सनातन धर्म की परंपराओं में प्रदोष पूजा को एक अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष व्रत प्रत्येक माह की दोनों त्रयोदशी तिथियों को किया जाता है, जिसमें एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी और दूसरी कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी शामिल होती है। इस बार जुलाई महीने का दूसरा प्रदोष व्रत रविवार के दिन पड़ने जा रहा है, जिसके कारण इसे रवि प्रदोष व्रत के नाम से संबोधित किया जाएगा। इस पावन दिन पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसी अटूट श्रद्धा है कि महादेव और माता पार्वती के आशीर्वाद से भक्तों के जीवन में सुख और समृद्धि का आगमन होता है और उनका वैवाहिक जीवन सदैव सुखमय बना रहता है।
रवि प्रदोष व्रत की तिथि और शुभ समय
द्रिक पंचांग के गणनाओं के अनुसार, इस बार का रवि प्रदोष व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ रहा है। यह महत्वपूर्ण तिथि रविवार 26 जुलाई 2026 को है। समय की बात करें तो त्रयोदशी तिथि 26 जुलाई को दोपहर 01 बजकर 57 मिनट से प्रारंभ हो रही है और इसका समापन अगले दिन यानी 27 जुलाई को दोपहर 04 बजकर 14 मिनट पर होगा। चूंकि प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के समय संपन्न की जाती है, इसलिए शास्त्र सम्मत रूप से यह व्रत 26 जुलाई को ही रखा जाएगा। प्रदोष काल में की गई पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है। पंचांग के अनुसार, प्रदोष पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 07 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर रात 09 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार पूजा की कुल अवधि 02 घंटे 05 मिनट की रहने वाली है। सामान्यतः सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद के कालखंड को प्रदोष काल माना जाता है, जिसमें शिव आराधना सर्वोत्तम मानी गई है।
व्रत का महत्व और लाभ
पंचांग और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत को पितृ दोष के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। भगवान शिव के अनन्य भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ व्रत का पालन करते हैं। चूंकि रविवार का दिन प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव के आधिपत्य में होता है, इसलिए कुंडली में सूर्य ग्रह से संबंधित समस्याओं या दोषों से मुक्ति पाने के लिए ज्योतिष शास्त्र में रवि प्रदोष व्रत रखने का सुझाव दिया जाता है। जो भी जातक रवि प्रदोष व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं, उन्हें पारिवारिक सुख, आंतरिक आत्मबल और समाज में उच्च मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि भोलेनाथ अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं इस दिन अवश्य पूर्ण करते हैं।
संपूर्ण पूजा विधि और नियम
रवि प्रदोष व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल और फलदायी है। व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए, इस दिन सफेद रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके पश्चात अपने घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। एक चौकी पर लाल या पीले रंग का साफ कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करें और गंगाजल का छिड़काव कर पूरे क्षेत्र को पवित्र करें। इसके बाद रवि प्रदोष व्रत का संकल्प लें और धूप, दीप, अगरबत्ती जलाकर विधिवत पूजा आरंभ करें। महादेव को पुष्पों की माला, ताजे फूल और विशेष रूप से बेल के पत्ते अर्पित करें और पूजा के दौरान शिव चालीसा या शिव स्तुति का पाठ करें और प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण या पठन अवश्य करें। भगवान को सात्विक भोग लगाएं और अंत में कपूर या दीपक से आरती करें और आरती के पश्चात उपस्थित सभी लोगों में प्रसाद का वितरण करें।