गए सुधारों की याद दिलाती है।
शेख बहाई: विज्ञान और अध्यात्म का संगम
दरगाह के भीतर एक और महत्वपूर्ण कब्र बहा अल-दीन अल-आमिली की है, जिन्हें दुनिया शेख बहाई के नाम से जानती है। वे 16वीं-17वीं शताब्दी के एक महान विद्वान, गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और वास्तुकार थे। सफ़वी काल के दौरान उन्होंने इस्फहान शहर के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्हें एक महान सूफी संत भी माना जाता है। दरगाह का वास्तुशिल्प और पानी की इंजीनियरिंग प्रणाली उन्हीं की देन कही जाती है और आज भी विद्वान और छात्र उनकी कब्र पर सम्मान प्रकट करने आते हैं और उनके ज्ञान से प्रेरणा लेते हैं।
इब्राहिम रईसी: इमाम रज़ा के चरणों में दफनाया गया
हाल के इतिहास में सबसे चर्चित नाम इब्राहिम रईसी का है। ईरान के पूर्व राष्ट्रपति रईसी की मई 2024 में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में दुखद मृत्यु हो गई थी। वे मशहद के ही रहने वाले थे और दरगाह के संरक्षक के रूप में भी सेवा दे चुके थे और उनकी वसीयत और जनता की भावनाओं को देखते हुए उन्हें इमाम रज़ा के चरणों में दफनाया गया। उनके अंतिम संस्कार में पूरे ईरान से लाखों लोग उमड़ पड़े थे। उनकी कब्र को अब एक नए राजनीतिक तीर्थ स्थल के रूप में देखा जाता है, जो उनके और इमाम रज़ा के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता है।
अयातुल्ला अली खामेनेई: मशहद में जन्म, यहीं होंगे दफन
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने भी यह इच्छा जताई थी कि उन्हें इमाम रज़ा दरगाह में ही दफनाया जाए। उनके लिए दरगाह परिसर में स्थान पहले से ही चिन्हित किया जा चुका है। खामेनेई का जन्म मशहद में ही हुआ था, इसलिए उनका जुड़ाव इस मिट्टी से बहुत गहरा है और किसी भी सर्वोच्च नेता का यहां दफन होना यह दर्शाता है कि यह स्थान ईरान की धार्मिक और राजनीतिक सत्ता के लिए कितना महत्वपूर्ण है। यह स्थान उनकी जन्मभूमि और अंतिम विश्राम स्थल दोनों बनेगा।
तैमूरी और सफ़वी राजवंश की हस्तियां
दरगाह के विभिन्न आंगनों में तैमूरी राजवंश के कई शहजादे और रानियां दफन हैं। यहां की प्रसिद्ध गोहरशाद मस्जिद, जिसे रानी गोहरशाद ने बनवाया था, उसके पास भी कई शाही मजारें हैं। सफ़वी काल के दौरान, जब ईरान में शिया धर्म को राजधर्म बनाया गया, तब कई सफ़वी शाह और उनके वजीर यहां दफन हुए। इन कब्रों पर नक्काशी और सुलेख का काम देखने लायक है, जो उस दौर की कला और संस्कृति को आज भी जीवित रखता है।
गोहरशाद बेगम: कला की संरक्षक
गोहरशाद बेगम की मुख्य कब्र अफगानिस्तान के हेरात में है, लेकिन मशहद की दरगाह में उनका प्रभाव हर पत्थर पर दिखता है और उनके द्वारा बनवाई गई मस्जिद और उसके आसपास के हिस्से में उनके परिवार के कई सदस्य दफन हैं। उन्होंने कला और संस्कृति को जो बढ़ावा दिया, वह आज भी दरगाह की खूबसूरती में झलकता है। उनकी विरासत आज भी लाखों श्रद्धालुओं को प्रभावित करती है।
विद्वानों और शहीदों की भूमि
शाही हस्तियों के अलावा, यहां सैकड़ों ऐसे उलेमा और क्लैरिक्स दफन हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार में लगा दिया। 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध के कई बड़े कमांडरों और शहीदों को भी यहाँ छोटे कब्रिस्तान के हिस्सों में जगह दी गई है। यह स्थान ईरान के लिए राष्ट्रीय गौरव का भी प्रतीक है और इमाम रज़ा की दरगाह में दफन होना किसी भी ईरानी के लिए सबसे बड़े सम्मान की बात मानी जाती है। यहाँ की मान्यता है कि इमाम रज़ा अपने पड़ोस में दफन लोगों की सिफारिश करेंगे। यही कारण है कि शहंशाह से लेकर खलीफा और क्रांतिकारी नेताओं तक, हर कोई यहां मिट्टी में मिलना चाहता है और यह दरगाह केवल पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह ईरान के एक हजार साल के इतिहास का जीवित दस्तावेज है।