सुन्नी नाटो बनाम ईरान: क्या मक्का समझौता अरब की बर्बादी का ब्लूप्रिंट है?

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सुन्नी नाटो बनाम ईरान: क्या मक्का समझौता अरब की बर्बादी का ब्लूप्रिंट है?
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सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते से पश्चिम एशिया में एक नई रणनीतिक हलचल शुरू हो गई है। इस समझौते से ईरान पर दबाव बढ़ने की संभावना है और इसने क्षेत्र के समीकरणों को बदलना शुरू कर दिया है और इस नए समझौते की नींव इस्लाम की पाक जमीं मक्का में रखी गई है। मक्का में जो हस्ताक्षर हुए हैं, वे केवल तीन देशों की साझेदारी नहीं बल्कि पश्चिमी एशिया की एक नई सत्ता रेखा का ऐलान हैं। यह विकास ऐसे समय में हुआ है जब अरब देशों का भरोसा अमेरिका से टूटता दिख रहा है। इसी वजह से अरब देश एक ऐसा अभेद्य घेरा बनाना चाहते हैं जिस पर ईरान के हमलों का असर न हो। अब सवाल यह उठ रहा है कि तीन देशों के इस नए समझौते से तैयार इस्लामिक नाटो से शांति लौटेगी या फिर यह विध्वंस का एक नया द्वार खोलेगा।

इस्लामिक नाटो का गठन और शक्ति संतुलन

पश्चिमी एशिया में अमेरिका की कूटनीति का अध्याय अब समाप्ति की ओर है, लेकिन इसी समय इस्लामिक देशों के एक फैसले से नई कूटनीति का उदय हो रहा है और इतिहास गवाह है कि कई समझौते युद्ध रोकने के लिए किए जाते हैं, लेकिन कुछ समझौते ऐसे होते हैं जो युद्ध को टालते नहीं बल्कि उसे एक नई दिशा दे देते हैं। अभी तक दुनिया केवल नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन से परिचित थी, लेकिन अब पश्चिमी एशिया से एक नए संगठन का नाम निकला है जिसे इस्लामिक नाटो कहा जा रहा है। इसमें फिलहाल तीन देश शामिल हैं: तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान। सऊदी अरब के अल सफा पैलेस में इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए जिसे मक्का समझौता भी कहा जा रहा है। इस गठबंधन ने नाटो के आर्टिकल 5 के सिद्धांत को अपनाया है, जिसका अर्थ है कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा।

ईरान के खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी

इस त्रिपक्षीय समझौते को अरब जगत में खुले तौर पर सुन्नी नाटो के रूप में देखा जा रहा है, जो सीधे तौर पर शिया मुल्क ईरान के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह अमेरिका पर अरब देशों के कम होते भरोसे का भी एक जवाब है। इसके अलावा, इसे ईरान के प्रॉक्सी गुटों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बेरोटोक शिपिंग सुनिश्चित करना इस गठबंधन का पहला बड़ा कार्य हो सकता है। मक्का समझौता केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह ईरान के खिलाफ एक अजेय घेराबंदी का प्रमाण है जिसे तैयार करने के लिए सऊदी अरब ने एक बड़ा दांव खेला है। वर्तमान में इसमें तीन देश शामिल हैं, लेकिन भविष्य में अन्य अरब देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं। यह सामरिक खेल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान के इशारे पर प्रॉक्सी गुट सऊदी अरब को अस्थिर करने के लिए आक्रामक हो रहे हैं। इन गुटों ने सऊदी अरब में लगातार हमले किए हैं, जिसके जवाब में सऊदी अरब ने जमीनी ऑपरेशन शुरू कर दिया है। पहले सैन्य मदद अमेरिका से मिल रही थी, लेकिन अब इस्लामिक नाटो सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार है।

शिया बनाम सुन्नी संघर्ष और ऑक्टोपस मॉड्यूल

इस समझौते के बाद पश्चिम एशिया में शिया बनाम सुन्नी की पुरानी लकीरें अब बारूदी खाइयों में तब्दील होने लगी हैं। तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसी सुन्नी बहुल ताकतें एक तरफ हैं, तो दूसरी तरफ ईरान और उसका शिया मिलिशिया नेटवर्क इसे अपने खिलाफ एक खुला सामरिक षड्यंत्र मान रहा है। इसके जवाब में ईरान ने अपना ऑक्टोपस मॉड्यूल सक्रिय कर दिया है, जिससे अरब देशों की चिंता बढ़ गई है। डर यह है कि ईरान के इशारे पर तमाम प्रॉक्सी संगठन पूरी ताकत से अरब देशों को निशाना बना सकते हैं। इस नेटवर्क में गाजा (हमास), लेबनान (हिज्बुल्लाह), यमन (हूती), इराक (कताइब हिज्बुल्लाह), सीरिया (फातेमियून ब्रिगेड), कुवैत (अल अब्दाली), सऊदी अरब (हिज्बुल्लाह अल हिजाज) और बहरीन (अल अश्तर ब्रिगेड) जैसे समूह शामिल हैं। ईरान ने जिस तेजी से पहले अरब देशों के तेल ठिकानों को निशाना बनाया था, उससे अरब की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होने का खतरा पैदा हो गया था।

आर्थिक लक्ष्य और युद्ध की आशंका

ईरान के हमलों का खतरा अभी भी बना हुआ है, जिसमें सऊदी अरब की अबकैक प्रोसेसिंग फैसिलिटी ईरान का पहला लक्ष्य है। यह सुविधा दुनिया के कुल तेल का 7 प्रतिशत उत्पादन करती है और इसकी रिफाइनिंग क्षमता 70 लाख बैरल प्रतिदिन है। अगला लक्ष्य सऊदी अरब की रास तनुरा रिफाइनरी और टर्मिनल है, जिसकी रिफाइनिंग क्षमता 5 लाख 50 हजार बैरल प्रतिदिन है और यहाँ से रोजाना 60 लाख बैरल तेल की लोडिंग की जाती है। तीसरा लक्ष्य सऊदी अरब की यानबू रिफाइनरी और टर्मिनल है, जो होर्मुज बंद होने की स्थिति में एक वैकल्पिक मार्ग हो सकता है और इसकी क्षमता 4 लाख बैरल प्रतिदिन है। चौथे लक्ष्य पर यूएई का रुवैस रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स है, जो दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सिंगल साइट रिफाइनरी है और इसकी क्षमता 9 लाख 20 हजार बैरल प्रतिदिन है। पांचवें लक्ष्य पर कतर का रास लफान एलएनजी कॉम्प्लेक्स है, जो दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी उत्पादन केंद्र है और इसकी क्षमता सालाना 7 करोड़ 70 लाख टन है। सऊदी अरब पर हमलों की तीव्रता इसलिए भी बढ़ी थी क्योंकि सऊदी के दबाव में अमेरिका ने हमले शुरू किए थे। इजराइल ने भी सऊदी में रक्षा प्रणालियाँ भेजी थीं, लेकिन ईरान के हमलों ने सऊदी और अन्य देशों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। तेल की आपूर्ति कम होने और अमेरिका द्वारा हमले न रुकवा पाने के कारण सऊदी ने मक्का समझौते के जरिए सुरक्षा कवच तैयार किया है। अब देखना यह है कि तुर्किये और पाकिस्तान सऊदी को इस संकट से कैसे बचाते हैं और यदि उन्होंने हूती और ईरान पर हमले शुरू किए, तो पश्चिम एशिया में एक बड़ा शिया सुन्नी युद्ध छिड़ सकता है, जिससे पूरा अरब क्षेत्र सुलग सकता है।

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