सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक 19 वर्षीय छात्र अथर्व चतुर्वेदी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिससे उनके डॉक्टर बनने का रास्ता साफ हो गया है। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि छात्र को शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए प्रोविजनल MBBS एडमिशन दिया जाए। अथर्व ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी के तहत निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी।
अथर्व चतुर्वेदी का शैक्षणिक संघर्ष और कानूनी पृष्ठभूमि
मध्य प्रदेश के रहने वाले अथर्व चतुर्वेदी ने दो बार राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) उत्तीर्ण की थी। अपनी दूसरी कोशिश में उन्होंने 530 अंक प्राप्त किए थे, जो EWS श्रेणी के तहत दाखिले के लिए पर्याप्त माने जाते हैं। हालांकि, उन्हें निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया था। अधिकारियों और कॉलेज प्रबंधन का तर्क था कि निजी चिकित्सा संस्थानों में EWS कोटे के तहत आरक्षण का कोई स्पष्ट प्रावधान लागू नहीं है। इस प्रशासनिक बाधा के कारण छात्र को योग्य होने के बावजूद सीट आवंटित नहीं की गई थी।
स्वयं पैरवी और न्यायालय में '10 मिनट' की दलील
अथर्व ने इस मामले को पहले उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, लेकिन वहां से राहत न मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। विशेष बात यह रही कि 19 वर्षीय अथर्व ने किसी वरिष्ठ वकील की सहायता लेने के बजाय स्वयं अपनी पैरवी करने का निर्णय लिया। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान जब उनकी याचिका पर विचार करने में देरी हो रही थी, तब अथर्व ने जस्टिस सूर्यकांत की पीठ से केवल 10 मिनट का समय मांगा। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें अपनी बात रखने का एक मौका दिया जाए। एक 12वीं पास छात्र द्वारा स्वयं दलीलें पेश करने के आत्मविश्वास को देखते हुए अदालत ने उन्हें सुनने का निर्णय लिया।
निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटे पर विवाद
अदालत के समक्ष मुख्य विवाद यह था कि क्या राज्य सरकार की अधिसूचना के अभाव में निजी मेडिकल कॉलेजों को EWS आरक्षण से छूट दी जा सकती है और अथर्व ने दलील दी कि राज्य सरकार ने निजी कॉलेजों में EWS कोटे को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया है, जबकि वह एक पात्र उम्मीदवार हैं। उन्होंने तर्क दिया कि नीतिगत स्पष्टता की कमी या सरकारी अधिसूचना में देरी का खामियाजा छात्रों को नहीं भुगतना चाहिए। इससे पहले की सुनवाई में अदालत ने उनकी दलीलों को सराहनीय माना था, लेकिन तकनीकी आधार पर तत्काल प्रवेश की मांग को स्वीकार नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और संवैधानिक हस्तक्षेप
जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए माना कि केवल इसलिए किसी छात्र को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि राज्य ने आरक्षण की औपचारिक अधिसूचना जारी करने में देरी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई छात्र योग्यता रखता है और श्रेणी के मानदंडों को पूरा करता है, तो उसे प्रक्रियात्मक खामियों के कारण बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। पीठ ने माना कि यह मामला असाधारण है और इसमें न्याय सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का उपयोग आवश्यक है।
NMC और राज्य सरकार को जारी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में नेशनल मेडिकल कमीशन और मध्य प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने आदेश दिया है कि अथर्व चतुर्वेदी को आगामी शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए प्रोविजनल आधार पर MBBS पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया जाए। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि सात दिनों के भीतर छात्र को उपयुक्त कॉलेज आवंटित किया जाए। इस फैसले ने न केवल अथर्व को राहत दी है, बल्कि निजी संस्थानों में EWS आरक्षण के कार्यान्वयन पर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम की है।