बांकीपुर में 30 साल बाद ढहा भाजपा का किला प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत

Add as Preferred Source on Google News
विज्ञापन
बांकीपुर में 30 साल बाद ढहा भाजपा का किला प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत
विज्ञापन

बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आया है जहाँ बांकीपुर में भारतीय जनता पार्टी का 30 साल पुराना अभेद्य किला ढह गया है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपनी पहली ही चुनावी लड़ाई में इतिहास रचते हुए भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में शिकस्त दी है। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बांकीपुर सीट पिछले तीन दशकों से भाजपा का सुरक्षित ठिकाना मानी जाती थी। इस हार की सबसे बड़ी चोट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को लगी है, जिनकी पारंपरिक सीट और पारिवारिक विरासत को प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक रणनीति से उखाड़ फेंका है।

तीन दशक पुराने गढ़ का पतन

बांकीपुर में हुआ यह उपचुनाव भले ही केवल एक सीट के लिए था, लेकिन इसके परिणाम की गूंज पटना से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है। 30 वर्षों तक भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा जमाए रखा था, जिससे यह एक अजेय दुर्ग बन गया था। हालांकि, प्रशांत किशोर द्वारा लाई गई बदलाव की लहर इतनी तेज थी कि नितिन नवीन की विरासत भी उसे संभाल नहीं पाई। भाजपा ने इस सीट को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, कई केंद्रीय मंत्री और बिहार का पूरा कैबिनेट बांकीपुर में कैंप किए हुए था, लेकिन जनता के मूड के सामने उनकी एक न चली। पहली बार चुनाव लड़ रहे प्रशांत किशोर ने भाजपा को उसी के घर में मात देकर अपनी राजनीतिक क्षमता का लोहा मनवाया है।

भाजपा की करारी हार के मुख्य कारण

बांकीपुर में भाजपा की इस हार के पीछे कई बड़े कारण माने जा रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण भाजपा का अतिआत्मविश्वास रहा और 30 साल से जीतते आ रहे भाजपा नेताओं को लगा कि यह सीट उनके हाथ से कभी नहीं जा सकती, और इसी ओवर कॉन्फिडेंस ने उन्हें नुकसान पहुँचाया। इसके अलावा, नीट (NEET) छात्र आंदोलन का असर भी चुनाव परिणामों पर साफ दिखा। नीट पेपर लीक और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने छात्रों और उनके परिवारों में भारी नाराजगी पैदा की थी। केवल नीट ही नहीं, बल्कि यूजीसी को लेकर भी सवर्ण छात्रों में गहरा गुस्सा था, जिसका सीधा असर वोटिंग पर पड़ा और भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक खिसक गया।

कानून व्यवस्था और सम्राट चौधरी का फैक्टर

राज्य की कानून व्यवस्था और हालिया घटनाओं ने भी भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। विशेष रूप से भरत तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर जनता में काफी नाराजगी थी और जिस तरह से भरत तिवारी का एनकाउंटर किया गया, उसने सम्राट चौधरी की सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। प्रशांत किशोर ने लगातार इन मुद्दों पर सम्राट चौधरी और सरकार को घेरा। पिछले कुछ समय से सम्राट चौधरी के खिलाफ एक नकारात्मक माहौल बन रहा था, जिसका फायदा प्रशांत किशोर को मिला। उन्होंने जनता के बीच जाकर इन विफलताओं को प्रभावी ढंग से रखा।

प्रशांत किशोर का व्यक्तित्व और विपक्ष का शून्य

प्रशांत किशोर का अपना व्यक्तित्व और उनके द्वारा उठाए गए शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों ने जनता को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने पारंपरिक जातिगत राजनीति के बजाय विकास और भविष्य की बात की। एक और महत्वपूर्ण पहलू विपक्ष का वैक्यूम रहा। इस चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह से गौण रही और राजद भी मैदान से नदारद दिखी। हालांकि तेजस्वी यादव आखिरी दो दिनों में प्रचार के लिए आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि विपक्ष का पूरा वोट, जिसमें मुस्लिम और यादव मतदाता शामिल हैं, प्रशांत किशोर की ओर ट्रांसफर हो गया। बिहार के चुनावी इतिहास में पहली बार जाति का जोर कम दिखा और लोगों ने जाति-पाति को दरकिनार कर जन सुराज को वोट दिया।

उम्मीदवार चयन में चूक और रणनीतिक विफलता

भाजपा की हार का एक बड़ा कारण उम्मीदवार चयन में उनकी दुविधा भी रही और पार्टी शुरू से ही अपने प्रत्याशी को लेकर भ्रमित दिखी। पहले अभिषेक बंटी का नाम सामने आया, लेकिन बाद में उन्हें बदलकर नीरज जैसे कमजोर उम्मीदवार को मैदान में उतारा गया। प्रशांत किशोर इस बात को जनता तक पहुँचाने में सफल रहे कि भाजपा को लगता है कि वह किसी को भी टिकट देकर चुनाव जीत सकती है। भाजपा की इस सोच को जनता ने अहंकार के रूप में लिया। अंततः, भाजपा का यही अतिआत्मविश्वास और रणनीतिक चूक उसके 30 साल पुराने किले के ढहने का कारण बनी, जिससे बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं।

विज्ञापन