भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को भारी बिकवाली का माहौल रहा, जिसके परिणामस्वरूप प्रमुख सूचकांकों में 1% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। 92 के स्तर पर बंद हुआ। 65 के स्तर पर आ गया। इस गिरावट के कारण बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण पिछले सत्र के ₹469 लाख करोड़ से घटकर ₹466 लाख करोड़ रह गया, जिससे निवेशकों की संपत्ति में ₹3 लाख करोड़ की कमी आई।
बाजार के आंकड़ों के अनुसार, मिड-कैप और स्मॉल-कैप सूचकांकों में भी गिरावट देखी गई, हालांकि उन्होंने बेंचमार्क सूचकांकों की तुलना में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया और 76% की गिरावट के साथ बंद हुए। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू बिकवाली के दबाव ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है।
अमेरिकी टैरिफ नीतियों और व्यापारिक अनिश्चितता का प्रभाव
बाजार में गिरावट का एक मुख्य कारण अमेरिका की आगामी टैरिफ नीतियां मानी जा रही हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन 1962 के ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट के सेक्शन 232 का उपयोग करके नए वैश्विक टैरिफ लागू करने की योजना बना रहा है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले टैरिफ फैसलों को पलटने के बाद, प्रशासन की ओर से अधिक आक्रामक रुख अपनाने की संभावना जताई गई है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों को चेतावनी दी है जो अमेरिकी अदालती फैसलों का समर्थन करते हैं, कि उन्हें उच्च आयात शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। 24 फरवरी को होने वाले स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन से पहले वैश्विक बाजारों में सतर्कता का माहौल है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भी निवेशकों को सुरक्षित निवेश की ओर रुख करने पर मजबूर किया है। ईरान में आंतरिक विरोध प्रदर्शनों और सरकार की कार्रवाई के बीच अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच परमाणु वार्ता का अगला दौर 26 फरवरी को निर्धारित है। इस अनिश्चितता के कारण वैश्विक स्तर पर जोखिम वाली संपत्तियों से निवेश निकाला जा रहा है, जिसका सीधा असर भारतीय इक्विटी बाजार पर पड़ा है।
आईटी सेक्टर में भारी बिकवाली और तकनीकी चुनौतियां
आईटी शेयरों में आई भारी गिरावट ने बाजार के सेंटिमेंट को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। निफ्टी आईटी इंडेक्स मंगलवार को लगभग 5% तक गिर गया। फरवरी महीने में अब तक इस इंडेक्स में 21% की गिरावट आ चुकी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के कारण पारंपरिक आईटी सेवाओं में आने वाली बाधाओं और अमेरिका में उच्च ब्याज दरों की चिंताओं ने निवेशकों को डरा दिया है। विशेष रूप से, एंथ्रोपिक द्वारा क्लाउड कोड टूल के माध्यम से कोबोल (COBOL) जैसी पुरानी प्रोग्रामिंग भाषाओं के आधुनिकीकरण के दावे के बाद आईबीएम (IBM) जैसे वैश्विक दिग्गजों के शेयरों में गिरावट आई, जिसका असर भारतीय आईटी कंपनियों पर भी देखा गया।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और मुद्रास्फीति का डर
वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 1% बढ़कर 72 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो पिछले छह महीनों के उच्चतम स्तर के करीब है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में वृद्धि से देश के व्यापार घाटे और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने व्यापक आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंताएं पैदा की हैं, जिससे बाजार में बिकवाली का दबाव और बढ़ गया।
डॉलर इंडेक्स की मजबूती और विदेशी निवेश का प्रवाह
20% की वृद्धि दर्ज की गई है और यह 98 के स्तर की ओर बढ़ रहा है। डॉलर की मजबूती आमतौर पर उभरते बाजारों जैसे भारत के लिए नकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा पूंजी निकासी का जोखिम बढ़ जाता है। हालांकि हाल के दिनों में भारत-यूएस ट्रेड डील के बाद कुछ निवेश देखा गया था, लेकिन डॉलर की निरंतर मजबूती और भारतीय शेयरों के उच्च मूल्यांकन ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है और विदेशी पूंजी के बाहर जाने की आशंका ने बाजार की गिरावट को और तेज कर दिया है।