प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लोकसभा में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और भारत पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर सदन को संबोधित किया और प्रधानमंत्री ने कहा कि वह इस महत्वपूर्ण विषय पर देश के सामने वस्तुस्थिति रखने आए हैं क्योंकि वहां के हालात अत्यंत चिंताजनक बने हुए हैं। उन्होंने बताया कि यह संकट तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी है और इसका व्यापक असर लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत सरकार पूरी दुनिया के साथ मिलकर सभी पक्षों से इस समस्या के जल्द समाधान का आग्रह कर रही है और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी इस संबंध में सदन को आवश्यक तकनीकी और कूटनीतिक जानकारी प्रदान की है।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और सफल निकासी
प्रधानमंत्री ने सदन को अवगत कराया कि पश्चिम एशिया का क्षेत्र भारत के लिए सामरिक और मानवीय दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि लगभग 1 करोड़ भारतीय इस क्षेत्र में रहते और काम करते हैं। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर चलने वाले जहाजों में भारतीय क्रू मेंबर्स की संख्या काफी अधिक है। प्रधानमंत्री ने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से ही प्रभावित देशों में फंसे हर भारतीय को जरूरी मदद पहुंचाई जा रही है। उन्होंने स्वयं विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों से फोन पर बात की है, जिन्होंने भारतीयों की सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन दिया है। 75 लाख भारतीय सुरक्षित रूप से स्वदेश लौट चुके हैं। इसमें अकेले ईरान से लौटे 1000 भारतीय शामिल हैं, जिनमें 700 से अधिक मेडिकल छात्र हैं। भारत सरकार ने इसके लिए 24X7 हेल्पलाइन सेवा भी संचालित की है।
ऊर्जा सुरक्षा और आयात स्रोतों का विविधीकरण
ऊर्जा सुरक्षा के विषय पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से प्राप्त करता है। कच्चा तेल और फर्टिलाइजर जैसी आवश्यक वस्तुएं होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आती हैं। युद्ध के कारण इस मार्ग पर जहाजों का आवागमन बाधित हुआ है, लेकिन सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि देश में तेल और गैस का संकट उत्पन्न न हो। प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि पिछले एक दशक में भारत ने अपने ऊर्जा आयात के स्रोतों का विस्तार किया है। पहले भारत केवल 27 देशों से ऊर्जा आयात करता था, जिसकी संख्या अब बढ़ाकर 41 कर दी गई है। इसके अलावा, भारत अपनी घरेलू एलपीजी जरूरतों का 60% उत्पादन स्वयं कर रहा है और पेट्रोल-डीजल की सुचारू आपूर्ति के लिए निरंतर कार्य जारी है।
रणनीतिक तेल भंडार और निगरानी प्रणाली
आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए सरकार की तैयारियों पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने रणनीतिक तेल भंडारों के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि बीते दशक में भारत ने कच्चे तेल के भंडारण को प्राथमिकता दी है और वर्तमान में 65 लाख मीट्रिक टन की रिजर्व व्यवस्था पर काम चल रहा है। सरकार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ निरंतर संपर्क में है ताकि आपूर्ति श्रृंखला में कोई व्यवधान न आए। प्रधानमंत्री के अनुसार, ऊर्जा किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है और पश्चिम एशिया वैश्विक जरूरतों को पूरा करने वाला प्रमुख स्रोत है। भारत पर इस युद्ध के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए एक विशेष रणनीति के तहत काम किया जा रहा है। एक उच्च स्तरीय समूह का गठन किया गया है जो दैनिक आधार पर आयात-निर्यात की चुनौतियों की समीक्षा करता है।
कृषि क्षेत्र की स्थिरता और उर्वरक उपलब्धता
खेती और किसानों पर पड़ने वाले प्रभाव के संबंध में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत के पास पर्याप्त अन्न भंडार उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के बावजूद भारत के किसानों को यूरिया की एक बोरी ₹300 से भी कम कीमत पर उपलब्ध कराई गई है। किसानों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए सरकार ने देश में 6 नए यूरिया प्लांट स्थापित किए हैं। इसके साथ ही, आयात पर निर्भरता कम करने के लिए 'मेड इन इंडिया' नैनो यूरिया का विकल्प प्रदान किया गया है और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि तेल, गैस और फर्टिलाइजर से जुड़े जहाजों की सुरक्षित पहुंच के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ निरंतर संवाद किया जा रहा है।