ईरान ने आधिकारिक तौर पर उन खबरों का खंडन किया है जिनमें दावा किया गया था कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले भारतीय जहाजों से टोल वसूल रहा है। भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहली ने स्पष्ट किया कि तेहरान ने अब तक भारतीय जहाजों से कोई शुल्क नहीं लिया है और वह भविष्य में भी भारत की समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहयोग जारी रखेगा। राजदूत के अनुसार, भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय संबंध इस चुनौतीपूर्ण समय में भी अत्यंत मजबूत बने हुए हैं और दोनों देशों के रणनीतिक हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
राजदूत मोहम्मद फतहली का आधिकारिक स्पष्टीकरण
राजदूत मोहम्मद फतहली ने नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि भारत सरकार से इन दावों की पुष्टि की जा सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान ने भारतीय जहाजों के सुरक्षित मार्ग के लिए कभी भी किसी प्रकार के टोल की मांग नहीं की है। फतहली ने बताया कि ईरान के विदेश मंत्री ने भारत को अपने उन 5 सबसे खास और भरोसेमंद मित्र देशों की सूची में रखा है, जिनके साथ ईरान हर परिस्थिति में खड़ा रहने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि ईरान का भारत सरकार के साथ निरंतर और प्रभावी संपर्क बना हुआ है, ताकि समुद्री व्यापार में किसी भी प्रकार की बाधा को टाला जा सके।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और होर्मुज का रणनीतिक महत्व
होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, क्योंकि भारत की कुल कच्चे तेल और एलपीजी (LPG) आपूर्ति का लगभग 50% हिस्सा इसी संकीर्ण रास्ते से होकर गुजरता है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है और अधिकारियों के अनुसार, इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का तनाव या आवाजाही में रुकावट भारत की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों पर सीधा प्रभाव डाल सकती है। यही कारण है कि भारत इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय रहा है।
भारतीय जहाजों की वर्तमान स्थिति और सुरक्षित निकासी
क्षेत्रीय संघर्ष और तनाव के बीच, भारत ने पहले भी स्पष्ट किया था कि उसने अपने जहाजों के सुरक्षित मार्ग के लिए ईरान को कोई भुगतान नहीं किया है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान-इजराइल संघर्ष के चरम पर होने के दौरान, जब होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई थी, तब भारत के 9 एलपीजी जहाजों को सुरक्षित रूप से इस मार्ग से निकाला गया था। हालांकि, वर्तमान में भी भारतीय झंडे वाले लगभग 15 जहाज फारस की खाड़ी के विभिन्न हिस्सों में मौजूद हैं। ईरानी अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि वे इन जहाजों की सुरक्षा और सुचारू आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए भारतीय अधिकारियों के साथ समन्वय कर रहे हैं।
क्षेत्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर ईरान का रुख
होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर चर्चा करते हुए राजदूत फतहली ने कहा कि यह क्षेत्र ईरान के संप्रभु अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका और इजराइल की कार्रवाइयों के कारण क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हुई है। फतहली ने कहा कि ईरान कूटनीति और बातचीत के लिए हमेशा तैयार है, लेकिन वह अपने पिछले अनुभवों के आधार पर अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका अपनी 'गैरकानूनी' मांगें छोड़ देता है और ईरान की शर्तों को स्वीकार करता है, तो तेहरान बातचीत की मेज पर लौटने पर विचार कर सकता है।
अमेरिकी नाकेबंदी और वैश्विक व्यापार पर इसके संभावित प्रभाव
ईरान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकेबंदी (Blockade) करने का संकेत दिया है और अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, इस नाकेबंदी का प्राथमिक उद्देश्य ईरान की तेल बिक्री को रोकना और उसकी आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना है। हालांकि, CENTCOM ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस कार्रवाई के दौरान अन्य देशों के वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को बाधित नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की सैन्य घेराबंदी से क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए रसद और बीमा लागत में वृद्धि होने की संभावना है।