US Strategy: रूस से दोस्ती पड़ी भारी: 23 साल में 7 देशों के नेताओं का US ने किया काम तमाम
US Strategy - रूस से दोस्ती पड़ी भारी: 23 साल में 7 देशों के नेताओं का US ने किया काम तमाम
पिछले दो दशकों से वैश्विक भू-राजनीति में एक असाधारण और चिंताजनक पैटर्न उभर कर सामने आया है। यह पैटर्न उन देशों से संबंधित है जिनके नेता रूस के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हुए थे और 2003 से 2026 के बीच, सात ऐसे देशों के प्रमुखों को सत्ता से बेदखल कर दिया गया या उनकी सत्ता का नाटकीय अंत हो गया। इन सभी मामलों में, संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका या तो सीधे तौर पर हस्तक्षेप के रूप में दिखाई दी या फिर पर्दे के पीछे से रणनीतिक समर्थन के रूप में। यह घटनाक्रम इराक से शुरू होकर जॉर्जिया, यूक्रेन, आर्मेनिया, सीरिया और वेनेजुएला तक फैला है, और अब ईरान तथा उत्तर कोरिया जैसे देशों को अगले संभावित लक्ष्यों के रूप में देखा जा रहा है। यह विश्लेषण इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे इन शक्तिशाली नेताओं को अमेरिकी रणनीति का शिकार होना पड़ा, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति संतुलन में महत्वपूर्ण बदलाव आए।
सद्दाम हुसैन (इराक, 2003)
इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन उन पहले नेताओं में से थे जिनकी सत्ता का अंत रूस के साथ उनके कथित संबंधों और अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण हुआ। 20 मार्च 2003 को, अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम ने 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम' नामक सैन्य अभियान शुरू किया। इस अभियान का मुख्य आधार इराक के पास 'वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन' (सामूहिक विनाश के हथियार) होने के आरोप थे, हालांकि बाद में ऐसे कोई हथियार नहीं मिले। इस सैन्य कार्रवाई के परिणामस्वरूप, 9 अप्रैल 2003 को सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल कर दिया गया और इसके बाद, 13 दिसंबर 2003 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और इराक की एक अदालत ने नवंबर 2006 में 1982 में दुजैल शहर में 148 विरोधियों की हत्या के जुर्म में उन्हें मौत की सजा सुनाई। 30 दिसंबर 2006 को सद्दाम को फांसी दे दी गई, जिससे इराक में उनके 24 साल के शासन का अंत हो गया। यह घटना मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभाव को बढ़ाने और रूस के एक महत्वपूर्ण सहयोगी को हटाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।एडुअर्ड शेवर्दनाद्जे (जॉर्जिया, 2003)
एडुअर्ड शेवर्दनाद्जे, जो 1985 से 1991 तक सोवियत विदेश मंत्री रहे और मिखाइल गोर्बाचोव के करीबी सहयोगी थे, 1995 में जॉर्जिया के राष्ट्रपति बने और हालांकि वह पूरी तरह से रूस समर्थक नहीं थे, जॉर्जिया पारंपरिक रूप से रूस के प्रभाव क्षेत्र में आता था। नवंबर 2003 में, संसदीय चुनावों में धांधली के आरोपों के बाद जॉर्जिया में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व विपक्षी नेता मिखाइल साकाशविली ने किया, और यह आंदोलन 'रोज क्रांति' के नाम से जाना गया। 23 नवंबर 2003 को, प्रदर्शनकारियों ने संसद पर धावा बोल दिया, जिसके। बाद शेवर्दनाद्जे को भागना पड़ा और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके तुरंत बाद, 4 जनवरी 2004 को साकाशविली 96% वोटों के साथ जॉर्जिया के राष्ट्रपति चुने गए। इस सत्ता परिवर्तन में अमेरिकी गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और जॉर्ज सोरोस की 'ओपन सिक्योरिटी फाउंडेशन' ने। महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिन्होंने जॉर्जिया में लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए। साकाशविली ने सत्ता में आते ही नाटो (NATO) में शामिल होने की कोशिशें शुरू कर दीं, रूसी सैन्य अड्डों को बंद। करने की मांग की और पश्चिम के साथ अपने गठबंधन को मजबूत किया, जिससे रूस का क्षेत्रीय प्रभाव कम हो गया।विक्टर यानुकोविच (यूक्रेन, 2014)
