तेल निर्यातक देशों के संगठन और उनके सहयोगियों (OPEC+) ने रविवार को आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में वैश्विक तेल बाजार की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और संभावित आपूर्ति बाधाओं को देखते हुए, समूह ने अप्रैल महीने से कच्चे तेल के उत्पादन में प्रतिदिन 2,06,000 बैरल की वृद्धि करने की घोषणा की है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार हॉर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधानों को लेकर चिंतित है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, यह वृद्धि बाजार में तरलता बढ़ाने और कीमतों में होने वाली अचानक वृद्धि को रोकने के लिए की गई है।
स्वैच्छिक आठ देशों की रणनीतिक भागीदारी और उत्पादन कोटा
इस निर्णय का नेतृत्व सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व वाले 'स्वैच्छिक आठ' (V8) देशों के समूह द्वारा किया गया है। इस समूह में सऊदी अरब, रूस, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान शामिल हैं। 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कटौती की थी, जिसे अब धीरे-धीरे वापस लिया जा रहा है। अप्रैल से लागू होने वाली 2,06,000 बैरल की अतिरिक्त आपूर्ति इसी रणनीति का हिस्सा है। इससे पहले बाजार विशेषज्ञों ने केवल 1,37,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि का अनुमान लगाया था, लेकिन संगठन ने आपूर्ति चिंताओं को दूर करने के लिए अधिक मात्रा में तेल बाजार में उतारने का फैसला किया है।
वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के प्रयास
28 फरवरी को ईरान पर हुए हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अस्थिरता देखी गई थी। OPEC+ के सचिवालय द्वारा जारी बयान में स्पष्ट किया गया है कि अतिरिक्त आपूर्ति का उद्देश्य वैश्विक स्टॉक में आ रही कमी को पूरा करना है। संगठन ने कहा कि वे बाजार की स्थितियों की निरंतर निगरानी कर रहे हैं और आवश्यकता पड़ने पर उत्पादन दरों में और संशोधन करने के लिए तैयार हैं। यह कदम विशेष रूप से उन अटकलों को शांत करने के लिए उठाया गया है जिनमें तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने की आशंका जताई जा रही थी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक मांग में वृद्धि और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच यह अतिरिक्त आपूर्ति एक बफर के रूप में कार्य करेगी।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य और आपूर्ति श्रृंखला के जोखिम
वैश्विक तेल व्यापार के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है, जहाँ से दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है। यह जलमार्ग ओमान और ईरान के बीच स्थित है और फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है और ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष के कारण इस मार्ग के बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। यदि यह जलमार्ग बंद होता है, तो ओपेक प्लस द्वारा की गई 2 लाख बैरल की अतिरिक्त आपूर्ति भी वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त हो सकती है। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि सीधे तौर पर टैंकरों की आवाजाही और बीमा लागत को प्रभावित करती है, जिससे अंततः उपभोक्ता देशों के लिए लागत बढ़ जाती है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आयात पर प्रभाव
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 85% आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व के देशों से आता है। OPEC+ के इस फैसले का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ने की संभावना है। अतिरिक्त आपूर्ति से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के स्थिर रहने की उम्मीद है, जिससे भारत के व्यापार घाटे और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता भारत के आयात बिल को संतुलित रखने में सहायक होती है। भारत के प्रमुख रिफाइनरी केंद्र जैसे जामनगर और वाडिनार मुख्य रूप से इसी क्षेत्र से आने वाले कच्चे तेल पर निर्भर हैं। सरकार और तेल विपणन कंपनियां वैश्विक भू-राजनीतिक स्थितियों पर बारीकी से नजर रख रही हैं ताकि घरेलू स्तर पर ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।