पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के बारे में फैली गलतफहमियों को दूर करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 23 जून 2026 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति और 4 जुलाई 2026 को ऑटोमोबाइल कंपनियों द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद, अब सरकार ने तथ्यों और सबूतों पर आधारित अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (FAQs) के जवाब जारी किए हैं। यह स्पष्टीकरण 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाले E20 पेट्रोल के उपयोग, इसके प्रभाव और भविष्य की रणनीति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग का लंबा इतिहास
सरकार ने उन सवालों का जवाब दिया है जिनमें इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्यों को पूरा करने में जल्दबाजी की बात कही गई थी। सरकार का कहना है कि इथेनॉल कोई नया ईंधन नहीं है। एक सदी से भी पहले हेनरी फोर्ड ने अपनी मॉडल टी कार को इथेनॉल से चलाने के लिए डिजाइन किया था। भारत में भी यह कार्यक्रम अचानक शुरू नहीं हुआ है। 2001 में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, जिसकी औपचारिक घोषणा 2004 में हुई और 2006 तक कई राज्यों में E5 यानी 5 प्रतिशत ब्लेंडिंग लागू कर दी गई थी।
इसके बाद जनवरी 2013 में यूपीए सरकार के दौरान भारत के राजपत्र में इसकी पॉलिसी रूपरेखा अधिसूचित की गई थी। 5 प्रतिशत पर ही अटका रहा। असली चुनौती तकनीक की नहीं बल्कि पर्याप्त उत्पादन की थी। उस समय भारत मुख्य रूप से गन्ने पर निर्भर था और उत्पादन क्षमता केवल 400 करोड़ लीटर सालाना थी। इस कमी को दूर करने के लिए मई 2018 में जैव-ईंधन पर राष्ट्रीय नीति शुरू की गई, जिसने एक बड़ा इकोसिस्टम तैयार किया। इसमें पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ-साथ खाद्य विभाग, सड़क परिवहन मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय और भारतीय रेलवे जैसे कई विभागों ने मिलकर काम किया।
उत्पादन क्षमता और निवेश का नया ढांचा
अगस्त 2021 में एक बड़ा बदलाव आया जब तेल कंपनियों (IOCL, BPCL और HPCL) ने समर्पित इथेनॉल प्लांट (DEP) स्थापित करने के लिए रुचि की अभिव्यक्ति जारी की। इन परियोजनाओं को सरकारी बैंकों के माध्यम से एस्क्रो मैकेनिज्म और तीन-तरफा फाइनेंसिंग व्यवस्था का सहारा मिला, जिससे निवेश का जोखिम कम हो गया। जून 2021 में नीति आयोग ने एक विस्तृत रोडमैप जारी किया, जिसमें पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण आय पर इसके प्रभाव को रेखांकित किया गया। जब यह स्पष्ट हो गया कि देश 1200 करोड़ लीटर उत्पादन करने में सक्षम हो जाएगा, तब 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा गया। यह दो दशकों की मेहनत का परिणाम है, न कि कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला।
इंजन की सुरक्षा और माइलेज पर प्रभाव
ग्राहकों की चिंताओं को दूर करते हुए सरकार ने बताया कि E20 को लॉन्च करने से पहले ऑटोमोबाइल कंपनियों और टेस्टिंग एजेंसियों के साथ व्यापक परामर्श किया गया था। इंजन की ड्यूरेबिलिटी, उत्सर्जन और फ्यूल सिस्टम की गहन जांच की गई। 5 करोड़ ऐसी पुरानी गाड़ियां थीं जो E20 सर्टिफाइड नहीं थीं, फिर भी उनमें जंग या घिसाव जैसी कोई समस्या नहीं पाई गई। हीरो मोटोकॉर्प ने भी इसी तरह के सकारात्मक परिणाम साझा किए हैं।
जहां तक माइलेज का सवाल है, कुछ गाड़ियों में 3 से 5 प्रतिशत की मामूली कमी आ सकती है। लेकिन इसके बदले में E20 बेहतर ऑक्टेन रेटिंग, बेहतर पिकअप और स्मूद एक्सेलरेशन प्रदान करता है। यह इंजन को साफ रखता है और कार्बन उत्सर्जन में 40 प्रतिशत तक की कमी लाता है। सरकार का तर्क है कि जब हमारे पास एक साफ और बेहतर तकनीक वाला ईंधन उपलब्ध है, तो हमें पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले विकल्पों की ओर नहीं देखना चाहिए।
कीमत का गणित और आर्थिक सुरक्षा
एक प्रमुख सवाल यह है कि E20 पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं है। सरकार वर्तमान में किसानों को समर्थन देने के लिए इथेनॉल को अच्छी कीमतों पर खरीद रही है। उदाहरण के लिए, मक्के से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत लगभग 71 रुपये 86 पैसे प्रति लीटर है। इसमें जीएसटी, परिवहन और स्टोरेज का खर्च अलग से जुड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास होती है, तो शुद्ध पेट्रोल की तुलना में E20 का उत्पादन महंगा पड़ता है।
हालांकि, यदि कच्चे तेल की कीमत 120-130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो इथेनॉल एक सस्ता विकल्प बन जाता है। इथेनॉल ब्लेंडिंग का मुख्य उद्देश्य केवल पेट्रोल को सस्ता करना नहीं है, बल्कि आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना है। आज भारत में बिकने वाले पेट्रोल का 20 प्रतिशत हिस्सा घरेलू इथेनॉल है, जिसकी कीमत 71 रुपये 86 पैसे पर स्थिर रहती है और अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होती। यही कारण है कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारत में ईंधन की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी हुई है। सरकारी बैंकों ने इस क्षेत्र में हर साल लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा और किसानों के कल्याण के लिए एक ठोस कदम है।