विक्टर यानुकोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति थे और रूस के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक माने जाते थे। नवंबर 2013 में, उन्होंने यूरोपीय संघ (EU) के साथ एक एसोसिएशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, और इसके बजाय रूस से 15 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता स्वीकार की। इस निर्णय के विरोध में, 21 नवंबर 2013 को कीव के माइदान स्क्वायर पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसे 'माइदान क्रांति' के नाम से जाना जाता है। फरवरी 2014 तक, ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें 130 से अधिक लोग मारे गए और 22 फरवरी 2014 को, यानुकोविच को देश छोड़कर रूस भागना पड़ा, और उनके स्थान पर एक पश्चिम समर्थक अंतरिम सरकार सत्ता में आई। इस घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई जब फरवरी 2014 में अमेरिकी उप विदेश मंत्री विक्टोरिया नुलैंड और अमेरिकी राजदूत के बीच एक फोन कॉल लीक हुई। इस कॉल में उन्हें यूक्रेन की नई सरकार में किसे नियुक्त किया जाना चाहिए, इस पर चर्चा करते हुए सुना गया, जिसमें नुलैंड ने आर्सेनी यात्सेन्युक को 'सबसे बेहतर शख्स' बताया, जो बाद में प्रधानमंत्री बने। अमेरिकी सरकार ने यूक्रेन में विपक्ष को करोड़ों डॉलर की सहायता भी प्रदान की थी, जिसने यानुकोविच सरकार के पतन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।सर्ज सार्गेसन (आर्मेनिया, 2018)
बशर अल-असद (सीरिया, 2024)
आर्मेनिया पारंपरिक रूप से रूस का एक मजबूत सहयोगी रहा है, और ग्यूमरी। में एक रूसी सैन्य बेस भी है जहां 3,000 से अधिक सैनिक तैनात हैं। सर्ज सार्गेसन 2008 से आर्मेनिया की सत्ता में थे और रूस के करीबी माने जाते थे और अप्रैल 2018 में, सार्गेसन ने राष्ट्रपति पद से प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की, जिसे लोगों ने सत्ता में बने रहने की चाल के रूप में देखा। इसके विरोध में, 23 अप्रैल 2018 को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसका नेतृत्व विपक्षी नेता निकोल पशिन्यान ने किया। उसी दिन, सार्गेसन को इस्तीफा देना पड़ा, और 8 मई 2018 को पशिन्यान प्रधानमंत्री बने। हालांकि पशिन्यान पूरी तरह से पश्चिम-समर्थक नहीं हैं, उन्होंने रूस पर आर्मेनिया की निर्भरता कम करने और यूरोपीय संघ के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश की। सितंबर में आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच नागोर्नो-काराबाख को लेकर संघर्ष हुआ, जिसमें पशिन्यान ने अजरबैजान को नागोर्नो-काराबाख दे दिया, जिससे रूस-आर्मेनिया संबंध और खराब हुए। इस मामले में, अमेरिका ने अजरबैजान को शांत कराने में भूमिका निभाई, और सितंबर 2023 में, अमेरिकी राष्ट्रीय। सुरक्षा सलाहकार ने अजरबैजानी राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव को फोन करके आर्मेनिया पर और हमला न करने के लिए कहा। अब अजरबैजान और आर्मेनिया दोनों ही अमेरिका के करीब आ गए हैं, जिससे काकेशस क्षेत्र में रूस का प्रभाव काफी कम हो गया है।
