सऊदी अरब हुआ अकेला: अमेरिका पाकिस्तान और तुर्की ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ मदद से किया इनकार

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सऊदी अरब हुआ अकेला: अमेरिका पाकिस्तान और तुर्की ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ मदद से किया इनकार
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मिडिल ईस्ट की बदलती भू-राजनीति में सऊदी अरब खुद को एक बेहद चुनौतीपूर्ण और अकेलेपन की स्थिति में पा रहा है। लाल सागर के महत्वपूर्ण क्षेत्र में हूती विद्रोहियों का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है और वे सऊदी अरब पर काफी आक्रामक हो गए हैं। इस गंभीर संकट के समय में सऊदी अरब को अपने पुराने सहयोगियों जैसे अमेरिका, पाकिस्तान और तुर्की से बड़ी मदद की उम्मीद थी, लेकिन इन सभी देशों ने फिलहाल इस लड़ाई से खुद को दूर कर लिया है। यह स्थिति सऊदी अरब की सुरक्षा और उसके क्षेत्रीय प्रभाव के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है।

अमेरिका का इनकार और ईरान युद्ध की कड़वाहट

सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा झटका वाशिंगटन से लगा है। अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य मदद मांगी थी। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस अनुरोध को सीधे तौर पर ठुकरा दिया है। इस इनकार के पीछे फरवरी 2026 में शुरू हुए ईरान युद्ध के दौरान सऊदी अरब का रुख बताया जा रहा है। उस समय अमेरिका को उम्मीद थी कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ उसका पूरा साथ देगा, लेकिन रियाद ने इस युद्ध में न्यूट्रल यानी तटस्थ रहने का फैसला किया था। सऊदी ने स्पष्ट कर दिया था कि वह इस युद्ध का समर्थन नहीं करता है, जिससे अमेरिकी सैन्य अभियानों में काफी बाधाएं आई थीं।

ईरान युद्ध के दौरान सऊदी अरब के इस फैसले के कारण अमेरिकी फाइटर जेट्स को ईंधन भरने के लिए सऊदी की जमीन का उपयोग करने की अनुमति नहीं मिली थी। कई मौकों पर सऊदी के इस असहयोग के कारण अमेरिका को ईरान पर अपने हमले टालने पड़े थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने उस समय सऊदी के प्रति अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी। अब जब सऊदी अरब हूती विद्रोहियों से घिरा हुआ है, तो अमेरिका ने 2025 में हूती विद्रोहियों के साथ हुए एक समझौते का हवाला देते हुए इस मामले में दखल देने से मना कर दिया है।

मक्का रक्षा समझौते की विफलता और सहयोगियों की चुप्पी

सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान और तुर्की के साथ मिलकर मक्का रक्षा समझौता किया था। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य यह था कि यदि तीनों में से किसी भी एक देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और वे मिलकर उसका मुकाबला करेंगे। सऊदी को पूरा भरोसा था कि हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान और तुर्की उसकी मदद के लिए आगे आएंगे और लेकिन हूती के हमलों के बीच पाकिस्तान ने पूरी तरह से चुप्पी साध ली है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, पाकिस्तान फिलहाल हूती हमलों को लेकर किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई पर विचार नहीं कर रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि हूती को ईरान समर्थित मिलिशिया माना जाता है और पाकिस्तान इस समय ईरान को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।

क्षेत्रीय विवाद और तेल उत्पादन पर गहरा असर

सऊदी अरब की मुश्किलें केवल बाहरी सहयोगियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उसके क्षेत्रीय संबंध भी काफी खराब हो चुके हैं। ईरान के साथ सऊदी के रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण हैं, वहीं संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ भी उसका विवाद गहरा गया है। यमन में नियंत्रण को लेकर सऊदी ने पूर्व में यूएई के टैंकरों पर हमला किया था और ईरान युद्ध के दौरान भी यूएई की कोई मदद नहीं की थी और अब यूएई भी सऊदी की मदद के लिए तैयार नहीं है। इस आपसी खींचतान ने सऊदी अरब को रणनीतिक रूप से कमजोर कर दिया है।

इस युद्ध का सबसे बड़ा आर्थिक असर सऊदी अरब के तेल उत्पादन पर पड़ा है। हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर अपना नियंत्रण बना लिया है, जिससे तेल की सप्लाई बाधित हुई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब का तेल उत्पादन जो जुलाई में लगभग 8 दशमलव 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, वह अगस्त में घटकर मात्र 6 दशमलव 2624 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है। यह उत्पादन में 23 प्रतिशत की एक बड़ी गिरावट है, जो सऊदी की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

हूती विद्रोहियों की ताकत और वैश्विक हिचकिचाहट

हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी भी देश के न उतरने का एक बड़ा कारण उनकी युद्ध शैली भी है और हूती लड़ाके गुरिल्ला युद्ध में माहिर माने जाते हैं। वर्ष 2025 में अमेरिका ने उनके खिलाफ युद्ध छेड़ा था और इजराइल ने भी कोशिश की थी, लेकिन दोनों को ही कोई खास सफलता नहीं मिली। हूती लड़ाकों का लाल सागर के उस हिस्से पर कब्जा है जहां से दुनिया की करीब 12 प्रतिशत तेल और गैस की सप्लाई होती है। उनकी इस रणनीतिक स्थिति और लड़ाकू क्षमता के कारण कोई भी देश इस समय उनसे सीधे टकराने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है, जिससे सऊदी अरब इस पूरी लड़ाई में अकेला खड़ा नजर आ रहा है।

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