सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के माध्यम से ₹1 करोड़ का रिटायरमेंट फंड बनाने का लक्ष्य कई निवेशकों के लिए एक प्रमुख वित्तीय उद्देश्य होता है। वित्तीय विशेषज्ञों और गणितीय गणनाओं के अनुसार, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक मासिक निवेश की राशि पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि निवेश किस उम्र में शुरू किया गया है। 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु को मानक मानते हुए, अलग-अलग आयु वर्गों के लिए निवेश की रूपरेखा अलग-अलग होती है। इसमें समय की अवधि जितनी लंबी होती है, कंपाउंडिंग का लाभ उतना ही अधिक मिलता है।
25 वर्ष की आयु में निवेश का गणित
यदि कोई व्यक्ति 25 वर्ष की आयु में निवेश की शुरुआत करता है, तो उसके पास 60 वर्ष की आयु तक पहुंचने के लिए कुल 35 वर्षों का समय होता है। 13 करोड़ से अधिक का फंड तैयार किया जा सकता है। 20 लाख होती है, जबकि शेष राशि कंपाउंडिंग के माध्यम से अर्जित रिटर्न होती है। यह दर्शाता है कि लंबी अवधि में छोटी राशि भी एक बड़ा कोष बनाने में सक्षम है।
30 वर्ष की आयु में देरी का प्रभाव
30 वर्ष की आयु में निवेश शुरू करने पर निवेशक के पास 60 वर्ष की आयु तक केवल 30 वर्षों का समय बचता है। मात्र 5 वर्ष की देरी मासिक निवेश की आवश्यकता को दोगुना कर देती है। 15% के अनुमानित वार्षिक रिटर्न के आधार पर, ₹1 करोड़ का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मासिक SIP राशि को बढ़ाकर लगभग ₹2,000 करना पड़ता है। 20 लाख हो जाता है। समय कम होने के कारण कंपाउंडिंग का प्रभाव 25 वर्ष की तुलना में कम हो जाता है, जिससे लक्ष्य प्राप्ति के लिए जेब से अधिक पैसा लगाना पड़ता है।
40 वर्ष की आयु में निवेश की चुनौतियां
जब निवेश की शुरुआत 40 वर्ष की आयु में की जाती है, तो रिटायरमेंट के लिए केवल 20 वर्षों का समय शेष रहता है। समय की कमी के कारण मासिक निवेश का बोझ काफी बढ़ जाता है। आंकड़ों के अनुसार, 15% वार्षिक रिटर्न की स्थिति में ₹1 करोड़ का फंड बनाने के लिए हर महीने लगभग ₹7,500 का निवेश करना आवश्यक होता है। इस 20 वर्ष की अवधि में निवेशक द्वारा कुल ₹18 लाख का योगदान दिया जाता है। यह स्पष्ट करता है कि जैसे-जैसे निवेश की अवधि कम होती है, लक्ष्य तक पहुंचने के लिए आवश्यक पूंजी की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है।
स्टेप-अप SIP और वार्षिक वृद्धि की भूमिका
देर से निवेश शुरू करने वाले व्यक्तियों के लिए 'स्टेप-अप SIP' एक प्रभावी विकल्प के रूप में कार्य करता है। इसमें निवेशक हर साल अपनी SIP राशि में एक निश्चित प्रतिशत की वृद्धि करता है और 10 करोड़ का फंड बनाया जा सकता है। यह तकनीक उन लोगों के लिए उपयोगी है जिनकी आय समय के साथ बढ़ती है और जो कम समय में बड़ा फंड बनाना चाहते हैं।
SIP की कार्यप्रणाली और बाजार जोखिम
SIP मुख्य रूप से अनुशासन और 'रुपया कॉस्ट एवरेजिंग' के सिद्धांत पर कार्य करता है। इसके तहत बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान भी निवेश जारी रहता है, जिससे यूनिट्स की औसत लागत संतुलित रहती है और हालांकि, यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि म्यूचुअल फंड निवेश बाजार जोखिमों के अधीन हैं और 15% का रिटर्न केवल एक अनुमानित आंकड़ा है, जिसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। बाजार की स्थितियों के अनुसार वास्तविक रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। लंबी अवधि के निवेश में धैर्य और निरंतरता ही फंड के आकार को निर्धारित करने वाले मुख्य कारक होते हैं।