सीरिया रूस का सबसे पुराना और करीबी सहयोगी रहा है, जहां 1971 से टार्टस में रूस का एकमात्र भूमध्यसागरीय नौसैनिक बेस और 2015 से खमीमिम में एक हवाई बेस मौजूद है। 2020 में, जब ISIS और विद्रोहियों ने असद की सरकार को लगभग गिरा दिया था, तब रूसी हवाई हमलों, क्रूज मिसाइलों और हजारों सैनिकों ने युद्ध का रुख बदल दिया और असद को सत्ता में बनाए रखा। हालांकि, 27 नवंबर 2024 को विद्रोहियों ने अचानक हलेप पर हमला किया और केवल 11 दिनों में दमिश्क पर कब्जा कर लिया। इस अप्रत्याशित हमले के बाद, असद को सीरिया छोड़कर रूस भागना पड़ा। अहमद अल-शरा सीरिया के नए राष्ट्रपति बने और उन्होंने तुरंत अमेरिका के साथ बातचीत शुरू की। अमेरिका ने सीरिया में 900 से अधिक सैनिकों को बनाए रखा और कुर्दिश बलों (SDF) को हथियार और प्रशिक्षण प्रदान किया। जनवरी 2025 में, ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिया कि वह नई सीरियाई सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार है, जो मध्य पूर्व में रूस के एक महत्वपूर्ण गढ़ के पतन और अमेरिकी प्रभाव के विस्तार को दर्शाता है।निकोलस मादुरो (वेनेजुएला, 2026)
वेनेजुएला लैटिन अमेरिका में रूस का सबसे करीबी सहयोगी रहा है। 2005 से 2019 के बीच, वेनेजुएला ने रूस से 17 बिलियन डॉलर के हथियार खरीदे और लगभग 4 बिलियन डॉलर का कर्ज भी लिया। रूसी तेल कंपनी रोसनेफ्ट (Rosneft) ने वेनेजुएला के तेल परियोजनाओं में भारी निवेश किया था, और 2019 में रूस ने वेनेजुएला को S-300 मिसाइल सिस्टम भी भेजे थे। वेनेजुएला ने यूक्रेन पर रूसी हमले का भी खुलकर समर्थन किया था, जो दोनों देशों के बीच गहरे संबंधों को दर्शाता है और निकोलस मादुरो 2013 से 2026 तक वेनेजुएला की सत्ता पर काबिज रहे। 3 जनवरी 2026 को, अमेरिकी की एक स्पेशल यूनिट ने कराकास में मादुरो के घर पर छापा मारा। मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर फ्लोरिडा ले जाया गया, जिससे लैटिन अमेरिका में रूस के एक और महत्वपूर्ण सहयोगी की सत्ता का अंत हो गया। यह घटना अमेरिका की 'बैकयार्ड' नीति को मजबूत करती है और क्षेत्र में रूस के प्रभाव को कम करती है।अगले संभावित लक्ष्य: ईरान और उत्तर कोरिया
इस पैटर्न को देखते हुए, अब अगला निशाना ईरान और उत्तर कोरिया हो सकते हैं, जिन्हें रूस के सबसे अहम सहयोगियों में गिना जाता है। ईरान ने यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को शाहेद ड्रोन बेचे हैं, जबकि उत्तर कोरिया रूस का अंतिम एशियाई सहयोगी है, जिसके 10,000 से अधिक सैनिक यूक्रेन में रूस की ओर से लड़ रहे हैं और अमेरिका ने ईरान पर हमले के संकेत दिए हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह भू-राजनीतिक रणनीति जारी रह सकती है। यह घटनाक्रम वैश्विक शक्ति संतुलन को लगातार बदल रहा है और भविष्य में और अधिक देशों में सत्ता परिवर्तन की। संभावनाओं को जन्म दे रहा है, खासकर उन देशों में जो रूस के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए हुए हैं।
यह पैटर्न स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कैसे अमेरिका ने पिछले दो दशकों में रूस के करीबियों को सत्ता से हटाने के लिए विभिन्न रणनीतियों का उपयोग किया है, चाहे वह सैन्य हस्तक्षेप हो, आर्थिक सहायता हो, या पर्दे के पीछे से राजनीतिक समर्थन हो। इन घटनाओं ने वैश्विक शक्ति समीकरणों को नया आकार दिया है और भविष्य की भू-राजनीतिक चुनौतियों के लिए मंच तैयार किया है।