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चुनाव खर्च की सीमा: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को भेजा नोटिस

चुनाव खर्च की सीमा: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को भेजा नोटिस
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सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के दौरान किए जाने वाले खर्च की सीमा तय करने की मांग वाली एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची की पीठ ने गैर-सरकारी संगठन 'कॉमन कॉज' द्वारा दायर इस याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों से छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान में व्यक्तिगत उम्मीदवारों के लिए तो खर्च की सीमा निर्धारित है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ऐसी कोई ऊपरी सीमा नहीं है, जो चुनावी निष्पक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है।

याचिका के मुख्य आधार और धनबल का मुद्दा

याचिकाकर्ता एनजीओ 'कॉमन कॉज' की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष दलील दी कि चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा धनबल का अनियंत्रित और बेलगाम इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद को कमजोर कर रहा है। याचिका में कहा गया है कि जब राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई कानूनी सीमा नहीं होती, तो वे बड़े पैमाने पर विज्ञापन, रैलियों और अन्य माध्यमों से मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। यह स्थिति उन दलों और उम्मीदवारों के लिए एक असमान धरातल (Level Playing Field) पैदा करती है जिनके पास वित्तीय संसाधनों की कमी है। अधिवक्ता भूषण ने जोर देकर कहा कि धनबल का यह प्रभाव न केवल चुनावी परिणामों को प्रभावित करता है, बल्कि यह मतदाताओं के सूचना के अधिकार और स्वतंत्र चुनाव के अधिकार का भी उल्लंघन है।

उम्मीदवारों और दलों के बीच खर्च का वैधानिक असंतुलन

वर्तमान कानूनी ढांचे के अनुसार, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 के तहत लोकसभा और विधानसभा चुनावों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों के लिए खर्च की एक निश्चित सीमा तय की गई है। उदाहरण के तौर पर, बड़े राज्यों में लोकसभा उम्मीदवार के लिए यह सीमा ₹95lakh और छोटे राज्यों के लिए ₹75lakh निर्धारित है। हालांकि, इसी अधिनियम में राजनीतिक दलों द्वारा अपने 'स्टार प्रचारकों' और सामान्य चुनावी प्रचार पर किए जाने वाले खर्च के लिए कोई अधिकतम सीमा तय नहीं की गई है। याचिका में इसी विसंगति को चुनौती दी गई है और मांग की गई है कि राजनीतिक दलों के लिए भी खर्च की एक पारदर्शी और निश्चित सीमा निर्धारित की जानी चाहिए ताकि चुनावों में धन की भूमिका को सीमित किया जा सके।

इलेक्टोरल बॉन्ड मामले के फैसले का कानूनी संदर्भ

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा फरवरी 2024 में इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देने वाले ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय अदालत ने स्पष्ट रूप से माना था कि अनियंत्रित धनबल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विकृत करता है और यह नीति निर्माण में अनुचित प्रभाव डाल सकता है। याचिका में तर्क दिया गया है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से आने वाले धन और उसके बाद राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले असीमित खर्च के बीच एक सीधा संबंध है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जब तक दलों के खर्च पर सीमा नहीं लगेगी, तब तक चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं होंगे।

अदालत की टिप्पणियां और व्यावहारिक कठिनाइयां

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची ने चुनावी खर्च पर सीमा लागू करने से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने टिप्पणी की कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी चुनावी खर्च की सीमाएं और नियम मौजूद हैं, लेकिन वहां भी खर्च को उम्मीदवारों के मित्रों, सहयोगियों या 'थर्ड पार्टी' संस्थाओं के माध्यम से डायवर्ट करने जैसी समस्याएं देखी गई हैं। अदालत ने इस बात पर विचार करने की आवश्यकता जताई कि यदि राजनीतिक दलों पर सीमा लगा भी दी जाती है, तो इसे प्रभावी ढंग से कैसे लागू किया जाएगा और 'प्रॉक्सी' खर्च को कैसे रोका जाएगा और पीठ ने संकेत दिया कि यह मामला केवल कानून बनाने का नहीं बल्कि उसके कार्यान्वयन की जटिलताओं से भी जुड़ा है।

चुनाव आयोग की वर्तमान भूमिका और आगामी प्रक्रिया

भारतीय चुनाव आयोग ने पूर्व में कई बार चुनावी सुधारों की वकालत की है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर सीमा लगाने का विषय हमेशा से विवादास्पद रहा है। विधि आयोग ने अपनी 255वीं रिपोर्ट में भी चुनावी खर्च के नियमों में बदलाव के सुझाव दिए थे। अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि वे इस दिशा में क्या कदम उठा रहे हैं। अदालत ने मामले को छह सप्ताह बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इस अवधि में केंद्र और आयोग को अपने हलफनामे दाखिल करने होंगे, जिसमें उन्हें यह बताना होगा कि क्या राजनीतिक दलों के खर्च पर सीमा लगाना संभव है और इसके लिए वैधानिक ढांचे में क्या बदलाव किए जा सकते हैं।

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