उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती एक बार फिर अपने पुराने और सफल 'सोशल इंजीनियरिंग' फॉर्मूले को सक्रिय करती नजर आ रही हैं। हाल ही में फिल्म 'घूसखोर पंडत' के नाम को लेकर उपजे विवाद के बीच मायावती ने ब्राह्मण समाज के पक्ष में बयान जारी किया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम केवल एक फिल्म के नाम का विरोध नहीं है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ब्राह्मण मतदाताओं को फिर से बसपा के पाले में लाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। मायावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी हमेशा से सभी वर्गों के सम्मान की पक्षधर रही है।
2007 का ऐतिहासिक सोशल इंजीनियरिंग मॉडल
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 2007 एक मील का पत्थर माना जाता है। उस समय मायावती ने 'बहुजन' से 'सर्वजन' की ओर कदम बढ़ाते हुए दलित-ब्राह्मण गठबंधन का एक अनूठा प्रयोग किया था। विश्लेषकों के अनुसार, उस चुनाव में बसपा ने रिकॉर्ड 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इस रणनीति का परिणाम यह हुआ कि 41 ब्राह्मण प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसी सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत मायावती ने 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उस दौर में 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है' जैसे नारों ने राज्य की राजनीतिक दिशा बदल दी थी।
सत्ता में ब्राह्मणों की भागीदारी और रणनीतिक बदलाव
2007 की सरकार के दौरान मायावती ने न केवल ब्राह्मणों को टिकट दिया, बल्कि उन्हें शासन में महत्वपूर्ण स्थान भी प्रदान किया। मंत्रिमंडल में 7 ब्राह्मण मंत्रियों को शामिल किया गया था, जो उस समय की राजनीति में एक बड़ा संदेश था। सतीश चंद्र मिश्रा जैसे नेताओं को पार्टी का मुख्य चेहरा बनाकर बसपा ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि वह केवल एक वर्ग विशेष की पार्टी नहीं है। मायावती ने ब्राह्मण भाईचारा समितियों का गठन किया और राज्य भर में सम्मेलन आयोजित किए, जिससे सवर्ण मतदाताओं के बीच बसपा की स्वीकार्यता बढ़ी।
वर्तमान राजनीतिक चुनौतियां और 2027 की राह
वर्तमान में बसपा की स्थिति 2007 की तुलना में काफी भिन्न है। 2012 से पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है और हालिया चुनावों में उसका प्रदर्शन ग्राफ नीचे गिरा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को मात्र 1 सीट मिली और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका। जानकारों का मानना है कि भाजपा के मजबूत होने के बाद ब्राह्मण मतदाता बड़े पैमाने पर भगवा दल की ओर शिफ्ट हो गया है और मायावती अब अपने 15 जनवरी के संबोधन और फिल्म विवाद के जरिए यह संदेश देने का प्रयास कर रही हैं कि 2027 में सरकार बनने पर ब्राह्मणों को उचित सम्मान दिया जाएगा।
विशेषज्ञ विश्लेषण और राजनीतिक प्रतिक्रिया
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2007 और 2027 के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन आए हैं। उस समय समाजवादी पार्टी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी और भाजपा कमजोर स्थिति में थी, जिसका लाभ बसपा को मिला। हालांकि, वर्तमान में भाजपा का संगठनात्मक ढांचा और हिंदुत्व का एजेंडा सवर्ण मतदाताओं के बीच गहरा प्रभाव रखता है। उत्तर प्रदेश के पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, सवर्ण और विशेषकर ब्राह्मण समाज अब पूरी तरह से भाजपा के साथ है और वे किसी अन्य विकल्प की ओर नहीं देख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मायावती के लिए अपने पुराने आधार को वापस पाना एक बड़ी चुनौती होगी।
निष्कर्ष: क्या दोहराया जा सकेगा इतिहास?
मायावती द्वारा 'घूसखोर पंडत' फिल्म के बहाने ब्राह्मणों के प्रति दिखाई गई सहानुभूति उनके भविष्य के चुनावी रोडमैप का संकेत देती है और हालांकि, दलित वोट बैंक में सेंधमारी और भाजपा की सवर्णों पर मजबूत पकड़ के बीच, क्या 19 साल पुराना वह करिश्मा फिर से दोहराया जा सकेगा, यह एक बड़ा प्रश्न है। बसपा के लिए आगामी उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव इस रणनीति की सफलता की पहली परीक्षा साबित होंगे। फिलहाल, मायावती का यह रुख उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई चर्चा को जन्म दे चुका है।