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RBI Monetary Policy: भारत में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए आरबीआई के 7 बड़े मास्टर स्ट्रोक

RBI Monetary Policy: भारत में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए आरबीआई के 7 बड़े मास्टर स्ट्रोक
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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5 दशमलव 25 प्रतिशत पर स्थिर रखने का निर्णय लिया है। हालांकि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है और नीतिगत रुख को न्यूट्रल रखा गया है, लेकिन आरबीआई का पूरा ध्यान इस बार भारत में विदेशी निवेश के प्रवाह को बढ़ाने पर केंद्रित है और केंद्रीय बैंक ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने और भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 7 बड़े और दूरगामी फैसलों की घोषणा की है। ये कदम न केवल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए मददगार होंगे, बल्कि प्रवासी भारतीयों (NRI) के लिए भी निवेश के नए रास्ते खोलेंगे।

1. एफआईआई के लिए कैपिटल गेन टैक्स की समाप्ति

विदेशी पूंजी को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने और भारतीय रुपये को वैश्विक स्तर पर मजबूती देने के लिए, सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से सरकारी सिक्योरिटीज में एफआईआई (FII) निवेश पर लगने वाले लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स को पूरी तरह खत्म करने का ऐलान किया है। वर्तमान में, विदेशी निवेशकों को 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए लिस्टेड शेयरों और बॉन्ड्स पर 12 दशमलव 5 प्रतिशत की दर से टैक्स देना होता है। इस टैक्स को हटाने से भारतीय बॉन्ड मार्केट विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हो जाएगा और देश में लंबी अवधि की पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा।

2. लंबी अवधि की सरकारी सिक्योरिटीज के लिए एफएआर (FAR) का विस्तार

आरबीआई ने सरकारी बॉन्ड बाजार में विदेशी भागीदारी बढ़ाने के लिए फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के दायरे को बढ़ा दिया है। अब इसमें सभी नई 15 साल, 30 साल और 40 साल की सरकारी सिक्योरिटीज को शामिल किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि विदेशी निवेशकों को अब भारत के लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड्स तक अधिक और आसान पहुंच प्राप्त होगी। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भारत के सॉवरेन डेट मार्केट में निवेशकों के आधार को व्यापक बनाना और वैश्विक पेंशन फंड जैसे बड़े निवेशकों को आकर्षित करना है।

3. जनरल रूट के तहत एफपीआई कंसंट्रेशन लिमिट को हटाना

केंद्रीय बैंक ने जनरल रूट के माध्यम से निवेश करने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए पहले से निर्धारित कंसंट्रेशन लिमिट को समाप्त कर दिया है। इस सीमा के हटने से विदेशी निवेशकों को भारतीय डेट मार्केट में बिना किसी अतिरिक्त रुकावट के निवेश करने की अधिक स्वतंत्रता मिलेगी। इससे विदेशी निवेशकों के लिए परिचालन संबंधी जटिलताएं कम होंगी और भारतीय फिक्स्ड-इनकम एसेट्स में निवेश करना पहले की तुलना में काफी आसान हो जाएगा।

4. एनआरआई और ओसीआई के लिए इक्विटी निवेश की सीमा में वृद्धि

प्रवासी भारतीयों (NRI) और ओवरसीज सिटिजन्स ऑफ इंडिया (OCI) को भारतीय शेयर बाजार से जोड़ने के लिए आरबीआई ने एक बड़ा कदम उठाया है। अब ये निवेशक सेबी (SEBI) पंजीकरण के बिना भी लिस्टेड इक्विटीज में अधिक निवेश कर सकेंगे। यह फैसला पारंपरिक एफपीआई चैनल के अलावा निवेश के दायरे को बढ़ाता है और विदेश में रहने वाले भारतीयों को भारतीय कंपनियों के शेयरों में सीधे निवेश करने के अधिक अवसर प्रदान करता है। इससे शेयर बाजार में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने की प्रबल संभावना है।

5. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए फॉरेक्स स्वैप विंडो का विस्तार

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) द्वारा लिए गए बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) के लिए रियायती फॉरेक्स स्वैप विंडो की सुविधा को 30 सितंबर 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया है। यह सुविधा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को विदेशी मुद्रा में लिए गए कर्ज के जोखिम को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने में मदद करती है। इस विंडो की अवधि बढ़ने से इन कंपनियों को विदेशी ऋण के विकल्पों का लाभ उठाने के लिए अधिक समय और स्थिरता मिलेगी।

6. एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट के लिए हेजिंग कॉस्ट सपोर्ट

बैंकिंग प्रणाली में विदेशी मुद्रा के प्रवाह को बढ़ाने के लिए आरबीआई ने बैंकों को 3 से 5 साल की अवधि वाले एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट जुटाने के लिए पूर्ण हेजिंग कॉस्ट सपोर्ट की सुविधा को 30 सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया है। एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट वे विदेशी मुद्रा जमा राशियां हैं जो बैंक अपने एनआरआई ग्राहकों से प्राप्त करते हैं। हेजिंग लागत में सहायता मिलने से बैंकों के लिए ऐसी जमा राशि जुटाना सस्ता और आसान होगा, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी।

7. एक्सपोर्ट कमाई वापस लाने की अवधि में बदलाव

विदेशी मुद्रा के प्रबंधन को और अधिक कुशल बनाने के लिए आरबीआई ने निर्यातकों के लिए अपनी कमाई भारत वापस लाने की समय-सीमा को 15 महीने से घटाकर 9 महीने कर दिया है। इसका मतलब है कि अब निर्यातकों को अपनी विदेशी कमाई को 9 महीने के भीतर देश में लाना अनिवार्य होगा। हालांकि इससे निर्यातकों को मिलने वाली लचीलापन कुछ कम हो सकती है, लेकिन इससे देश में विदेशी मुद्रा के प्रवाह का समय बेहतर होगा और तरलता प्रबंधन में सुधार आएगा।

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