भारत और ब्रिटेन के बीच हस्ताक्षरित व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) अप्रैल 2026 तक लागू होने की संभावना है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, 24 जुलाई 2025 को हस्ताक्षरित इस ऐतिहासिक समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है। इस समझौते के प्रभावी होने के बाद भारत से ब्रिटेन भेजे जाने वाले लगभग 99 प्रतिशत उत्पादों को शुल्क मुक्त पहुंच प्राप्त होगी। वहीं, भारत में ब्रिटेन से आने वाली स्कॉच व्हिस्की और प्रीमियम ऑटोमोबाइल पर लगने वाले आयात शुल्क में महत्वपूर्ण कटौती की जाएगी। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि दोनों देश इस समझौते को समयबद्ध तरीके से लागू करने के लिए प्रशासनिक और विधायी प्रक्रियाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।
आयात शुल्क में कटौती और उपभोक्ता वस्तुओं पर प्रभाव
इस समझौते के तहत स्कॉच व्हिस्की पर लगने वाले भारी शुल्क को चरणबद्ध तरीके से कम किया जाएगा और वर्तमान में स्कॉच व्हिस्की पर 150% आयात शुल्क लगता है, जिसे समझौता लागू होते ही घटाकर 75% कर दिया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, 2035 तक इस शुल्क को और कम करके 40% तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अतिरिक्त, भारत ने चॉकलेट, बिस्कुट और सौंदर्य प्रसाधनों (ब्यूटी प्रोडक्ट्स) सहित कई ब्रिटिश उपभोक्ता उत्पादों के लिए अपने बाजार के दरवाजे खोल दिए हैं। इससे भारतीय उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के उत्पाद कम कीमतों पर उपलब्ध होने की उम्मीद है।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए कोटा आधारित प्रणाली
लग्जरी कारों के आयात के मामले में भारत एक कोटा-आधारित प्रणाली अपनाएगा। समझौते के प्रावधानों के अनुसार, भारत अगले पांच वर्षों में कारों पर लगने वाले 110% टैरिफ को धीरे-धीरे घटाकर 10% कर देगा। यह कटौती एक निश्चित कोटा सीमा के भीतर आने वाले वाहनों पर लागू होगी। इसके बदले में, भारतीय वाहन निर्माताओं को ब्रिटेन के बाजार में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों के निर्यात के लिए विशेष कोटा ढांचा प्राप्त होगा। यह कदम दोनों देशों के ऑटोमोबाइल उद्योगों के बीच तकनीकी सहयोग और व्यापार प्रवाह को बढ़ाने के लिए उठाया गया है।
भारतीय निर्यातकों के लिए बाजार पहुंच और अवसर
भारतीय निर्यातकों के लिए यह समझौता विशेष रूप से कपड़ा, जूते, रत्न और आभूषण, खेल सामग्री और खिलौने जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में लाभकारी सिद्ध होगा। वर्तमान में इन उत्पादों को ब्रिटेन के बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा और शुल्कों का सामना करना पड़ता है। CETA के लागू होने के बाद, भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन में शुल्क मुक्त या कम शुल्क पर प्रवेश मिलेगा, जिससे वैश्विक बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और अधिकारियों का मानना है कि इससे भारत के विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा और निर्यात राजस्व में वृद्धि होगी।
विधायी अनुमोदन प्रक्रिया और द्विपक्षीय प्रगति
समझौते को पूरी तरह से लागू करने के लिए दोनों देशों में संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है और ब्रिटेन में इस समझौते को संसद के दोनों सदनों, हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स से मंजूरी लेनी होगी। हाल ही में ब्रिटिश संसद में इस पर चर्चा हुई, जहां व्यापार एवं वाणिज्य विभाग के राज्य मंत्री क्रिस ब्रायंट ने इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया और भारत में, इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित किया जाता है। दोनों देशों के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि अनुमोदन प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है और इसके अप्रैल 2026 की समय सीमा तक पूरा होने की उम्मीद है।
दोहरा अंशदान संधि और व्यापार लक्ष्य
व्यापार समझौते के साथ-साथ, भारत और ब्रिटेन ने दोहरा अंशदान संधि (DCC) पर भी हस्ताक्षर किए हैं। यह संधि उन अस्थायी कर्मचारियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो एक देश से दूसरे देश में काम करने जाते हैं। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कर्मचारियों को दोनों देशों में एक ही आय पर सामाजिक सुरक्षा कर न देना पड़े। आर्थिक लक्ष्यों की बात करें तो CETA का मुख्य उद्देश्य 2030 तक भारत और ब्रिटेन के बीच मौजूदा 56 अरब डॉलर के व्यापार को दोगुना करना है। यह समझौता दुनिया की पांचवीं और छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक एकीकरण को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।