अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच खुद को एक जटिल कूटनीतिक स्थिति में पा रहे हैं, जिसके कारण उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की रणनीति को अपनाने का फैसला किया है। जिस तरह निक्सन ने वियतनाम युद्ध के दौरान चीन का रुख किया था, उसी तरह ट्रंप भी ईरान पर काबू पाने के लिए बीजिंग की मदद चाहते हैं। हालांकि, आज की परिस्थितियां निक्सन के दौर से बिल्कुल अलग हैं और जब निक्सन चीन गए थे, तब चीन भारत, सोवियत संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अपने पड़ोसियों के साथ विवादों में घिरा हुआ था। उस समय चीन को तकनीक और पूंजी निवेश की सख्त जरूरत थी, जिसके कारण वहां के सर्वोच्च नेता माओत्से तुंग ने ताइवान के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया था और कहा था कि वे ताइवान को 100 साल तक भूल सकते हैं। लेकिन आज का चीन किसी भी मजबूरी में नहीं है और वह अमेरिका के सामने पूरी मजबूती से खड़ा है।
वियतनाम युद्ध की छाया और निक्सन की विरासत
ईरान संकट और वियतनाम युद्ध के बीच की तुलना आधुनिक अमेरिकी कूटनीति की चुनौतियों को दर्शाती है। ट्रंप ईरान को अपनी शर्तों पर समझौते के लिए मजबूर करना चाहते हैं, लेकिन तेहरान पीछे हटने को तैयार नहीं है और निक्सन के समय में चीन आर्थिक रूप से कमजोर और अलग-थलग था, लेकिन आज वह एक वैश्विक महाशक्ति है। ट्रंप की चीन यात्रा के दौरान यह साफ देखा गया कि चीन अब अमेरिका के कनिष्ठ भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में व्यवहार कर रहा है। ट्रंप ने ईरान पर नियंत्रण पाने के लिए जो रास्ता चुना है, वह उन्हें एक ऐसी दीवार के सामने ले आया है जिसे पार करना आसान नहीं है। चीन के पास अब अमेरिका की बातों को मानने की कोई पुरानी मजबूरी नहीं बची है, जो ट्रंप के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन गई है।
स्वर्ग के मंदिर में ट्रंप की चुप्पी के मायने
अपनी चीन यात्रा के दूसरे दिन, राष्ट्रपति ट्रंप को शी जिनपिंग पुराने बीजिंग के डोंगचेंग जिले में ले गए। वहां उन्होंने 600 साल पुराने टेंपल ऑफ हैवन यानी स्वर्ग के मंदिर का दौरा किया। यह मंदिर मिंग और चिंग राजवंशों द्वारा बनाया गया था, जहां चीन के सम्राट अपनी संप्रभुता के लिए प्रार्थना करते थे। जब ट्रंप इस ऐतिहासिक स्थल पर फोटो खिंचवाने के लिए रुके, तो उनसे ताइवान से जुड़ा एक तीखा सवाल पूछा गया। ताइवान एक ऐसा मुद्दा है जिसे चीन अपनी अखंडता पर हमला मानता है। आमतौर पर पत्रकारों के सवालों का जवाब देने वाले ट्रंप इस बार पूरी तरह खामोश रहे और बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए। उनकी यह चुप्पी ताइवान मुद्दे की संवेदनशीलता और चीन के सामने उनकी कूटनीतिक बेबसी को साफ बयां कर रही थी, जबकि बीजिंग आने से पहले उन्होंने ताइवान के साथ हथियार सौदे पर चर्चा करने की बात कही थी।
ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में गंभीर चर्चा
मंदिर के दौरे के बाद, दोनों नेताओं के बीच बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में लगभग 2 घंटे 15 मिनट तक आमने-सामने बातचीत हुई। इस बैठक में ताइवान का मुद्दा प्रमुखता से उठा। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का लहजा बेहद सख्त था और उन्होंने ट्रंप को स्पष्ट चेतावनी दी कि संवेदनशील मुद्दों को संभालने में की गई कोई भी गलती खतरनाक परिणाम ला सकती है। स्टेट डिनर के दौरान भी जिनपिंग ने ताइवान का नाम लिए बिना ट्रंप को याद दिलाया कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए दोनों देशों को समझदारी से काम लेना होगा और उन्होंने साफ कर दिया कि चीन अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा, चाहे वह ईरान का मामला हो या कोई और वैश्विक मुद्दा।
11 अरब 10 करोड़ डॉलर का सौदा और सैन्य अभ्यास
ताइवान को लेकर तनाव तब और बढ़ गया जब 18 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति ट्रंप ने ताइवान को 11 अरब 10 करोड़ डॉलर के हथियार बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। यह अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए एक बहुत बड़ा सौदा था, लेकिन इसने चीन को नाराज कर दिया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने अमेरिका को आग से न खेलने की चेतावनी दी और इस घोषणा के महज 12 दिन बाद, चीन की सेना के ईस्टर्न थिएटर कमांड ने ताइवान जलडमरूमध्य में लाइव-फायर ड्रिल शुरू कर दी। रणनीतिक विश्लेषक कोलिन कोव के अनुसार, इस युद्धाभ्यास का उद्देश्य अमेरिका को यह दिखाना था कि चीन के पास उसके हथियारों का मुकाबला करने की पूरी ताकत है।
अमेरिका और चीन के रिश्तों का भविष्य
ट्रंप के बीजिंग पहुंचने से कुछ घंटे पहले ही चीन ने अपने तेवर साफ कर दिए थे। ताइवान मामलों की प्रवक्ता झांग हान ने कड़े शब्दों में कहा कि चीन ताइवान के अलगाववादियों को कुचल देगा और केवल एक ही चीन की नीति पर कायम रहेगा और चीन का संदेश स्पष्ट था कि अमेरिका को ताइवान और चीन के बीच किसी एक को चुनना होगा। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका का रवैया नहीं बदलेगा। यह स्थिति दर्शाती है कि आने वाले समय में दोनों महाशक्तियों के बीच टकराव और बढ़ सकता है। ट्रंप ने जिस निक्सन की राह पर चलकर ईरान संकट सुलझाने की कोशिश की थी, वह अब ताइवान के पेचीदा मोड़ पर आकर फंस गई है।